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दुनिया मेरे आगे: बर्तन पर नाम

संयुक्त परिवार के कई छोटे परिवार में बंट जाने से जब लोग एक ही मकान में अलग-अलग रहने लगते थे तो उन लोगों के बीच भी भोजन का आदान-प्रदान होना सामान्य बात होती थी। इससे बर्तन के एक दूसरे के यहां के बर्तनों में मिल जाने की संभावना ज्यादा रहती थी।

Author July 23, 2019 1:22 AM
प्रतिकात्मक चित्र।

अमित चमड़िया

जब हम सामाजिक सहयोग और एक-दूसरे पर निर्भरता के समाज की बात करते हैं तो हमें आज भी ग्रामीण इलाकों का ही हवाला देना पड़ता है। एक संदर्भ आस-पड़ोस के लोगों के बीच बर्तनों के आदान-प्रदान का रहा है। लेकिन अब समाज के उस स्वरूप में बदलाव आ रहा है। मां अब बर्तन पर बाऊजी का नाम नहीं लिखवाती हैं, क्योंकि अब हमारे घर के बर्तन सिर्फ ‘हमारे’ हैं। मां बताती हैं कि पहले आस-पड़ोस और घर के पास में रहने वाले रिश्तेदारों के यहां कुछ खाने-पीने के सामान भेजना और उनके यहां से इसी तरह आना आम बात थी। कभी किसी ने चटपटी सब्जी बना ली या किसी ने अच्छी मिठाई बना ली तो वह पड़ोस में या नजदीक में रहने वाले सगे-संबंधी या फिर पड़ोसी को जरूर इसका स्वाद चखाता था।

संयुक्त परिवार के कई छोटे परिवार में बंट जाने से जब लोग एक ही मकान में अलग-अलग रहने लगते थे तो उन लोगों के बीच भी भोजन का आदान-प्रदान होना सामान्य बात होती थी। इससे बर्तन के एक दूसरे के यहां के बर्तनों में मिल जाने की संभावना ज्यादा रहती थी। दरअसल, कई बार आसपास के अनेक घरों में बाजार से खरीदे गए बर्तन एक ही तरह के होते थे। ऐसी स्थिति में बर्तनों की एक ही शक्ल होने से उन पर गुदे हुए नाम ही उनकी पहचान होते थे। समारोह आदि में भी घर के बर्तन एक-दूसरे की जरूरत में काम आते थे। भारतीय परिवार चूंकि ज्यादातर पुरुष प्रधान होते हैं, इसलिए बर्तन पर किसी घर के मुखिया का नाम लिखवाने की परंपरा रही है।

मेरे एक मित्र बताते हैं कि उनके यहां घर के बड़े बर्तन और चौकी-खटिया आदि पर लाल या हरे रंग के विशिष्ट निशान लगा दिए जाते थे, ताकि शादी या अन्य बड़े समारोह में जब ये सामान दूसरे घरों में जाते थे तो सामान मंगाने वाले को यह पहचानने में आसानी होती थी कि फलां चीज किसके घर से आई है। एक अन्य मित्र कहते हैं कि हमारे मोहल्ले में आज भी लोग किसी आयोजन पर मेरे घर से बर्तन ले जाते हैं। इसलिए हमारे घर के बर्तन को भी एक पहचान मिली हुई है रंगों के निशान से और पिताजी के नाम से।

मगर नई पीढ़ी बर्तन को पहचान देने की परंपरा पर थोड़ा आश्चर्य करती है। उसे यह बड़ा अटपटा लगता है जब कोई बर्तन पर नाम गुदाता है। अब गांव में भी शादी या अन्य किसी समारोह के लिए जरूरत के बर्तन भाड़े पर मिल जाते हैं। लोग भाड़े के बर्तन लेने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। इसलिए भाड़े पर बर्तन देने की दुकान भी हर जगह दिखाई पड़ जाती है। आपस में खाने-पीने की चीजों का आदान-प्रदान भी लगभग खत्म हो गया है। अगर कभी जरूरत पड़ी भी तो लोग ‘डिस्पोजल’ यानी एक ही बार प्रयोग में आने वाले बर्तन से काम चलाते हैं। यों ये ‘डिस्पोजल’ बर्तन पर्यावरण के लिए ठीक नहीं हैं, लेकिन बाजार ने इन्हें हमारी सुविधा का हवाला देते हुए आवश्यक बना दिया है। इसके बीच वर्तमान में समाज के ‘विकास’ की जो दिशा है, उसमें आपसी मेलजोल का भाव कम नजर आता है।

समाज में बर्तन पर नाम लिखवाने की एक और वजह मिलती है। जब घर के किसी बड़े-बुजुर्ग की मृत्यु हो जाती है तो उस समय लोगों को स्मृति चिह्न के रूप में या दान स्वरूप बर्तन दिए जाते हैं। उस बर्तन पर भी मरने वाले का नाम गुदा रहता है, ताकि उसे लंबे समय तक याद रखा जा सके। यह परंपरा आज भी भारत के कुछ मध्यवर्गीय परिवारों में जारी है, लेकिन अब यह सामूहिकता का बोध नहीं कराती है।

राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले समुदायों के बीच बर्तन पर नाम लिखवाने का चलन ज्यादा है क्योंकि वे मारवाड़ क्षेत्र से जिस भी नई जगह पर बसने गए, वहां संगठित होकर रहने लगे। उनमें आपस में मेलजोल ज्यादा होने लगा। फलस्वरूप खाने-पीने की चीजों का आदान-प्रदान भी होने लगा। बर्तन के एक-दूसरे के यहां मिल जाने या खो जाने के डर से लोग अपने-अपने बर्तन पर घर के मुखिया का नाम लिखवाने लगे, ताकि बर्तन पहचानने में आसानी रहे। अब इस समुदाय के लोग भी समाज के ‘विकास’ की दिशा के साथ चल रहे हैं, जिसके चलते अब इन्हें भी नए खरीदे बर्तन पर नाम लिखवाने के जरूरत महसूस नहीं होती है। भारतीय समाज में कुछ परंपराएं ऐसी रही हैं, जिनके गुण-दोष पर चर्चा हो सकती है, पर साथ ही उनमें से कई हमारे संजीदा होने का प्रमाण भी देती हैं और एक सुखद अहसास कराती है। बर्तन पर नाम लिखवाने का चलन भी उनमें से एक है।

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