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दुनिया मेरे आगे: कमाई बनाम पढ़ाई

पर सवाल है कि आज कुछ युवकों का शिक्षक बन जाना क्या सच में कोई मजबूरी और लाचारी है? यों बच्चों को पढ़ाने का प्रशिक्षण और उसकी डिग्री लेने के लिए सही पाठ्यक्रम और सही पाठ्य-पुस्तक, दोनों का होना जरूरी है।

Author January 14, 2019 3:08 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

सुरेश शॉ

आजकल ज्यादातर जगहों पर सरकारी और गैरसरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लिए बीएड डिग्रीधारी होना अनिवार्य हो गया है। जिनकी बहाली फिलहाल हो रही है, वे अपने साथ यह प्रमाण-पत्र लिए आ रहे हैं। पर जो लोग पहले से किसी स्कूल में शिक्षक हैं और जिनके पास यह डिग्री नहीं है, उनकी हालत खस्ता है। इसलिए वे अब यह डिग्री हासिल करने की फिराक में लग गए हैं। शायद इसीलिए लोग यह कहने लगे हैं कि जो बच्चा आज डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, एमबीए या सीए नहीं बन सकता, वह शिक्षक जरूर बन सकता है। पर सवाल है कि आज कुछ युवकों का शिक्षक बन जाना क्या सच में कोई मजबूरी और लाचारी है? यों बच्चों को पढ़ाने का प्रशिक्षण और उसकी डिग्री लेने के लिए सही पाठ्यक्रम और सही पाठ्य-पुस्तक, दोनों का होना जरूरी है। मगर आज दिख यह रहा है कि पाठ्यक्रम चाहे जो हो, इसकी डिग्री हासिल करने वाले महानुभाव पुस्तकें वैसी ही खरीदते हैं जो शॉर्टकट की राहें दिखा कर उन्हें द्रुत डिग्रीधारी बना देती हैं। आज बाजार में ‘कुंजी’, ‘गाइड’, ‘सजेशन’ और ‘नोट’ से संबंधित किताबें सरेआम बिक रही हैं। यानी हमारी जरूरत की चीजों के बाजार में डिग्रियों का एक दूसरा बाजार भी खड़ा कर दिया गया है।

यही हाल विद्यालयों में पढ़ने वाले आज के विद्यार्थियों का भी है। कुछ अपवाद को छोड़ कर यहां ज्यादातर विद्यार्थी ऐसे हैं जो किसी मजबूरी में ही अपने ‘टेक्स्ट-बुक’ को हाथ लगाते हैं। जबकि बड़े जतन से वे उन पुस्तकों को रखते और पढ़ते हैं, जिन्हें हम ‘कुंजी-गाइड-नोट-सजेशन’ बुक्स आदि के नाम से जानते हैं। यों उनके लिए तो बस एनसीईआरटी या उनके स्कूलों में लगे किसी भी दूसरे अच्छे प्रकाशकों की पाठ्य-पुस्तक की मूल किताबें ज्ञान पाने और इम्तिहान में सफल होने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन उन्हें तो वैसी पुस्तकें चाहिए जो अधिक दिमाग खपाए बिना अगली कक्षा में ‘पार’ उतारने में सहायक सिद्ध होती हों। भला हो उन स्कूल-प्रबंधनों का जो अपने स्कूलों में परीक्षा के दौरान छात्रों को मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करने देते। वरना शिक्षा की यह भी एक हद हो जाती। (फिर विद्यालयों के उन प्रशिक्षित शिक्षकों की बात, जिन्होंने न जाने किन-किन तरकीबों को अपनाकर आज बी एड डिग्री होल्डर हैं और ‘ट्रेंड टीचर’ कहलाते हैं।)
एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाले हमारे एक मित्र ने एक दिन अपने एक सहकर्मी की एक रोचक कथा सुनाई, जिन्होंने हाल ही में किसी सरकारी संस्थान से बीएड की डिग्री हासिल की है। मित्र बताते हैं कि बड़े गर्व से उस नौजवान ने एक दिन ताल ठोंक कर स्टाफ रूम में उपस्थित लोगों को अपने पेशे में ‘ट्रेंड’ हो जाने की यह बात बताई थी- ‘जब मैं परीक्षा देने हॉल में पहुंचा, तो ‘इनविजिलेटर’ महोदय को साफ-साफ बता दिया कि मेरे घर पर दीपावली की तैयारी चल रही थी और कल रात भर रंगाई-पुताई हो रही थी। मैं इन्हीं कामों में व्यस्त था, सो पढ़ नहीं पाया। इसलिए अब आप ही कुछ मदद कर दें। यह सुन कर उन्होंने मुझ पर कृपा की और कहा कि जो भी माल-पत्तर आपकी जेब में हैं, उनका आप सदुपयोग कर सकते हैं।’

जब उन्होंने अपनी राह साफ देखी तब अपनी जेब से सारे कागजी माल-पत्तर निकाल कर उनका सही उपयोग करने लगे। लेकिन उनके उन कागजों से जब एक भी उत्तर मेल नहीं खाया तो वह बड़े चिंतित हुए। तभी उनका दिमाग फिर से चला और उन्होंने हाथ के इशारे से उस हितैषी को पास बुलाया और प्रश्न से उत्तर के न मिलने की मजबूरी बताई। मदद का आश्वासन मिलने पर उन्होंने बस बरामदे में रखे अपने बैग में रखे मोबाइल लाकर उसका इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी और उन्हें यह अनुमति मिल गई। अब क्या था! उन्होंने ‘गूगल-मास्टर’ से जवाब खोज-खोज कर धड़ल्ले से उत्तर-पुस्तिका को भर दिया। उनकी इस ‘रंगाई-पुताई’ का फल भी अच्छा आया और ‘वे’ द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हो गए।

यों ‘वे’ लाचारी में बने एक शिक्षक हैं। असल में वे एक गायक हैं। लेकिन गायन के साथ-साथ इस पेशे को भी वह अपनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इस क्षेत्र में सहूलियत है और पैसा भी। शिक्षक बनने की उनकी एक दूसरी लाचारी यह भी है कि वह रातों-रात धन-कुबेर बनने के सपने खूब देखते हैं। वे यह भी जानते हैं कि स्कूलों में छुट्टियां खूब मिलती हैं। यहां समय ही समय है और ट्यूशन भी। उन्हें लगता कि ऐसे में वे गा-बजा कर और नादान बच्चों को अलग से ट्यूशन पढ़ा कर खूब पैसा कमा सकते हैं। इसलिए कुछ साल पहले वे किसी की मदद से वे एक स्कूल में इतिहास के मास्टर बन गए। वे इतिहास विषय को पढ़ाना बेहद आसान मानते हैं। निचोड़ यह कि जो लोग शिक्षा को केवल अपनी कमाई का साधन और ‘मनी-मिंटिंग’ का जरिया भर मानते हैं, उनसे समाज और शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। यह एक सच्चाई है कि आज के इन कमाऊ शिक्षकों की मानसिकता वैसी नहीं है, जैसी पहले के शिक्षकों की हुआ करती थी।

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