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दुनिया मेरे आगे: सितारों की चमक

आज बच्चे सौ में से सौ अंक ला रहे हैं और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को इस पर विचार करना जरूरी नहीं लग रहा है। कोई भी शिक्षाविद विचार कर सकता है कि किसी विषय में खासकर कला विषयों में विद्यार्थियों का सौ में से सौ नंबर आना कितना सही है!

Author May 17, 2019 1:09 AM
स्कूल के साथ अभिभावक कोचिंग पर भी पैसा बहा रहे हैं।

रमेश चंद मीणा

लगातार मेहनत करने वाले कुछ भी हासिल कर सकते हैं। जो लक्ष्य को हासिल करने की ठान कर उसी दिशा में बिना थके लगे रहते हैं, उन्हें वह सब मिलता है जिसे असंभव कहते हैं। कर्मठ, पथ के राही के लिए कोई राह कठिन नहीं हुआ करती। उसके लिए हर ऊंचाई पाना सहज होता है, लेकिन हर विद्यार्थी अपने विषय में पूर्ण हो ही, ऐसा कह पाना ठीक नहीं है। हाल ही आए सीबीएससी परीक्षा के परिणामों के बाद सौ में से सौ अंक लाने वाले सितारे आसमान में चमक रहे हैं या निजी स्कूलों की इमारतों पर बड़े-बड़े होर्डिंग पर उनके फोटो चस्पां किए जा रहे हैं। ऐसे होनहारों के माता-पिता फख्र महसूस कर रहे हैं। समाज में उनका कद एकाएक ऊंचा हो जाता है। व्यक्ति के समाज में फख्र करने और इज्जत बढ़ने के विचित्र मापदंड विकसित हो चले हैं। इसीलिए अक्सर पूछा जाता है कि आपका बच्चा किस स्कूल में पढ़ रहा है? कितने अंक अर्जित कर रहा है? इन दो बातों से बच्चे और उसके माता-पिता के स्तर को देखा जाने लगा है। यही कारण है कि महानगर से लेकर छोटे-छोटे कस्बों में कुकुरमुत्तों की तरह निजी स्कूल उग आए हैं।

आज बच्चे सौ में से सौ अंक ला रहे हैं और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को इस पर विचार करना जरूरी नहीं लग रहा है। कोई भी शिक्षाविद विचार कर सकता है कि किसी विषय में खासकर कला विषयों में विद्यार्थियों का सौ में से सौ नंबर आना कितना सही है! स्कूल-कॉलेजों में प्रवेश का कटआॅफ सौ अंक होने लगा है। निन्यानबे अंक वाले का प्रवेश मुश्किल से हो पा रहा है। यही है गलाकाट प्रतियोगिता। इस दौर में बच्चों को अंकों से ही देखा जाने लगा है।
जब पहली बार किसी विद्यार्थी को सौ में से सौ अंक मिले, तभी अगर कॉपी की जांच अन्य परीक्षक से कराई गई होती तो कला वर्ग में इतने अंक आने का आधार पता लगाया जा पाता। इस प्रवृत्ति का कितना गलत प्रभाव पड़ने वाला है, आज इसका अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं! सवाल है कि जो बच्चे पचास-साठ अंक ला पाते हैं, यह सब देख-सुन कर उन पर कैसी गुजरती होगी! मनोवैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो ऐसे बच्चे हीन ग्रंथी का शिकार हो सकते हैं। इसके दुष्परिणाम हम कोचिंग संस्थानों में आए दिन आत्महत्या की घटनाओं के रूप में हर वर्ष देख रहे हैं। हीन ग्रंथी केवल बच्चों में नहीं, माता-पिता में भी दिखाई पड़ती है। इसीलिए वे अभिभावक जम कर पैसा भी लुटाते हैं और अपने बच्चों को महंगे स्कूलों में भर्ती करवाते हैं। अब स्कूल से बढ़ कर कोचिंगों का दौर चल पड़ा है। जैसे निजी स्कूल और कोचिंग में पढ़ना स्टेट्स सिंबल हो गया है। कोचिंग में कैसा और क्या पढ़ा रहे हैं? इससे किसी को कोई लेना देना नहीं हैं। बस देखा यह जाता है कि पिछली बार उस कोचिंग से कितने छात्र सफल रहे हैं। कितनों को नब्बे या उससे अधिक अंक मिले हैं।

आखिर क्या कारण है कि तीन-चार दशक पहले तक द्वितीय श्रेणी लाने वाला विद्यार्थी फख्र से अपने रिजल्ट के बारे में बता पाता था और आज प्रथम श्रेणी वाले का चेहरा मुरझाया हुआ दिख रहा है? इस गलाकाट प्रतियोगिता ने क्या विद्यार्थियों के गले में फांसी का फंदा नहीं डाल दिया है? आखिर कम अंक लाने वाले आत्महत्या क्यों करने लगे हैं? देखा यह गया है कि किसी विषय के विशेषज्ञ अक्सर सभा, संगोष्ठियों में खुद को विद्यार्थी कह कर संबोधित करते हैं। यह मानी हुई बात है कि किसी भी विषय का ज्ञाता जब अपने विषय में पैठ करता है तो पाता है कि वह आधा-अधूरा है और बहुत कुछ जानना बाकी रह गया है। यानी हर विद्वान को लगता है कि वह विद्यार्थी है, पथ का राही है।

दरअसल, शिक्षा माफिया ने जब से शिक्षा जगत में घुसपैठ की है, तब से निजीकरण और कोचिंग का बाजार फलने-फूलने लगा है। इसी के चलते सौ में से सौ अंक लाने का उपक्रम चलन में आया है। इसके पीछे वैसे ही कारक हैं, जैसे डॉक्टर किसी खास कंपनी की दवा लिख कर मरीज के बजाय अपना और कंपनी का हित साध रहा होता है। सौ में सौ अंक से जरूरत से ज्यादा प्रभावित लोग शायद नहीं जानते कि किसी विषय में कोई एकदम पूर्ण नहीं हुआ करता। सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रहती है। सौ प्रतिशत का असर सौ में सौ नंबर या फिर साठ-सत्तर प्रतिशत लाने वाले पर सकारात्मक तो नहीं ही पड़ना है। एक के भीतर श्रेष्ठता तो दूसरे के भीतर हीन ग्रंथि की बुनियाद किसी विद्यार्थी के भीतर सीखने की ललक को बाधित कर सकती है। मनोबल का ऊंचा होना और श्रेष्ठताबोध से भर जाना- दोनों दो बातें हैं।

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