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दुनिया मेरे आगे: संवाद का पुल

युवा पीढ़ी गलाकाट प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद के कारण आने वाली नई-नई चुनौतियों में उलझ कर रह जाती है। नरेंद्र जांगिड़ का लेख।

Author September 20, 2016 12:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

नरेंद्र जांगिड़

कक्षा में शिक्षक ने पीढ़ियों के बीच की दूरी की समस्या का जिक्र किया जिसमें महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि एक सीनियर को जूनियर के साथ और एक बाप को बेटे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, ताकि पीढ़ी का अंतर बना रहे। अक्सर जब गांव जाने का मौका मिलता है तो यह महसूस करता हूं कि वहां के बुजुर्गों को युवा पीढ़ी का पहनावा और रहन-सहन कतई पसंद नहीं है। कई बार ऐसा भी देखा कि बुजुर्गों द्वारा घर में किए जाने वाले सख्त व्यवहार की वजह से उनकी संतानों को उनसे बात करने की हिम्मत नहीं होती। इससे अपने घर में ही युवा अकेलापन महसूस करने लगते हैं और अपनी तकलीफों या कमियों को अपने अभिभावकों से साझा नहीं कर पाते हैं।

अक्सर सुनने को मिलता है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं होती या नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की दृष्टि में उद्दंड, संस्कारहीन और बेवफा होती है। दरअसल, यही असंतुष्टि बुजुर्गों के लिए बहुत सारी परेशानियों का कारण बनती है और दोनों पीढ़ियों के बीच कड़वाहट और दरार को बढ़ाती है। बुजुर्ग अपनी दयनीय स्थिति के लिए नई पीढ़ी को जिम्मेदार ठहराते हैं। नई पीढ़ी का उपेक्षित व्यवहार उन्हें अवसादग्रस्त कर देता है, नतीजतन, उनका अंतिम प्रहर मानसिक द्वंद्व और शारीरिक तकलीफों के साथ गुजरता है। आमतौर पर बुजुर्गों की दयनीय स्थिति के लिए नई पीढ़ी को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। जबकि सच यह है कि सभी युवाओं को एक ही कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है और सभी युवा बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीन नहीं होते। समस्या वहां खड़ी होती है जहां संवादहीनता की खाई को भरने की कोशिश नहीं होती। इसी खाई के चलते पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी से तालमेल नहीं कर पाती। दोष केवल नई पीढ़ी में नहीं है, पुरानी पीढ़ी के लोग भी अपने अनुभवों को साथ रखते हुए संवाद की स्थितियां बनाने में बहुत रुचि नहीं लेते। वजह वही पुरानी अवधारणा है कि घर के बड़े-बुजुर्गों के सामने चुप रहने वाले बच्चे अच्छे होते हैं!

पिछली एक सदी के दौरान विकास की गति काफी तीव्र हुई है। लेकिन इसी गति में मानव विकास सूचकांक की कसौटी पर यह विकास काफी पिछड़ा दिखता है। दरअसल, तीव्र विकास में केवल आर्थिक और तकनीकी उपलब्धियां ही नहीं दर्ज की जानी चाहिए। सामाजिक परिवर्तन के मामले में कितना बदलाव हुआ, यह भी देखा जाना चाहिए। मसलन, व्यक्ति की जीवन-शैली, उसकी बौद्धिक क्षमता, नई मान्यताएं और सोच, महत्त्वाकांक्षाएं और प्रतिस्पर्धा की स्थिति आदि। लेकिन फिलहाल जो विकास चल रहा है, उसमें नई पीढ़ी अधिक विचारशील और महत्त्वाकांक्षी हो रही है। इससे पुरानी पीढ़ी को अपनी मान्यताओं और आत्मसम्मान पर चोट पहुंचती लगती है। एक तरफ नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी कम पढ़ी-लिखी, सुस्त, दकियानूस, परंपरावादी और परिवर्तन विरोधी लगती है तो दूसरी तरफ पुरानी पीढ़ी आमतौर पर इस नई पीढ़ी को अधिक भौतिकवादी, अहसानफरामोश और उग्र स्वभाव रखने वाली मानती है। पुरानी पीढ़ी के लिए भौतिकवादी मूल्यों से भावनात्मक मूल्यों का अधिक महत्त्व है और जीवन-शैली में आ रहे तीव्र परिवर्तन उसे स्वीकार्य नहीं हैं। वे कई अच्छे बदलावों को भी अपनी संस्कृति पर चोट समझते हैं। इसलिए उनमें से ज्यादातर को समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों का विरोध करते देखा जा सकता है। पुरानी पीढ़ी की यह सोच हमेशा से नई पीढ़ी से सामंजस्य बनाने में अवरोध उत्पन्न करती है, जो कई बार दोनों वर्गों के लिए पीड़ादायक साबित होता है।

दूसरी ओर, युवा पीढ़ी गलाकाट प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद के कारण आने वाली नई-नई चुनौतियों में उलझ कर रह जाती है। वह अमूमन सभी परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए तत्पर रहती है। वह जल्दी से जल्दी आधुनिक सुविधाओं को जुटाने के लिए व्यस्ततम जीवन और कठोर परिश्रम करने को तैयार है। लेकिन इस बीच बदलती जीवन शैली का आकर्षण उन्हें कब भावनात्मक रूप से संवेदनहीन बना देता है, यह उसे भी पता नहीं चलता।  जाहिर है, यह स्थिति संवाद के टूटने का नतीजा है, जहां दोनों ही पक्ष एक दूसरे की बातों और वक्त की जरूरतों को समझने के लिए तैयार नहीं होते। बदलते वक्त और उसके मुताबिक बदलती जरूरतों का अगर ध्यान रखा जाए तो शायद एक-दूसरे की परेशानियों, अपेक्षाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को समझा जा सकेगा। युवाओं को यह समझना चाहिए कि पुरानी पीढ़ी एक खास देशकाल में पलते-बढ़ते उसी मानसिकता और सोच के साथ अपने व्यवहार को तय करती है। अगर इस तरह के व्यवहार से युवा पीढ़ी को परेशानी होती है तो वहां भी उपाय संवाद ही है, जिसके जरिए अपनी भावनाएं दूसरे पक्ष को समझाई जा सकती हैं। अब सवाल यह है कि संवाद का वह पुल कैसे तैयार हो! इस सवाल पर सबको विचार करना होगा, ताकि एक बेहतर सामाजिक माहौल के निर्माण किया जा सके और बुजुर्गों को हाशिये पर नहीं जाना पड़े।

 

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