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दुनिया मेरे आगे: बच्चे मशीन नहीं

यह कथन कि ‘बच्चे मशीन नहीं हैं’ स्कूल संबंधी अन्य पक्षों पर भी सोचने पर मजबूर करता है। स्कूल में लगने वाले विषय आधारित पीरियड जो निश्चित समय अंतराल पर एक के बाद एक घंटी बजने के साथ ही बदलते रहते हैं, दरअसल इस समझ के खिलाफ हैं।

Author December 24, 2018 2:15 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

आलोक कुमार मिश्रा

अच्छे विचार, व्यवहार या उद्धरण के रूप में प्रचलित कुछ बातों के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि कभी न तो उन पर प्रश्न उठाते हैं और न ही अलग ढंग से सोच पाते हैं। पर क्या इन बातों में इतनी ही पूर्णता या अच्छाई होती है कि इनसे अलग सोचना और करना बुरा या गलत होने को ही पुष्ट करे? पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान मुद्दा यह केंद्र में था कि कैसे बच्चों को नियमित रूप से स्कूल आने को प्रोत्साहित किया जाए और ‘अनुपस्थिति’ की समस्या से निपटा जाए। बातचीत में शामिल हम सबके बीच इस पर सहमति थी कि विद्यालय में नियमित उपस्थिति बच्चों के सीखने की प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है। वरना बच्चों के सीखने की गति धीमी या बाधित होती है। लेकिन एक सुझाव पर एक प्रतिभागी की प्रतिक्रिया बहुत रोचक और भिन्न रही, जिसने हम सबको लीक से हट कर सोचने पर विवश किया। वे एक विद्यालय में प्रमुख हैं और इस रणनीति को अपने स्कूल में लागू कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों स्कूल के कार्यक्रम में सौ प्रतिशत उपस्थिति वाले बच्चों और उनके अभिभावकों को सभी बच्चों के सामने प्रशस्ति पत्र और उपहार देकर सम्मानित किया गया, ताकि बाकी बच्चे इससे प्रेरित हो सकें। इसका सकारात्मक असर भी दिख रहा है।

उनके इस प्रयास पर हम सब उनकी प्रंशसा कर रहे थे, लेकिन एक अन्य प्रतिभागी ने इस पर सवाल उठाया और भिन्न दृष्टिकोण दर्शाया। उन्होंने जानना चाहा कि ऐसे कितने बच्चे उस स्कूल में थे। पता चला कि उनकी संख्या दो हजार बच्चों में मात्र चार थी जो बिना एक भी छुट्टी किए पूरे साल विद्यालय आए। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बिना एक भी छुट्टी किए रोज स्कूल आने की उम्मीद करना बच्चों के साथ अन्याय है। आखिर बच्चे भी समाज के सदस्य हैं। आकस्मिक रूप से कुछ अलग प्राथमिकताएं कभी-कभी आ ही जाती हैं। उन्हें भी पारिवारिक-सामाजिक आयोजनों, दुख-सुख में सहभागी होने का अवसर मिलना चाहिए। ऐसा होने पर वे अधिक जिम्मेदार, संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनेंगे। शिक्षा के उद्देश्य इनसे अलग नहीं हैं। आखिर बच्चे मशीन नहीं हैं कि वे कभी बीमार न पड़ें या उनका अपना मन स्कूल आने का न हो। इस प्रतिक्रिया ने अब तक की बातचीत और उससे बनती समझ को एक नया मोड़ दे दिया। सब एक नए दृष्टिकोण से सोचने पर विवश हो गए। यह बात सबको समझ आ रही थी कि शत-प्रतिशत उपस्थिति की मांग व्यावहारिक नहीं है। हां, उच्च उपस्थिति दर वांछित जरूर है और इसके लिए विद्यालय का सहज, आनंदपूर्ण और बाल केंद्रित शैक्षिक माहौल बहुत आवश्यक है।

यह कथन कि ‘बच्चे मशीन नहीं हैं’ स्कूल संबंधी अन्य पक्षों पर भी सोचने पर मजबूर करता है। स्कूल में लगने वाले विषय आधारित पीरियड जो निश्चित समय अंतराल पर एक के बाद एक घंटी बजने के साथ ही बदलते रहते हैं, दरअसल इस समझ के खिलाफ हैं। बच्चों से यह उम्मीद की जाती है कि वे घंटी बजते ही पिछले पीरियड में कर रहे क्रियाकलाप, उससे जुड़ी चिंतन प्रक्रिया को रोक कर और किताब-कॉपी समेट कर तुरंत प्रारंभ हुए पीरियड के विषय की किताब-कॉपी निकाल कर नए निर्देशों के अनुसार संचालित होने लगें। चित्रकारी में डूबे बच्चे तत्काल गणित के सवालों से आकर उलझें, यह उम्मीद ही नहीं की जाती, बल्कि इसे लागू किया जाता है। अभी तक कविता का रस ले रहे बच्चे तुरंत सल्तनत काल की प्रशासनिक व्यवस्था पर फोकस करें, यह सामान्य अपेक्षा होती है। इस बदलाव को सहज बनाने के लिए कोई सायास प्रयास विद्यालयों में दिखाई नहीं देता। कितना मुश्किल होता होगा यह आपात बदलाव बच्चों के लिए, हमने शायद कभी सोचा नहीं। अब तक हम व्यवहार में बच्चों को मशीन ही समझते रहे हैं।

शिक्षा सहित समाज की अन्य संस्थाओं की संरचना, उनके उद्देश्य और व्यवहार के निर्धारण में बच्चों की भागीदारी मूल्यवान और समान सदस्य के रूप में कहीं नहीं दिखाई देती है। उन्हें मात्र निर्भर उपभोक्ता या नासमझ कर्ता के रूप में देखे जाने का चलन रहा है, जिन्हें लगातार नियंत्रित और निर्देशित किए जाने की जरूरत है। हालांकि बच्चों के मनोविज्ञान और व्यवहार को लेकर पश्चिमी देशों में अध्ययन हुए हैं और उन्हें शिक्षा की अंतर्वस्तु में पिरोने के प्रयास हुए हैं। पर सभी सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में उनका सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। फिर शिक्षा सहित अन्य संस्थाओं का प्रबंधन पूरी तरह से समाज में प्रचलित और विकसित हो चुके वयस्क समाज की समझ पर आधारित होता है। बिना बच्चों की इच्छा, जरूरत और संवेदना को शामिल किए हम वास्तव में उनके लिए समानुभूति पूर्वक निर्धारण नहीं कर सकते। यहां बच्चों की इच्छा, मत या जरूरत से अर्थ यह नहीं है कि उनसे हर बात पूछ कर की जाए, बल्कि यहां बच्चों को जानना और समझना महत्त्वपूर्ण है। उन्हें सम्मानित-मूल्यवान सदस्य मान कर लोकतांत्रिक मूल्यों और लक्ष्यों के अनुरूप सीखने-सिखाने के संदर्भ और अवसर मिलने ही चाहिए। इसके लिए संस्थाओं, उनके उद्देश्यों और व्यवहारों की पुनर्रचना आवश्यक है। थोपे जाने की सामंती प्रवृत्ति को हटा कर नए सिरे से सोचने और उस पर अमल करने की जरूरत है।

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