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दुनिया मेरे आगेः ईमानदारी की मिठास

गांवों से नगर, नगरों से महानगर और कंक्रीट के जंगलों में पलायन करने को मजबूर विस्थापित जिंदगानियां दम तोड़ रही हैं। हताशा, अवसाद, आत्महत्या, चोरी-डकैती, झपटमारी, बलात्कार, हत्या और न जाने किन-किन दुष्कर्मों में लिप्त हो जाने को अभिशप्त इंसान समझ ही नहीं पा रहा है कि आखिर उसे चाहिए क्या!

Author Updated: February 25, 2020 1:16 AM
उपभोक्तावाद ने भारत जैसे देश-समाज में एक विचित्र स्थिति पैदा कर दी है।

नीरज कुमार पाठक

ईमानदारी यों तो एक बहुत ही सरल, सहज, प्रचलित शब्द है, लेकिन इसके निहितार्थ काफी गूढ़ हैं। इसे अपनी जीवनशैली में उतार पाना या फिर ईमानदारी को जीवनशैली ही बना लेना निश्चित तौर पर एक दुष्कर कार्य है। यह किसी तपस्या या हठयोग से कम भी नहीं है। फिर भी यह एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे गंभीर प्रयासों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। भोजन में मिष्ठान्न की निश्चित उपस्थिति इस बात को रेखांकित करती है कि तीखे-खट्टे व्यंजनों के उपभोग के बाद जिह्वा और हृदय को शीतलता और तृप्ति प्रदान करना आवश्यक है। लोग मिष्ठान्न के बगैर भी भोजन कर सकते हैं। कई लोग करते भी हैं। कई तो आग्रहपूर्वक और निष्ठुरता से मिष्ठान्न का निषेध भी करते हैं। हालांकि ऐसी दृढ़ता के संग नमक का बहिष्कार कर पाना संभव नहीं है। नमक हमारे भोजन का अनिवार्य अंग है। सभी धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र और वर्ण के लोग इसकी अनिवार्यता और अपरिहार्यता को स्वीकार करते हैं। मिष्ठान्न के संग ऐसी बात नहीं है। उसका सेवन स्वेच्छा से ही किया जा सकता है। ईमानदारी के साथ भी ऐसी ही मजबूरी है। उसे थोपा नहीं जा सकता। उसे अंगीकार करने के लिए स्वेच्छा का होना प्राथमिक शर्त है।

वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप निर्लज्ज उपभोक्तावाद ने भारत जैसे देश-समाज में एक विचित्र स्थिति पैदा कर दी है। बाजार के चकाचौंध ने जरूरत और लालच के बीच की पतली दीवार को ध्वस्त कर दिया है। हर इंसान सिर पर पैर रख कर भाग रहा है, रास्ते में आने वाले हर सजीव-निर्जीव अवरोध को निर्दयतापूर्वक कुचलते हुए एक अलक्षित-अदृश्य-अप्राप्य मुकाम को छू लेने की जद्दोजहद में पसीने से लथपथ है। कोई पूछे कि भैया जा कहां रहे हो तो कोई जवाब नहीं! जवाब हो भी कैसे!

गांवों से नगर, नगरों से महानगर और कंक्रीट के जंगलों में पलायन करने को मजबूर विस्थापित जिंदगानियां दम तोड़ रही हैं। हताशा, अवसाद, आत्महत्या, चोरी-डकैती, झपटमारी, बलात्कार, हत्या और न जाने किन-किन दुष्कर्मों में लिप्त हो जाने को अभिशप्त इंसान समझ ही नहीं पा रहा है कि आखिर उसे चाहिए क्या! वह तो पड़ोसी की भौतिक संपदा देख कर क्षुब्ध है या फिर किसी मामूली बात पर अपने किसी परिचित को भयानक सबक सिखाने की योजना बना रहा है! दफ्तर में सहकर्मी की प्रगति देख कर ईर्ष्या से जल-भुन रहा है, अपने बच्चों को दूसरों की सफलताओं की कहानियां सुना-सुना कर हीन भावना से भर दे रहा है या फिर सुबह-शाम अपनी बदहाली का ठीकरा किसी और के सिर फोड़ने में व्यस्त है। ऐश-मौज के सारे संसाधन जुटाने का दबाव उसे अनिद्रा का रोग दे गया है।

यह तो उन लोगों का हाल है जो ‘थोड़ा है और थोड़े की जरूरत है’ के कोष्ठक में आते हैं। इनकी संख्या नगण्य है। एक बहुत बड़ी संख्या, करोड़ों में, ऐसे लोगों की है जो इस कोष्ठक से बाहर हैं, जिनकी ट्रेन छूट चुकी है, जो हाशिये पर धकेल दिए गए हैं और पानी, भोजन, आश्रय, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करते हुए अपनी जिंदगी खपा देते हैं। निर्धन पैदा होकर निर्धन ही मर गए लोगों की संतति अपना अपराध जानना चाहती है, लेकिन कहीं से कोई जवाब या सांत्वना नहीं मिल पाता। इसी पृष्ठभूमि से उपजे असंतोष की आग लोगों को ‘कुछ भी’ करके ‘कुछ भी’ हासिल कर लेने के लिए प्रेरित करती है। मेट्रो में सीट पा चुकी सवारी की आंखों में अपने लिए उपेक्षा-तिरस्कार-अवमानना तलाशती खड़ी सवारी अगली दफा हर कीमत पर अपने लिए एक अदद सीट आरक्षित कर लेने की जुगत बिठाने लगती है। यहीं पर ‘ईमानदारी’ की हत्या हो जाती है। हम सबके दामन पर इसके दाग हैं, लेकिन कुशलता, चपलता, कलाकारी और कारीगरी की मदद से हम अपने छींटों को शुभ्र-श्वेत वस्त्रों में छिपा लेते हैं और सामने वाले शख्स को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।

यह एक अंतहीन सिलसिला है। दूसरों के लिए मापदंड तैयार करना बहुत आसान है, लेगिन खुद उनका पालन करना बहुत ही कठिन होता है। हम छोटे-छोटे और तात्कालिक मामूली लाभों के लिए भी खुद को चारित्रिक और नैतिक विचलनों से नहीं रोक पाते हैं। अपने हर कार्य को उचित ठहराने और नैतिकता का जामा पहना देने की प्रवीणता है हममें। पतन और विचलन के इन्हीं कमजोर क्षणों में खुद को बेदाग निकाल लाना ईमानदार जीवनशैली है। इसके लिए हमें बहुत बलशाली या शक्तिशाली होने की जरूरत नहीं है। एक साधारण इंसान भी यह संयम बरत सकता है। जीवनरूपी थाली में ईमानदारी की मिठास को अनिवार्य बनाना ही होगा, अन्यथा समाचार पत्रों में रोज छपने वाली भयावह खबरें हमें अपने आगोश में ले लेंगी और हम हाथ मलते रह जाएंगे। डूबते जहाज के ऊपरी केबिन में बैठ कर हम बहुत देर तक चैन की बंसी नहीं बजा सकते!

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