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दुनिया मेरे आगे- श्रम का पहाड़

पानी के गदेरे अपने पूरे शबाब पर थे। पहाड़ के हर तरफ से पानी टपक रहा था। सड़क पर फिसलन भी थी पर गाड़ी चलती ही जा रही थी।

Author October 11, 2017 5:17 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

दीनानाथ मौर्य

पिछले दिनों मैं गोपेश्वर की यात्रा पर था। हमारी गाड़ी नगरासू में लगे ढाई घंटे के उबाऊ जाम के बाद जब आगे बढ़ी तो बारिश और तेज हो चुकी थी। पानी के गदेरे अपने पूरे शबाब पर थे। पहाड़ के हर तरफ से पानी टपक रहा था। सड़क पर फिसलन भी थी पर गाड़ी चलती ही जा रही थी। साथ में हम लोग भी गाड़ी में बैठे हुए अपनी-अपनी दुनिया में चल रहे थे। बीच में जब सड़क पर कोई पत्थर आ गिरता तो हम किसी अनहोनी की कल्पना से सिहर उठते। लेकिन फिर सब सामान्य हो जाता। अभी नगरासू से करीब तीन किलोमीटर चले होंगे कि सामने नीचे की रोड पर मुझे कुछ अजीब-सा दृश्य दिखाई दिया। लगभग बीस की संख्या में बड़े-बड़े घास के बंडल हिलते-डुलते चले आ रहे थे। मैं समझ नहीं पा रहा था की यह हो कैसे रहा है। गाड़ी की रफ्तार तेज थी और वह अब घास के इन हिलते-डुलते बंडलों (भारों) के करीब पहुंच रही थी। तेज हवा और बारिश के बीच इन घास के बंडलों के नीचे पहाड़ की जिस जिंदगी को मैंने देखा, वह मेरे लिए सचमुच में मानवीय जिजीविषा की मजबूत चट्टान से कम न थी। इस जिंदगानी पर ही सही मायने में पहाड़ की संस्कृति का सारा ताना-बाना बुना हुआ जान पड़ता है। घनघोर बारिश और हवा के थपेड़ों के बीच जिंदगी की यह जरूरत और जिंदादिली कम से कम ..हमें बहुत कुछ सिखाती है।

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कहां सुबह श्रीनगर से बारिश के चलते घर से निकलने में भी हम दस बार सोच रहे थे और कहां जिजीविषा का ये आलम और ये स्थितियां? ये थीं गढ़वाल की वे मेहनतकश महिलाएं, जो घास काट कर जंगलों से वापस घर को आ रहीं थीं। उनकी पीठ से कमर तक कस कर बंधे घास के बंडल इतने बड़े थे कि वे इनसे ढंकी हुई थीं और दूर से उनको देख पाना मुमकिन न था। कम से कम मेरे जैसे अनजान के लिए जिसके सामने साल भर बाद भी पहाड़ की बहुत सारी चीजें पहली बार घटित हो रहीं थी, यह मेरे लिए नई स्थिति थी। घास के गट्ठरों में छिपी हुई महिलाएं दिखीं तो बाद में गढ़वाली गीतों के सुर हमें पहले सुनाई देने लगे थे। दरअसल यह दृश्य मेरे लिए इसलिए भी कुछ अलग वितान रच रहा था, क्योंकि मेरी गोपेश्वर यात्रा कथा-सम्राट प्रेमचंद के एक कार्यक्रम को लेकर थी। ‘प्रेमचंद के मायने’ विषय एक साथी अभिमन्यु ने सुझाया था और आजकल मैं इसी के आस-पास सोच रहा था। इन घास काटने वाली महिलाओं के श्रम और जिजीविषा को छोड़कर भी क्या किसी साहित्य को पढ़ा जा सकता है? कम से कम से कम मेरी राय में तो नहीं। इन्हें देख कर मुझे प्रेमचंद के साथ दुष्यंत कुमार भी याद आ गए। उनका एक शेर है, ‘ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था तुम्हें धोखा हुआ होगा..।’ अब मेरे लिए इन गढ़वाली महिलाओं के श्रम और उनकी अदम्य जिजीविषा को भूलकर प्रेमचंद को याद कर पाना मुश्किल हो गया था। श्रम का सम्मान प्रेमचंद के साहित्य की एक अनिवार्य विशेषता है और श्रमिक के अधिकारों की बात वे अपनी कहानियों और उपन्यासों में लगातार करते रहते हैं।

ठाकुर का कुआं, पूस की रात, विध्वंस, मंत्र, प्रेमाश्रम,कर्मभूमि, रंगभूमि और गोदान की कथाएं दरअसल इसी श्रमजीवी वर्ग की ही गाथाएं है। यहां निराशा भी है और उत्साह और उम्मीद भी। निराशा वर्तमान की स्थितियों से है और उत्साह अपने श्रम की महत्ता को समझने में है। इन कहानियों और उपन्यासों के पात्रों के जीवन के भीतरी हिस्सों में उमंग की झंकार ोहै। तभी तो व्यवस्था का दंश झेलता होरी जब खेत की मेड़ पर जा रहा होता है तो बरबस उसके मुख से अवध के गीत के बोल फूट पड़ते हैं। किसानी जीवन में श्रम की संस्कृति को हम अलग से नहीं देख सकते क्योंकि वहां तो जीवन का हर पल इसी श्रम के साथ पगा होता है। किसान की प्रकृति के बारे में प्रेमचंद ने (गोदान में ) होरी के हवाले से लिखा है, ‘किसान पक्का स्वार्थी होता है, इसमें संदेह नहीं। उसकी गांठ से रिश्वत के पैसे बड़ी मुश्किल से निकलते हैं, भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की घंटों चिरौरी करता है, जब तक पक्का विश्वास न हो जाए, वह किसी के फुसलाने में नहीं आता, लेकिन उसका सप्ांूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है।’ प्रगति के तमाम मानकों को झुठलाती यह कृषक संस्कृति आज भी अपराजेय है। मेरे जेहन में प्रेमचंद और उनका साहित्य श्रमशील जनता के रूप में मूर्त्तमान हो उठता है। और फिर मैं उस साहित्य की और उसमें निहित विचार की विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता की पड़ताल इन स्थितियों को छोड़ कर नहीं कर पाता हूं।

 

 

 

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