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दुनिया मेरे आगे: पहनावे की पहचान

प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास की ‘प्रभुत्वशाली संस्कृति’ की अवधारणा इस मुद्दे को समझने में सहायक है। आखिर इस तरह की परिभाषा जो किसी खास संस्कृति को भारतीय होना बताती है, उसे कौन लोग गढ़ते हैं?

Author June 12, 2019 1:25 AM
‘गुड़ीपड़वा’ आमतौर पर महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला एक त्योहार है।

अमित चमड़िया

कुछ समय पहले देश की एक राजनीतिक पार्टी में शामिल हुई बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री जब मुंबई में चुनाव के दौरान उम्मीदवार के रूप में प्रचार कर रही थीं, तो उसका एक टीवी चैनल पर सीधा प्रसारण हो रहा था। इससे संबंधित खबर प्रसारित करने वाले बहुत जोर देकर कह रहे थे कि अभिनेत्री आज भारतीय परिधान में आम लोगों को ‘गुड़ीपड़वा’ की बधाई दे रही हैं। गौरतलब है कि ‘गुड़ीपड़वा’ आमतौर पर महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला एक त्योहार है। प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि अभिनेत्री ने उस समय साड़ी पहन रखी थी। हाथों में हरे रंग की चूड़ी और बालों में सफेद फूलों का गुच्छा लटक रहा था। आम रुचि के मुताबिक देखें और साधारण लोगों के बीच बोलचाल की भाषा में भी इसी तरह के पहनावे को हम शुद्ध भारतीय परिधान के रूप में स्वीकार करते हैं। जब कभी किसी माध्यम में इस तरह के पहनावे वाले दृश्य नजर आते हैं तो हम तुरंत कह देते हैं कि यह तो शुद्ध भारतीय है। बॉलीवुड की फिल्मों में ऐसे पहनावे वाले दृश्य खूब नजर आते हैं।

सवाल है कि भारतीय परिधान का मतलब क्या होता है? अभिनेत्री या किसी भी महिला के इस पहनावे को ही क्यों हम भारतीय परिधान मानते हैं? भारतीय होने का क्या मतलब है? कैसे आम बोलचाल की भाषा में इस तरह की पोशाक को ही भारतीय माना गया? आमतौर पर उत्तर भारत के शाकाहारी खाने को ही हम क्यों शुद्ध भारतीय खाना मान लेते हैं? इस तरह के सवाल जरूरी हैं, क्योंकि हम बहुलतावादी संस्कृति वाले देश में रहते हैं जो इसकी विशेषता और खूबसूरती है! इस विविधता वाले देश में किसी खास संस्कृति यानी उसके पहनावे, खानपान और बोली, जीवन पद्धति आदि को ही केवल भारतीय मानना क्या इस देश के दूसरी अन्य संस्कृति को मानने वाले लोगों के साथ भेदभाव नहीं है? और क्या इस तरह का भेदभाव उनमें अकेले या अलग होने की भावना नहीं पैदा करता है? खासकर तब जब देश की एक बड़ी आबादी की संस्कृति हाशिये पर हो। हमारा संविधान भी इस बात की इजाजत नहीं देता है कि केवल किसी खास पहनावे और खानपान को भारतीय माना जाए। क्या एक खास तरह की संस्कृति को ही भारतीय मानना भारतीय होने को संकीर्ण नजरिये से देखना नहीं है? हम देश के आदिवासी समुदाय के परिधानों या उत्तर-पूर्व के राज्यों मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड आदि के परिधान को भी मुख्य भारतीय परिधान के रूप में मानने से क्यों हिचकते हैं? क्या दक्षिण भारत का पहनावा भारतीय परिधान नहीं है? जिस परिधान को कुछ लोग पाश्चात्य देशों के पहनावे के तौर पर देखते हैं, अगर उसे कोई भारतीय पहनता है और वह आम है तो क्या वह भारतीय परिधान नहीं होगा? यह सुनने को कभी नहीं मिला होगा कि आदिवासी समुदाय के परिधानों या पूर्वोत्तर के राज्यों के परिधानों को देख कर लोग बोलें कि यह भारतीय परिधान है!

इसके अलावा, दूसरी बात और ज्यादा गंभीर है कि कैसे एक खास संस्कृति को ही समाज में भारतीय संस्कृति होने की स्वीकृति मिली होगी? क्या इसमें संचार माध्यमों की भूमिका शामिल नहीं है? आखिर कैसे सूचना का प्रसार करने वाले लोग इस तरह की गंभीर गलतियां कर बैठते हैं और उन्हें शायद इस चूक का आभास भी नहीं होता होगा! लोग इसे बहुत स्वाभाविक मान लेते हैं। दरअसल, जब कोई पत्रकार किसी मीडिया संस्थान में काम करता है तो उसके साथ उसकी अपनी संस्कृति भी होती है। वह उस संस्कृति के साथ ही सूचनाओं का प्रसारण करता है। और चूंकि समाज से लेकर संचार माध्यमों में ज्यादातर लोग उसी संस्कृति को मानने वाले होते हैं, इसलिए आमतौर पर केवल उसे ही भारतीय संस्कृति के रूप में मान लिया गया है। जब तक ऐसी जगहों पर अलग-अलग संस्कृति को मानने वालों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक इन जगहों पर बैठे लोगों की ओर से ऐसी गंभीर गलतियां होती रहेंगी और उन्हें हम स्वाभाविक मान कर स्वीकार करते रहेंगे।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास की ‘प्रभुत्वशाली संस्कृति’ की अवधारणा इस मुद्दे को समझने में सहायक है। आखिर इस तरह की परिभाषा जो किसी खास संस्कृति को भारतीय होना बताती है, उसे कौन लोग गढ़ते हैं? भारतीय होने की इस संकीर्ण परिभाषा को बदलने में वक्त लगेगा और यह तभी संभव है जब मीडिया के आंतरिक ढांचे को हम बहुल संस्कृति वाला नहीं बना देते, क्योंकि किसी खास विचार को फैलाने में मीडिया की भूमिका बड़ी है। इसके बहुल संस्कृति होने से यह ज्यादा लोकतांत्रिक हो जाएगा और मुख्यधारा की नजरों से अलग बसी दूसरी संस्कृति में भी सामाजिक अलगाव की भावना पैदा होने की आशंका लगभग समाप्त हो जाएगी। देश की अलग-अलग संस्कृति के विभिन्न रंग वाले पहनावे को भी भारतीय पहनावे के रूप में मानना देश के लिए सुखद साबित होगा।

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