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दुनिया मेरे आगे: एकांत का अंत

एकाकीपन की सजा के बारे में सोचते ही मन की गहराइयों में छिपा एक धुंधला चित्र सजीव होकर मेरी आंखों को नम करने लगता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिनिर्धन भूमिहीन किसान अपनी दुधमुंही संतानों को भी घरेलू नौकर का काम दिलाने के लिए मेरे अपेक्षाकृत संपन्न अभिभावकों के ऊपर लगभग जबर्दस्ती थोप देते थे।

Author October 6, 2018 2:11 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अरुणेंद्रनाथ वर्मा

खुद पर हंस पाने की क्षमता अगर स्वस्थ मानसिकता की परिचायक है तो मैं वाट्सऐप आदि के उन चुटकुलों और कार्टूनों का शैदाई हूं जो अपने ही मुरीदों का मजाक उड़ाते हैं। कई चुटकुलों में आभासी संसार के नशे में बेहोश पति से क्षुब्ध पत्नी का जिक्र होता है। समझदार पति उसे भी स्मार्टफोन पकड़ा देता है। सोशल मीडिया से विरक्त पत्नी एकाकीपन की बाढ़ में बहते-बहते अचानक हाथ में आए इस तिनके को मजबूती से थाम कर अपना भी एक निजी संसार बना लेती है। पति-पत्नी ही क्यों, आज तो पूरा परिवार समष्टि को ठुकरा कर व्यष्टि की पूजा में मग्न है। किसी पेड़ की छाया में नन्हे शिशु को सुला कर सिर पर तसला उठाए, गारा-मिट्टी ढोने को मजबूर औरतें उनके रोने से होने वाले व्यवधान का इलाज जैसे अफीम चटाने से कर लेती हैं, वैसे ही बच्चों के प्रश्नों और ध्यान आकृष्ट करने के नितांत मौलिक तरीकों से त्रस्त कामकाजी अभिभावक उनके हाथ में मोबाइल पकड़ा कर अपनी थकाऊ जिम्मेदारी से निजात पा लेते हैं। प्रश्न यह है कि खाने पर साथ बैठे, लेकिन अपने-अपने मोबाइलों की नितांत अकेली दुनिया में खोए मध्यवर्गीय परिवारों के कार्टून दिखा कर सोशल मीडिया स्वस्थ परिहास का नजारा दिखाता है या अपने अपराधबोध से निजात पाना चाहता है!

समाजशास्त्री कुछ भी कहें, मुझे परिवार वालों की उदासीनता से त्रस्त अपनी नियति को कोसते वयोवृद्धों की तस्वीरें नई नहीं लगतीं। घर के बाहर आसीन बुजुर्ग के असुविधाजनक प्रश्नों से कन्नी काटने के लिए पिछवाड़े की गली अपनाने का चलन बहुत पुराना है। सौ साल पहले भी कड़ाहे में तली जाती पूड़ियों की मादक गंध से परेशान वृद्ध काकी जब अंधेरी कोठरी में बैठी अपने एकाकीपन से लड़ रही थी, अकेले मुंशी प्रेमचंद को ही उसके अंतर्मन में झांकने की फुर्सत थी। बूढ़ी काकी के साक्षर होने का प्रमाण नहीं है, लेकिन रिक्शे पर अधलेटे, पसीने से लथपथ किसी रिक्शे वाले को मोबाइल में राहत ढूंढ़ते देख कर मन कहता है कि काकी के हाथ में भी मोबाइल होता तो वह भी आभासी संसार में चैन खोज लेती। विदेशों में बसी संतानों से ‘स्काइप’ और ‘वाट्सऐप’ के जरिए जुड़ पाने से बुजुर्गों को मिलने वाली राहत अमूल्य होती है। धुंधलाती आंखों और दुखते घुटनों से लाचार वयोवृद्ध अपनी तरह ही एकाकीपन की सजा भुगत रहे पुराने सहपाठियों, सहकर्मियों के पास सशरीर न जा सकें, वाट्सऐप उन्हें कुछ तो राहत देता ही है।

एकाकीपन की सजा के बारे में सोचते ही मन की गहराइयों में छिपा एक धुंधला चित्र सजीव होकर मेरी आंखों को नम करने लगता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिनिर्धन भूमिहीन किसान अपनी दुधमुंही संतानों को भी घरेलू नौकर का काम दिलाने के लिए मेरे अपेक्षाकृत संपन्न अभिभावकों के ऊपर लगभग जबर्दस्ती थोप देते थे। वेतन का प्रश्न उन्हें नहीं सताता था। इतनी ही उम्मीद काफी थी कि भुखमरी से उनके नन्हे बच्चे को निजात मिल जाएगी और मालिक के बच्चों के उतारे कपड़े पहन कर वे सर्दी में ठिठुरेंगे नहीं। ऐसा ही एक हमउम्र घरेलू ‘नौकर’ मेरी ‘सेवा-टहल’ के लिए रख लिया गया था। बाल श्रम निरोधी कानून तब थे नहीं। ऐसे घरेलू नौकर हर मध्यवर्गीय घर में होते थे, इसलिए न किसी अपराधबोध का प्रश्न था, न इसे अमानवीय समझा जाता था। पिताजी के मन में उस अधनंगे, भूख से बिलबिलाते बच्चे के मुंह में कुछ निवाले और सिर पर छत मुहैया कराने की ही मंशा रही होगी। उसकी कृशकाया के अनुरूप हमने उसका नामकरण किया टेनी। इस नए नाम को उस बच्चे ने सहज ढंग से स्वीकार कर लिया।

जीवन में शायद पहली बार भर पेट खाना पाकर और मेरे साथ हंस-खेल कर टेनी का दिन तो गुजर गया, लेकिन रात में हमारे कमरे से लगे गलियारे में उसे अकेले सोना पड़ा। उसकी वह पहली रात थी हमारे घर में। मैं और बहन सोने ही वाले थे कि हमने उस अंधेरे सूने गलियारे में नन्हे टेनी को मद्धिम स्वर में कहते सुना ‘ए टेनी’। उसी की आवाज में उत्तर मिला- ‘हां’। आगे बातचीत कुछ ऐसे चली- ‘एक ऊंट था’, ‘हां’, ‘त उंटवा को खरबूजा खाने का मन हुआ’ ‘हां, फिर?’ मैं और मेरी बहन दोनों चौंक पड़े, तुरंत उठ कर गलियारे में झांका। देखा टेनी खुद से बतियाने में मगन था। हमारे पूछने पर उसने लजाते हुए बताया कि ‘अकेले नींद नहीं आ रही थी। तो अपने को एक कहानी सुना रहा था।’ अगली सुबह हमने यह कहानी सबको हंसते हुए सुनाई तो पिताजी की आंखों में अवसाद दिखा और मां की आंखों में करुणा। हम घबरा कर चुप हो गए। आज अकेलेपन से जूझते बुजुर्गों को सोशल मीडिया में राहत तलाशते, आबाल-वृद्ध सबको आभासी दुनिया में डूब कर खुद को कहानी सुनाते या सुनते पाता हूं तो मन करने लगता है अतीत में लुप्त हो चुके टेनी को ढूंढ़ कर उसके हाथों में भी एक स्मार्टफोन थमा दूं, सांय-सांय करते उसके सुनसान मन में रस की बूंदें टपकाने के लिए।

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