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मेहनत या चमत्कार

भारत जैसे देश में जहां अच्छी शिक्षा एक ‘विलासिता’ है, वहां ऐसी सफलताएं चमत्कारिक ही हैं। फिल्म ‘थ्री इडीयट्स’ में प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज के डीन बड़ी आसानी से ढेर सारे आवेदन पत्र बिखेर कर कह देते हैं कि आप सब इनको बाहर करके आगे बढ़े हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

आलोक रंजन

भारत में आमतौर पर हर बड़ी परीक्षा के बाद कुछ शीर्षक खूब उछलते हैं। मसलन ‘समोसा बेचने वाले का बेटा बना इंजीनियर’, ‘झुग्गी में रहने वाली बनी आइएएस’, ‘रिक्शा चलाने वाले का बेटा आइएएस’, ‘चपरासी की बेटी ने की परीक्षा टॉप’। पहले ऐसी खबरें अखबारों में ही छपती थीं, लेकिन आजकल अखबार, समाचार चैनल, विभिन्न वेबसाइट, फेसबुक, वाट्सऐप आदि हर जगह इनकी व्याप्ति है। इन शीर्षकों और विद्यार्थियों की सफलता से कोई शिकायत किए बिना इन शीर्षकों की जड़ में देखने की जरूरत है।
ऐसा नहीं है कि हमें ऐसे शीर्षक आकर्षित करते हैं, इसलिए लिखे जाते हैं। बल्कि हम एक आम धारणा के शिकार हैं कि निम्न आर्थिक हैसियत के लोगों की सफलता एक चमत्कार है। और शायद यह चमत्कार ही है। भारत जैसे देश में जहां अच्छी शिक्षा एक ‘विलासिता’ है, वहां ऐसी सफलताएं चमत्कारिक ही हैं। फिल्म ‘थ्री इडीयट्स’ में प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज के डीन बड़ी आसानी से ढेर सारे आवेदन पत्र बिखेर कर कह देते हैं कि आप सब इनको बाहर करके आगे बढ़े हैं। लेकिन जो पीछे रह गए, क्या उन्हें भी तैयारी के लिए उतने ही अवसर मिले थे? या फिर क्या उनके कमरे में कोई बल्ब था? क्या उनका अपना कमरा भी था? ऐसे प्रश्नों के जवाब वहां नहीं मिलते, लेकिन वास्तविक जीवन में मिल जाते हैं। अधिकतर विद्यार्थियों को तैयारी के लिए समान अवसर और सुविधाएं तो दूर, पढ़ने का नियत स्थान भी नहीं मिल पाता। ऊपर जो शीर्षक बताए गए हैं उनके नायक या नायिका तब किसी महाकाव्यात्मक नायक या नायिका की तरह लगते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त कर लेना, उसी तरह का चमत्कार लगता है जैसे कहानियों में कोई आग से भरी नदी पार कर राक्षस का अंत कर आता है!

सरकारी तौर पर सबको रोजगार मुहैया करा पाना संभव नहीं, ऐसा कहने वाले लोग बहुत हैं। लेकिन सरकार ने कभी प्रयास भी नहीं किया कि सबको रोजगार उपलब्ध हो। भर्तियां उतनी ही निकलती हैं, जितने लोगों की जरूरत होती है। आजकल तो उनमें भी कटौती का दौर है। सरकारें मानव संसाधन को किसी भी प्राकृतिक संसाधन की तरह मान कर बेजा दोहन कर रही हैं। हर स्तर पर ठेके पर नियुक्तियां इसी दोहन का उदाहरण हैं। अपने यहां अवसरों की कमी इस कदर है कि ‘सेलेक्शन बाइ रिजेक्शन’ यानी किसी को खारिज करके ही किसी का चुनाव होना है, इसलिए इन परीक्षाओं में सफल होना खास तैयारी की मांग करता है। खास तैयारी और खास ट्रेनिंग। ऐसे में संसाधनों के अभाव में जिन कुछ लोगों को सफलता मिलती है, वे कम होते हैं और वे शायद ऐसे विद्यार्थी होते हैं जो किसी भी परिस्थिति में सफल हो सकने का माद््दा रखते हैं। यहां तक बात बहुत सीधी लगती है और समझने में आसान भी। लेकिन बात इसके बाद शुरू होती है।

दरअसल, इस तरह के शीर्षक पेशों को लेकर हमारी सामान्य समझ को भी दर्शाते हैं। कुछ पेशे आर्थिक रूप से इतने भी मददगार नहीं होते कि उनसे उम्मीद रखी जाए। जब पेशों से ही उम्मीद न हो तो उन पर पलने वाले परिवार के संबंध में कोई उम्मीद रखना ही बेकार है। तब उस ओर से कोई सफलता की खबर मिल जाए तो वहां मेहनत केंद्र में न रह कर समोसा बेचने का काम केंद्र में आ जाता है, झुग्गी केंद्र में आ जाती है। विभिन्न कामों की आर्थिक हैसियत उसकी सामाजिक हैसियत रचती है। तभी एक राजनीतिक यह कह सकने की हिम्मत कर लेता है कि ‘किसानों को मुखमंत्री के पैर धो-धोकर पीने चाहिए।’ ‘पैर धोकर पीना’ ऐतिहासिक प्रयोग है और इतिहास से अब तक चलते आ रहे शोषण को समझा सकने वाला मुहावरा। सामंती ढांचे में यह एक सामान्य अवधारणा है।

भारत में प्रचलित शिक्षा के तौर-तरीकों ने सीखने-सिखाने के क्रम में इस बात की अनदेखी की है कि समाज सब तरह का काम करने वाले लोगों से मिल कर बना है और उन सबकी जरूरत समाज को है। इसलिए न तो हम सभी तरह के लोगों को एक समान मानने के लिए तैयार होते हैं, न ही सभी तरह के काम को। यह तो रही बात शिक्षा की। शिक्षा से बाहर का भारत तो वाकई ‘पैर धोकर पीने’ वाले युग में जी रहा है। उस भारत को सुविधा के लिहाज से पिछड़ा हुआ भारत कह सकते हैं, लेकिन वह पिछड़ापन मानसिक है। वहां केवल आर्थिक हैसियत नहीं, बल्कि जाति-प्रथा भी मनुष्य की क्षमताओं का निर्धारण करती है।अंतिम बात यह है कि खास परीक्षाओं के लिए खास प्रकार की तैयारी या प्रशिक्षण इतना जरूरी हो गया है कि जो लोग उस प्रशिक्षण के बिना भी सफल होते हैं, वे किसी और ग्रह से आए हुए लोग लगते हैं। अवसरों के अभाव में सामान्य होना भी असामान्य हो गया है।

 

 

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