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आस्था का पैमाना

मंदिर में हार-मालाएं, प्रसाद वगैरह लेकर नहीं जाएं तो भगवान का दर्शन अधूरा होता है, तो दूसरी ओर श्रद्धालुओं के जेहन में डर भी उभरने लगता है।

Author April 11, 2017 5:31 AM
Navaratri 2017: नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता है वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए।

कालू राम शर्मा

हाल ही में एक मंदिर में गया तो वहां भीतर जाने के लिए बाहर से करीब दो किलोमीटर की लाइन लगी थी और इसके दोनों तरफ लगातार तरह-तरह की दुकानें सजी थीं। जितने देवता, उससे कहीं ज्यादा पूजन-हवन सामग्री की दुकानें। वहां पैसा लेकर मंदिर के भगवान से मिलाने वाले लोग भी थे। यह इस तरह था जैसे किसी को गाड़ी का लाइसेंस प्राप्त करना हो तो वे किसी एजेंट के पास जाते हैं। मंदिर में हार-मालाएं, प्रसाद वगैरह लेकर नहीं जाएं तो भगवान का दर्शन अधूरा होता है, तो दूसरी ओर श्रद्धालुओं के जेहन में डर भी उभरने लगता है। इस डर से मुक्ति पाने के लिए श्रद्धा और हैसियत से परे जाकर खर्च करना जरूरी हो जाता है। मगर क्या अंतिम रूप से इस तरह के डर से मुक्ति मिल पाती है!वहां सरसरी तौर पर यही लगा कि अंदर जाने वाली कतारें इंसानों की ही हैं। लेकिन जल्दी ही समझ आ गया कि वहां हैसियत ही कतार को तय कर रही थी। कुछ कतारें छोटी थीं, रसूखदार या वीआइपी माने जाने वालों की थीं। इस कतार में दर्शनार्थी कम, लेकिन उनके साथ वाले लोग ज्यादा थे, जो अपने वीआइपी दर्शनार्थियों के प्रसाद और भारी-भरकम हार-मालाएं और उनके कपड़े, बैग वगैरह उठाए हुए थे। समाज में गरीबी-अमीरी का भेद मंदिर में आसानी से देखा-समझा जा सकता है। एक फर्क तो यही कि अगर किसी मंदिर में भीड़ होती है तो गरीब लोगों की कतारें लंबी-लंबी होती हैं। दूसरी ओर, अमीरों की छोटी कतार। यहां पर प्रतीत होता है कि लोकतंत्र सोया हुआ है।

धर्म स्थल तर्क करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। इसलिए यहां जो कुछ भी होता है, उसे ज्यों का त्यों मान लिए जाने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं होता। धर्म स्थलों पर भले ऐसे नारे लगाए जाते हों कि प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो। मगर उन जगहों पर गौर करने के बाद पता चलता है कि सामाजिक और आर्थिक तौर पर किस तरह लोगों को बांट कर उनके साथ पेश आया जाता है। दरअसल, धर्म स्थलों में विवेकशीलता पर धूल जमा होती रहती है, इसलिए हम कुछ चीजों को देख कर भी अनदेखी करते हैं। जब मैं कतार से गुजरते तमाम तरह की इलेक्ट्रॉनिक जांच से होते हुए मंदिर के अहाते में पहुंचा तो कई पंडित यह कहते हुए एक साथ आ गए कि ‘अभिषेक तो करवाना ही होगा!’ मैं डर-सा गया था, लेकिन मगर हिम्मत जुटा कहा- ‘भगवान से मिलने जा रहा हूं… भगवान तो भाव के भूखे हैं।’बहरहाल, जहां से कतार शुरू हुई थी, वहां से मंदिर के अंदर तक जाने के दौरान कोई पचास से ज्यादा दुकानों और दुकानदारों से मेरा पाला पड़ा। कहीं टीका लगाने वाले तो कहीं हाथ में नाड़ा बांधने वाले, कहीं अभिषेक वाले और कहीं आरती की थाली, जो पांच सौ, सौ और पचास के नोट से भरी थी, लिए टीकाधारी पंडित थे। थाली में सजे नोट मुझसे कह रहे थे कि इसी किस्म के नोट थाली में डालने हैं। जितना बड़ा नोट जेब से निकाल कर थाली में डाला जाएगा, उतना ही बड़ा और सलीके से टीका माथे पर लगाया जाएगा। अब छोटे नोटों का जमाना नहीं रहा।

बहुत सारे लोगों की तरह मुझे भी लाइन में खड़े काफी देर हो चुकी थी, दूसरी ओर अमीरों की कतार से लोगों को मंदिर के नुमाइंदे भगवान से मिलने के लिए बड़े प्यार से आमंत्रित कर रहे थे। मेरी लाइन में खड़े लोग ठगे-से यह सब देख रहे थे। वहीं खड़ा एक सुरक्षाकर्मी लंबी कतार वाली भीड़ को डंडे के डर से सीधा कर रहा था। बहरहाल, जैसे-तैसे मैं भीतर पहुंचा। लेकिन वहां कुछ बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी लोगों को वहां से तुरंत हटने का आदेश दे रहे थे- ‘जल्दी करो।’ अपनी कतार वाली लाइन में मैं बाकी लोगों की तरह यह देखता रहा कि कैसे अमीरी वाली कतार गरीबी की कतारों को कुचल कर आगे बढ़ रही है।सबकी तरह मैं भी यही मानता रहा हूं कि भगवान के दर पर सभी बराबर होते हैं। लेकिन यहां या इस तरह के बहुत सारे तीर्थ-स्थलों पर आर्थिक हैसियत के मुताबिक अमीर और गरीब लोगों के साथ बर्ताव आम हैं। इसके अलावा, ऐसी खबरें भी छिपी नहीं हैं कि मंदिरों में प्रवेश के मामले में जाति के आधार पर कैसे भेदभाव किया जाता है। मंदिरों में किसी खास सामाजिक तबके के प्रवेश के सवाल पर हिंसक टकराव भी सामने आते रहे हैं। सच यह है कि मंदिर और भगवान से जुड़ी आस्था से बने समाज को संचालित करने वाले लोग यह तय करते हैं कि समाज के किस तबके के साथ आर्थिक हैसियत या जाति के आधार पर कैसा बर्ताव तय करना है। ऐसी स्थिति में हर बार वही छले जाते हैं जो आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर होते हैं।

 

 

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