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दुनिया मेरे आगे: नेकी की राह

पौराणिक युग से लेकर आज तक महार्षि दधीचि, राजा शिवि, गुरु गोविंद सिंह, ईसा मसीह, सुकरात, महात्मा गांधी, बाबा आम्टे और प्रकाश आम्टे जैसे लोग ‘स्व’ को विस्मृत कर ‘पर’ की सेवा को पुण्य कर्म मान कर इस पुनीत राह पर चल रहे हैं।

Author December 31, 2018 3:08 AM
तस्‍वीर का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए गया है।

कविता भाटिया

हाल ही में एक दिन पड़ोस में रहने वाली दसवीं कक्षा की छात्रा अपने पाठ्यक्रम में निर्धारित कवि कबीर और तुलसीदास के दोहे समझने आयी। पढ़ने-पढ़ाने के क्रम में पूजा-अर्चना, चढ़ावा और अन्य कर्मकांडों पर चर्चा चल पड़ी। बात बढ़ते-बढ़ते मानवीय मूल्यों और दिखावे-आडंबर के अंतर की ओर मुड़ गई। दोहों की व्याख्या स्पष्ट करने के साथ मैंने उसे समझाया कि किस तरह संत कवियों ने वर्ण व्यवस्था और देवत्ववादी संस्कृति के स्थान पर साधारण जन की संस्कृति और उसके जीवन को महत्त्व दिया था और आज के भूमंडलीय परिवेश में जहां हम ‘ग्लोबल’ बनने की होड़ में लगे हैं, वहां समाज का यही साधारण जन मुख्यधारा से बाहर हाशिये का जीवन जी रहा है। सहज बातचीत में पता चला कि उसके दस वर्षीय मंदबुद्धि भाई का इलाज अब उसके परिवार वाले किसी होम्योपैथिक चिकित्सक से करवा रहे हैं जो कि ‘सेवा परमो धर्म:’ की कथनी को करनी में तब्दील करने की दिशा में ऐसे बच्चों की चिकित्सा के लिए सहायतार्थ नि:शुल्क कैम्प लगाते हैं।

वहां किसी भी तरह के भेदभाव को दरकिनार कर वे अपने सहयोगी डॉक्टरों की टीम और युवा समाज सेवकों के साथ मिल कर अपनी निशुल्क सेवाएं देते हैं और उनका मुफ्त इलाज करते हैं। उसने यह भी बताया कि जब शहर के नामी बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों ने ‘अब ईश्वर की मर्जी’ कह कर हाथ खड़े कर दिए थे तो एक उम्मीद और आस लेकर उसके माता-पिता उस चिकित्सक के पास गए थे। मैं जानती हूं कि शारीरिक और मानसिक रूप से ऐसे दिव्यांग बच्चों का पालन-पोषण अत्यधिक मेहनत और जिम्मेदारी का काम है और यह प्रक्रिया सालों-साल चलती है। इसे अगर तपस्या की तरह देखा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसे में वे डॉक्टर केवल इलाज ही नहीं करते, बल्कि संवेदना और स्नेह से पगे अपने स्पर्श के जरिए बच्चों को पूरी उम्मीद बनाए रखने और उनके माता-पिता को अडिग रह कर सकारात्मकता का दामन थामे रखने की सीख भी देते हैं।

आज के दौर में नए संचार माध्यमों की गिरफ्त में होने के कारण ज्यादातर लोग आत्मकेंद्रित, आत्मसम्मोहित और आत्मप्रचार में लीन हैं। वे यथार्थ जगत की वास्तविकताओं से कट कर लुभावनी ऐसी आभासी दुनिया में ही रमे हुए हैं, जहां यथार्थ गौण हो जाता है। सोशल मीडिया का एक तरह से लती या उसकी आदत होने पर भी वह सोशल यानी सामाजिक नहीं है। ऐसे में इस सद्भावना भरे प्रयासों को सुन कर मन भीग गया। अचानक मन में गूंजने लगी बचपन में स्कूल में सीखी गई प्रार्थना के वे शब्द- ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता… मन का विश्वास कमजोर हो न… हम चले नेक रस्ते पे हमसे… भूल कर भी कोई भूल हो न’। यह सच है कि आज पूंजी और बाजार द्वारा रची गई स्वार्थ की इस दुनिया में जहां इच्छा, उपभोग, लालसा और लूटखसोट का ग्राफ निरंतर चढ़ रहा है, वहां इंसानियत का मूल्य क्षीण होता दिखता है।

पौराणिक युग से लेकर आज तक महार्षि दधीचि, राजा शिवि, गुरु गोविंद सिंह, ईसा मसीह, सुकरात, महात्मा गांधी, बाबा आम्टे और प्रकाश आम्टे जैसे लोग ‘स्व’ को विस्मृत कर ‘पर’ की सेवा को पुण्य कर्म मान कर इस पुनीत राह पर चल रहे हैं। बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान भी इस तरह के लोगों के परोपकारी कर्मों के सामने बेमानी साबित होते हैं। मेरे एक परिचित डॉक्टर एक प्रतिष्ठित अस्पताल में कार्यरत हैं? उनसे जब मैंने ‘फ्री मेडिकल कैंप’ और दिव्यांग बच्चों के अलावा डॉक्टरों की मोटी फीस के बारे में बातचीत की तो उनका जवाब सुन कर मुझे तमाचे की तरह लगा। उनका कहना था कि हम लाखों रुपए खर्च कर मेडिकल की पढ़ाई करते हैं। ऐसे में विशेषज्ञ की फीस अगर अधिक है तो क्या हर्ज हो गया? मुफ्त में जनता सेवा में क्या रखा है? मोटी फीस लेना तो हमारा हक बनता है। मन सोचने लगा कि इंसानियत और नेकी के मार्ग पर चलने का संकल्प लिए वह बचपन जब भविष्य की राह तलाशने समाज के चैराहे पर खड़ा होगा, तब क्या वे मूल्य, संस्कार और मानवीयता का पाठ उनका साथ नहीं दे पाएंगे? ऐसे में क्या वे डॉकटर नहीं, जो दिन-रात ग्रामीण, आदिवासी और आपादाग्रस्त क्षेत्रों में अपने फर्ज को ध्यान में रख कर मानवता की सेवा को ही वास्तविक धर्म मान कर अपनी सेवाएं दे रहे है? कवि मैथिलीशरण गुप्त ने मनुष्यता को पारिभाषित करते हुए कहा है कि- ‘वही मनुष्य है, जो मनुष्य के लिए मरे।’ आज जिस समाज में मजहब ही आदमी को कृपाण और त्रिशूल में बदल रहा हो, वहां ऐसे समाजसेवा के कार्य ‘मानवता ही एकमात्र धर्म है’ की भावना को जिलाए हुए हैं और इस विश्वास को पुख्ता करते हैं ‘इंसानियत शेष है’।

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