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दुनिया मेरे आगे: भरोसे की दुनिया

दरअसल, हम जिस समाज में रहते हैं, उसमें अगर अपने भीतर भरोसे के तार को अंतिम तौर पर तोड़ दें, तो शायद हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा। हां, यह सही है कि इस भरोसे के अलग-अलग आयाम होते हैं। किसी दूसरे पर भरोसा करना एक नए रास्ते का आगाज हो सकता है तो किन्हीं हालात में भरोसा टूटना जिंदगी की रफ्तार को थाम दे सकता है।

Author October 20, 2018 2:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

किसी की अंगुली थामे बच्चे जब जिंदगी के पायदान पर चढ़ते हुए एक कदम गलत उठा दें तो उन्हें अंतिम तौर पर जमीन के लायक ही नहीं मान लिया जाना चाहिए। संभव है कि फिर से सही कदम उठाने का प्यार भरा न्योता उस बच्चे को नई ऊंचाइयां बख्श दे, एक बेहतरीन इंसान बना दे। रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे तमाम मौके होते हैं, जिनमें हम मामूली गलतियों के लिए किसी की मुलाकात को आखिरी बना देते हैं या फिर कभी हम खुद भी खारिज हो जाते हैं। लेकिन जिंदगी का सफर बेहतर और नए मौकों का रास्ता है। करीब बारह साल की एक लड़की दीदी से पढ़ने आती है। उसकी मां घरेलू सहायिका का काम करके परिवार का गुजारा चलाती है। लड़की पढ़ने में काफी मन लगाती है, होशियार है। दीदी उसे पढ़ाने के साथ-साथ उसके खाने-पीने और दूसरी जरूरतों का भी खयाल रखती थीं। अचानक दीदी के पर्स से कुछ पैसे गायब होने लगे। उन्हें उस बच्ची को छोड़ कर बाकी लोगों पर संदेह हुआ। लेकिन कुछ संकेत होने पर उन्होंने उस बच्ची से भी पूछा तो उसने स्वीकार कर लिया कि पर्स से उसने पैसे लिए हैं। दीदी का दुखी होना लाजिमी था। उन्होंने बच्ची की मदद बंद कर दी। लेकिन कुछ दिनों बाद लड़की ने अपनी गलती के लिए माफी का कार्ड खुद बना कर भेजा। हालांकि घर के बाकी लोगों ने उस बच्ची को बुलाने से मना किया, लेकिन कुछ द्वंद्व से गुजरने के बाद दीदी ने उसे दोबारा पढ़ाने का फैसला किया। उनका मानना था कि कोई सख्त निर्णय लेने से पहले उसकी उम्र पर गौर करना चाहिए। उस छोटी बच्ची ने शायद नासमझी में ऐसा किया होगा। अभाव से जूझते बच्चों की भूख की सजा के तौर पर उन पर हमेशा के लिए भरोसा खोना ठीक नहीं है। दीदी की उम्मीद को उस बच्ची ने बाद में साबित किया।

मुझे भी लगता है कि अगर उस बच्ची पर भरोसा नहीं किया जाता तो शायद उसकी जिंदगी की दिशा भटक जाती। उसे दोबारा भरोसे के लायक माना गया तो उसे भी दूसरों पर भरोसा करना आएगा। यही एक बेहतर इंसान और नागरिक बनने की प्रक्रिया है। छोटे बच्चों को ऐसी गलतियों पर सख्त सजा उनके भीतर की सारी संभावनाओं को नष्ट कर दे सकती है। लेकिन सवाल है कि किसी पर किस हद तक भरोसा किया जाए! इस संदर्भ में ओशो के इस विचार से मेरी सहमति बनती है कि अगर दुनिया में निन्यानवे प्रतिशत लोग भी हमें धोखा दें, फिर भी हमें मनुष्य पर भरोसा करना चाहिए।

दरअसल, हम जिस समाज में रहते हैं, उसमें अगर अपने भीतर भरोसे के तार को अंतिम तौर पर तोड़ दें, तो शायद हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा। हां, यह सही है कि इस भरोसे के अलग-अलग आयाम होते हैं। किसी दूसरे पर भरोसा करना एक नए रास्ते का आगाज हो सकता है तो किन्हीं हालात में भरोसा टूटना जिंदगी की रफ्तार को थाम दे सकता है। हाल ही में बिहार के सुपौल जिले में त्रिवेणीगंज के एक स्कूल की लड़कियों ने जब अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का विरोध किया तो उनके स्कूल पर हमला करके करीब तीन दर्जन लड़कियों से मारपीट की गई। इसके बाद उन लड़कियों के भीतर स्कूल प्रबंधन, आरोपी छात्रों और उनके अभिभावकों, प्रशासन या सरकार पर किस तरह भरोसा करना संभव होगा! इसके बाद हो सकता है कि उन छात्राओं के माता-पिता उनकी पढ़ाई बंद करवा दें। यानी कुछ छात्रों और उनके परिवारों की आपराधिक हरकत की वजह से लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई और एक सहज व्यक्ति के रूप में जीने की भूख और कोशिशें बाधित हो जा सकती हैं। वे बच्चियां तो घर की दहलीज से बाहर किसी भरोसे पर ही निकली होंगी, ताकि बंदिशों के बरक्स खड़ी हो सकें। उसे बनाए रखना समाज और व्यवस्था ने क्यों जरूरी नहीं समझा?

इसी तरह, दिल्ली की एक लड़की मॉडल बनने के हौसले के साथ घर से बाहर निकलती है, एक लड़के से दोस्ती करती है और वही लड़का उसकी हत्या कर देता है। इस तरह की तमाम चुनौतियों के बीच कोई लड़की कैसे किसी भी रिश्ते पर भरोसा करे..! विश्वास तोड़ने वाले के लिए अगला मौका जरूरी है, लेकिन उसे अहसास हो कि भरोसा तोड़ना उसकी गलती है। इसके लिए हमारे समाज को अभी प्रशिक्षित होना बाकी है। दोबारा विश्वास करने की गुंजाइश बचे, इसके लिए किसी का जिंदा बचे रहना और मैदान में टिके रहना जरूरी है। अंगुलिमाल जैसा हत्यारा बुद्ध का भरोसा पाकर एक शानदार इंसान बन गया। भरोसा एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाव है और इसे बनाए रखना ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है। विश्वास टूटने की चोट से घायल व्यक्ति कई दफा अन्य लोगों पर भी भरोसा करना छोड़ देता है। सबको एक जैसा समझने लगता है। यह स्वाभाविक है। लेकिन बिना भरोसे के दुनिया और जिंदगी नहीं चल सकतीं। भरोसा हमें एक तरह की आश्वस्ति से सुरक्षा के बोध से भरता है। यही वजह है कि इसके छिन्न-भिन्न होने पर हम इतने ज्यादा टूट जाते हैं। इसके बावजूद एक इंसान दूसरे पर बिना भरोसा किए नहीं रह सकता है। दूसरों पर भरोसा करना हमें एक बेहतर इंसान बनाता है।

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