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दुनिया मेरे आगे: भूलते भागते क्षण

मोबाइल तकनीक और गैजेट्स के शौक ने बड़ों को ही नहीं, बच्चों को भी अपनी गिरफ्त में ले रखा है। बड़ों के सिर से तो इसका फितूर उतरने लगा है, लेकिन बचपन के लिए तो ये एक जादू की छड़ी-सा है।

Author May 18, 2019 3:01 AM
हमारे बच्चे हैरानी से ताकते हैं कि ऐसा भी होता था?

अनीता सहरावत

बचपन को जल्दबाजी होती है बड़ा होने की और बड़ों को मलाल होता है बचपन पीछे छूट जाने का। दरअसल, यह महज उम्र का एक पड़ाव नहीं, सिर्फ एक वक्त नहीं जो गुजर जाता है। यह तो वह जिंदगी होती है जिसे हमने वाकई जीया होता है। पहले लेखों, चर्चा-परिचर्चा का विषय होता था कि कामकाजी होती जिंदगी में अभिभावकों के पास बच्चों के लिए समय नहीं है। अब यह दृश्य बदल रहा है। अब अभिभावक बच्चों के बचपन से अकेले हो रहे हैं। अब बच्चे धूल-मिट्टी के खेल नहीं खेलते। कंचे-कंकड़ के खेलों का तो उन्हें नाम भी नहीं पता। गिल्ली-डंडा, पकड़म-पकड़ाई खेलने वाली टोली अब गली में नहीं दिखती। मिट्टी के घरौंदों पर अपना नाम लिखे कागजी झंडे अब नहीं लगते। छुट्टियों में नानी के घर की याद अब हमारे बच्चों को नहीं आती।

अरसा बीत गया उस जमाने को गुजरे जब अप्रैल आते ही मई-जून की मौज-मस्ती और तफरीह की योजनाएं बनने लगती थीं। तपती दुपहरी और भभकती शाम में गरमी की छुट्टियां राहत लेकर आती थीं। घरों के शोर-शराबे से ही ननद-फूफी के आने का पता चल जाता था। सुबह-शाम गलियों, चौपालों में बच्चों की टोली का हो-हुल्लड़ होता था तो तपती दोपहर कैरम, लूडो, सांप-सीढ़ी की गोटियों की टकाटक से खनकती रहती थी। रात दादी-नानी के किस्से-कहानियों से पूरी होती थी। उनकी बगल में बैठ कर, लेट कर कहानियां सुनने के लिए लड़ाइयां होती थीं और सबकी बारी के लिए अलग-अलग दिन बंटते थे। लेकिन अब छुट्टियां नहीं, ‘वेकेशंस’ होते हैं, जो घर और घर वालों से दूर ‘हिल-स्टेशन’ और ‘टूरिस्ट’ जगहों पर मनते हैं।

अब जो बच्चे बाहर घूमने नहीं जा पाते, वे भी नानी के घर का रास्ता भूलने लगे हैं। उनके पास खुद को व्यस्त रखने और मनोरंजन के बहुतेरे विकल्प हैं। तो क्या हमारे पास विकल्पों की कमी थी, जिसके चलते हम नानू के घर जाने के लिए बेचैन रहते थे? नहीं, तब छुट्टियां वाकई छुट्टियां होती थीं। सिर्फ मौज-मस्ती और बेफ्रिकी से लबरेज। लेकिन अब तो खेल भी ‘गेम्स’ हो गए हैं। हमारे बच्चों को नए दोस्त मिल गए हैं, जो बड़े ‘हाईटेक’ हैं। उनके पास हर सवाल का जवाब है। अब साइकिल चलाना भी वे गलियों में नहीं ‘पार्क’ और ‘लॉन’ में सीखते हैं। छुट्टी के दिन घूमने के लिए उन्हें ‘शॉपिंग मॉल’ जाना होता है। मेलों के रेले नहीं, अब तो ‘फेयर’ सजते हैं। गिनती में बदलते बचपन की प्राथमिकताएं नहीं समा सकतीं।

मोबाइल तकनीक और गैजेट्स के शौक ने बड़ों को ही नहीं, बच्चों को भी अपनी गिरफ्त में ले रखा है। बड़ों के सिर से तो इसका फितूर उतरने लगा है, लेकिन बचपन के लिए तो ये एक जादू की छड़ी-सा है। ऐसा नहीं है कि हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे बचपन भरपूर जीएं, लेकिन शहरों की चकाचौंध और सुविधाओं की रेलमपेल में बिसरा चुके हैं हम अपना बचपन। हर पीढ़ी के पास अपने किस्से होते हैं सुनाने को, जिसमें बचपन का अलबेला पाठ होता है। रोम-रोम में सरसराहट और उन्माद भरता वह अतीत अब किस्से-कहानियों का ही हिस्सा बन चुका है। हमारे बच्चे हैरानी से ताकते हैं कि ऐसा भी होता था?

हमारे बच्चों के पास यह सब कहां होगा बताने को? उनके किस्सों की तस्वीर ही अलग होगी, जिसमें न साथी होंगे और न परिवार। होंगे तो सिर्फ इंटरनेट पर नित नए उगते ‘ऐप’ और ‘स्टेटस अपडेट’, जिससे यादें अब संजोने, सहेजने की चीज नहीं रहीं। फेसबुक और वाट्सऐप पर उनकी भी उंगलियां खूब दौड़ती हैं। कभी दो संतरे की टॉफियों से लुभाया जाने वाला बचपन अब मोबाइल और दूसरे गैजेट्स से कम पर सौदा तय नहीं करता। हम भी बड़े फख्र से अपने आधुनिक होने का सबूत पेश करते हैं और दोस्तों, रिश्तेदारों के सामने इतराते हैं कि हमारा बच्चा कितना हाइटेक हो चला है।

हम उन्हें जिंदगी जीने के लिए नहीं, प्रतियोगी बनने और जीतने के लिए तैयार करते हैं। मजबूरी है, उनमें अंकों के बीज डालना, क्योंकि प्रतिशत ही हर जगह उनकी काबिलियत का पैमाना है। पहले बच्चों को घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ छोड़ देते थे, लेकिन अब उन्हें व्यस्त रखने के ज्यादा आसान तरीके या और तकनीक हैं हमारे पास, जिससे चिपक कर बच्चा घंटों खाने-पीने की सुध भी न ले। यह तकनीक सहूलियत भले ही समेटे हो, लेकिन इसकी डगर आसान कतई नहीं है। आजकल के बच्चे हर तरीके से अपनी उम्र से आगे समझदार और परिपक्व हो रहे हैं, क्योंकि गैजेट्स और इंटरनेट ने सब कुछ अंगुलियों पर नचा दिया है। समझ ही नहीं आ रहा कि हम जरूरतों के हिसाब से तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर तकनीक हमारी जरूरतें तय कर रही है। लेकिन दशा खराब न हो इसलिए इसकी दिशा पर पैनी नजर और नकेल डालने का जिम्मा माता-पिता का ही है।

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