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दुनिया मेरे आगे: वक्त काटने के बजाय

दुनिया समझदारों से नहीं, दीवानों की वजह से चल रही है। पहिये के आविष्कार से लेकर आइपैड तक, जाने कितने आविष्कार पहले मस्तिष्क में जन्मे हैं, सपनों में पले हैं, तब सच की धरती पर आ पाए हैं।

समाज और संस्कृति के आगे मानवीय सोच और धारणा पर चिंतन।

स्वरांगी साने

मशहूर दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र ने कहा था- ‘यह मैं हूं, मेरा अस्तित्व है, जहां से सोचने की प्रक्रिया शुरू होती है’। हम सोचते हैं, इसलिए हमारा अस्तित्व है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि हम क्या सोचते हैं, यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उसे कैसे स्वीकारता है। मतलब समझदारी और पागलपन की हद के बीच हम उस समझदारी की ओर बढ़ते हैं, जो समाज प्रदत्त है। समाज में रहते हुए मान्य अवधारणाओं, परिकल्पनाओं और समाज की स्वीकृत परिपाटी में चलते रहें तो हम समझदार कहलाते हैं। हमारा विवेक या हमारा मुक्त-प्राण हमें कुछ और कहता है, हमसे कुछ और करवाना चाहता है, लेकिन वैसा करने से हम डरते हैं।

हमारे संस्कार केवल धर्म से संबंधित आस्थाएं नहीं हैं, बल्कि जिस तरह से हमारा लालन-पालन होता है, वह भी हमें कई बातों को लेकर डरा देता है कि इस बारे में सपने में भी मत सोचना। इतनी सख्ती कि सपने में भी हमें वही सोचना है, जो समाज द्वारा स्वीकृत हो। अगर दुनिया में केवल इसी तरह के समझदार होते तो सुकरात और मीरा की तरह विष का प्याला कौन पीता! कौन गैलीलियो की तरह दूरबीन से आकाशगंगा निहारता और कौन कोलंबस की तरह दुनिया देखने निकल पड़ता! सेब के गिरने की घटना क्या कभी इतिहास में न्यूटन के होने की गवाह बन पाती! इन सभी ने सपने में ही नहीं हकीकत के धरातल पर भी कुछ अलग सोचा और ‘यूरेका’ कहते हुए दीवानों की तरह दौड़ लगा दी।

दुनिया समझदारों से नहीं, दीवानों की वजह से चल रही है। पहिये के आविष्कार से लेकर आइपैड तक, जाने कितने आविष्कार पहले मस्तिष्क में जन्मे हैं, सपनों में पले हैं, तब सच की धरती पर आ पाए हैं। कोई हमसे जब कहे ‘क्यों’, तो उससे प्रति प्रश्न करने की तैयारी रखें कि ‘क्यों नहीं!’ अगर हम ‘क्यों नहीं’ की दुनिया में प्रवेश नहीं करेंगे तो कभी इतिहास बनाने वालों में नहीं होंगे, बल्कि बस इतिहास पढ़ने वाले होंगे।

कमजोर लोग समाज की परवाह तो करते हैं, मगर वे नींव का पत्थर होने की तैयारी नहीं दिखाते। वे किसी बुलंद इमारत के लिए जमीन में गहरे गड़े रहना नहीं चाहते, वे अपने सफेदपोश कपड़ों की परवाह किया करते हैं और जब इमारत बन कर खड़ी हो जाती है तो वे उसके पास खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाते हैं। तस्वीरें खिंचवाना और तस्वीरें खींची जाने में फर्क है। उस फर्क को अपने भीतर से महसूस करना चाहिए। हम कुछ ऐसा काम करें कि हमें तस्वीरें खिंचवाने की जरूरत न पड़े और लोगों की स्मृति में हम अकाट्य धार की तरह बने रहें। यह धार उसी लोहे की है, जो मजबूत होता है।

कुतर्कों को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए। उनकी जगह तर्कों की दिया जाए। यह मत कहें कि अब वे हालात नहीं कि भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु बना जा सकता है। मत बनिए। वे हो गए, वे अब दोबारा नहीं होंगे। इसलिए वे अमर हैं। हमारा जो भी नाम हो, क्या उसमें वह ताकत हम नहीं झोंक सकते कि हम भी अमर हो जाएं? हम कुछ करें या नहीं, लेकिन कम से कम भेड़चाल में चलते न रहें। हमको लगता है कि समाज की रीत के हिसाब से चलना है। लेकिन उसे अपने तर्कों पर परख कर चलना चाहिए।

हमको लगता है कि ऐसा करने से परिवार, समाज, देश में शांति बनी रहेगी। बहुत अच्छी बात है। शांति और सुव्यवस्था ही ‘स्वर्ण-युग’ लाती है, लेकिन परिवार, समाज, देश में शांति बनाए रखने के लिए हमारे भीतर जो कोलाहल हो रहा है, उसे कैसे शांत करेंगे, यह सोचा है? हमने ऊपरी तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा, ऐसा कुछ नहीं किया जो हमसे भद्र होने का तमगा छीन लेता। लेकिन वैसा करते हुए हमने अपने मन को कितनी बार मारा, कितनी बार ऐसा लगा कि यों होता तो कितना अच्छा होता… और हमने उसे दबा लिया। हमारी वे सारी दबी-कुचली इच्छाएं, मरे हुए सपने… समाज में बिखर जाते हैं, नकारात्मकता का पूरा वातावरण बनते हुए। ऐसा करते हुए हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए लिजलिजा समाज छोड़ कर जाएंगे।

अखबारी भाषा में कहें तो ‘पेज थ्री’ का वह पन्ना जो चिकना है, ग्लैमरस या आकर्षक है, दिखने में बहुत साफ-सुथरा है, लेकिन हम भी जानते हैं वह उतना ही खोखला है। उस पन्ने को पढ़ने या न पढ़ने से हमारा कुछ बनने या बिगड़ने नहीं वाला। हमारा मनोरंजन जरूर हो जाएगा, हमारा समय जरूर बीत जाएगा।

तो क्या हम अपना जीवन इस तरह वक्त काटने भर में बिताना चाहते हैं कि चलिए पैदा हो ही गए थे तो मरने तक के समय को किसी तरह बिता दिया? ऐसे चिकने, ग्लैमरस या चकाचौंध से भरे और साफ-सुथरे, लेकिन भीतर से खोखले तरीके से? उससे तो दर-दर होने का आनंद लिया जाए। आपको गढ़ने वाली प्रकृति या ईश्वर या जिस किसी सत्ता में आपका विश्वास है। उसने हमको इस तरह वक्त काटने के लिए नहीं बनाया है। कम से कम उसका आदर करते हुए ही सही, लेकिन सच में जीवन जीना शुरू किया जाए।

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