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दुनिया मेरे आगे: सिकुड़ते दायरे

वैश्वीकरण के इस दौर में जहां खुले माहौल में खेले जाने वाले खेल गायब होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर गांवों ने भी धीरे-धीरे शहर की राह पकड़ ली।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (File Photo)

हाल ही में स्कूल की छुट्टियां खत्म होने के बाद मुझे बच्चों से बातचीत करने का मौका मिला। कक्षा में पहुंचते ही असमंजस में पड़ गया कि बातचीत की शुरुआत कहां से करूं, पाठ्यपुस्तकों से या किसी और विषय से! फिर सोचा क्यों न पाठ्यपुस्तकों से हट कर बातचीत की जाए। आखिर मैंने पहल की और सभी बच्चों से पूछा- ‘आप छुट्टियों में कहां-कहां घूमने गए थे?’ सभी बच्चे बडेÞ उत्साह के साथ बताने लगे कि सर, मैं शिमला, मैं नैनीताल गया, मैंने समर कैंप, मैंने म्यूजिक क्लास और मैंने एक्टिंग क्लास की’ आदि।

लेकिन जैसे ही एक बच्चे ने कहा कि ‘मैं छुट्टियों में गांव घूमने गया था’ तो कुछ बच्चे हंसने लगे। मैंने जिज्ञासा के साथ बच्चों से पूछा कि ‘क्या आपको गांव जाना अच्छा नहीं लगता है?’ ज्यादातर बच्चों का जवाब था नहीं। फिर मैंने बच्चों से दोबारा सवाल किया- ‘आपको गांव जाना क्यों अच्छा नहीं लगता है?’ बच्चों के उत्तर इस तरह थे- ‘गांव अच्छा नहीं होता है, गांव में बिजली नहीं आती है, गरमी बहुत ज्यादा पड़ती है और टीवी भी देखने के लिए नहीं मिलता है। गांव में साफ-सफाई नहीं होती है, हम बीमार पड़ सकते हैं, गांव में पिज्जा और बर्गर की होम डिलिवरी नहीं होती है, बरसात में पानी भर जाता और सड़क टूट जाती है’ वगैरह।
बच्चों के उत्तर सुन कर मुझे हैरानी हुई। पहले शहरों में पल रहे बच्चों को स्कूल की छुट्टियों का इंतजार रहता था। हर परिवार छुट्टियां शुरू होने से पहले गांव जाने की योजना बनाने लगता था और गांव में भी घर-परिवारों में बच्चों के आने का इंतजार किया जाता था। ज्यादातर बच्चों की स्कूली छुट्टियां नाना, मामा और दादा आदि के घर बीता करती थीं। स्कूल की छुट्टियों में गांव का माहौल एकदम अलग हुआ करता था। छुट्टियों में बच्चे लंगड़ी टांग, पिट्ठू, गिल्ली-डंडा, भागम-भाग, मारधाड़, चोर-सिपाही, रूमाल झपट्टा, घर-घर, कंकड़, चंगा-पो, मिट्टी के खिलौने, बारिश में टायर घुमाना, कुश्ती, गिल्ली डंडा, सितोलिया, सांप-सीढ़ी, लट्टू, पतंगबाजी, छुपम-छुपाई, गुट्टे, पहल-दूज, कंचे, आंख-मिचौनी जैसे अलग-अलग तरह के खेल खेलते थे।

खेलों के अलावा बच्चों को टीवी पर ‘शक्तिमान’, ‘अलिफ लैला’ जैसे नाटकों का बेसब्री से इंतजार रहता था।लेकिन भूमंडलीकरण के इस दौर में जहां स्कूलों की छुट्टियों की जगह ‘समर कैंप’ के नाम से संगीत की कक्षा, व्यक्तित्व विकास, अभिनय की क्लास, जिम, तैराकी, जूडो वगैरह खेलों की क्लास जैसी चीजों ने ले ली है तो दूसरी ओर गांव में बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों की जगह टेंपल रन, कैंडी क्रैश सागा, रोड फाइटर, एंग्री बर्ड्स जैसे गेम आ गए हैं। इस प्रकार के कंप्यूटर या मोबाइल पर खेले जाने वाले गेम को खेलने के लिए किसी अन्य साथी की जरूरत नहीं पड़ती है। कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और टैबलेट पर इन्हें अकेले खेला जा सकता है। गेम के अलावा टीवी पर ‘अलिफ लैला’ और ‘शक्तिमान’ जैसे नाटकों की जगह बच्चे ‘शिन चेन’, ‘नोबिता’, ‘सिंड्रेला’ जैसे धारावाहिकों में मनोरंजन तलाशने लगे हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि गांव में बच्चे खुले माहौल में तरह-तरह के खेल खेलते हैं, जिससे उनकी भरपूर मानसिक और शारीरिक कसरत होती है। ये खेल बच्चों में निर्णय लेने, सोचने-समझने और शारीरिक तौर पर उन्हें सक्षम बनाने में मदद करते हैं। साथ ही गांव में दादी-नानी की कहानियों और लोककथाओं के माध्यम से बच्चे के अंदर सोचने और प्रश्न करने की जिज्ञासा पैदा होती है। यह सब बच्चे के मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है। लेकिन अब शहरों में बच्चे कंप्यूटर, टैब, मोबाइल आदि पर अकेले ही गेम खेलने लगे हैं। अकेले ही इस तरह खेलने के इस चलन ने बच्चों के भीतर एकाकीपन को जन्म दिया है, जिसकी वजह से बच्चे कल्पनाओं की अलग ही दुनिया गढ़ने लगे हैं। यह धारणा है कि गेम खेलने से बच्चे का मानसिक विकास होता हो, लेकिन इसका व्यावहारिक हासिल यह है कि इससे बच्चों का शारीरिक विकास कहीं दब कर रह जाता है।

वैश्वीकरण के इस दौर में जहां खुले माहौल में खेले जाने वाले खेल गायब होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर गांवों ने भी धीरे-धीरे शहर की राह पकड़ ली। अब गांवों में बदलाव साफ नजर आने लगा है। गांव में खेलते हुए बच्चे कम दिखाई देते हैं तो टीवी के माध्यम से ‘शिनचेन’, ‘नोबिता’ जैसे धारावाहिक गांवों में दस्तक दे चुके हैं। वहीं गांवों में कच्चे घरों की जगह पक्के बहुमंजला मकानों ने ले ली है, जिनके ऊपर दूरदर्शन एंटीना की जगह डिश टीवी की छतरी लगी नजर आती है।

 

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