दुनिया मेरे आगे: गांव की खुशबू

सही है कि गांवों में शहरों जैसी तकनीक नहीं आई है, लेकिन आवश्यकता भर सुविधाएं यहां भी पहुंच गई हैं। लोग गांव में भी अब आमतौर पर गैस-चूल्हे का प्रयोग करते हैं। बहुत सारे घरों में पंखा भी दिख जाता है और बिजली रहने पर टेलीविजन का प्रयोग भी।

कुलीना कुमारी

हाल ही में कुछ दिन एक ग्रामीण इलाके में रहने का अवसर मिला। मेरी वह अवधि मूसलाधार बारिश के बीच कटी। इसके बावजूद ग्रामीण इलाके में पर्व-त्योहार के नाम पर ऐसी एकजुटता देखी कि मैं दंग रह गई। लोग बारिश से बेपरवाह भीगते हुए भी उस समय मनाए जाने वाले उत्सव में हर स्तर पर अपनी भागीदारी कर रहे थे और आसपास मौजूद लोगों के साथ शामिल हो रहे थे। हां, बारिश की वजह से जो थोड़ी असुविधा हो सकती थी, वह हो रही थी। इससे इतना तो समझ आया कि अभी भी ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के भीतर बहुत सरलता, निश्छलता और अपनापन है। लेकिन इनके बरक्स समाज में जो कुछ खुराफाती और अराजक लोग होते हैं, वे भोले-भाले या सीधे-सादे लोगों के निश्छल स्वभाव को गलत दिशा में मोड़ कर कभी-कभी दंगा-फसाद करा देते हैं।
इस सबके बावजूद प्राकृतिक रूप से अभी भी हमारे गांवों में मिट्टी, भोजन के आधार के रूप में किसानी और भारत की खुशबू नजर आती है। नए लोगों को देख कर वे ऐसे पूछते हैं जैसे उनके बारे में जानना, उनकी आवभगत करना और भटके राही हों तो सही जगह तक पहुंचाना उनका विशेष कर्तव्य हो। इसी ग्रामीण इलाके में मेरी एक परिचित अनजान होने की वजह से गंतव्य से करीब तीन किलोमीटर पीछे उतर गई थी। लेकिन इस बीच उसने एक व्यक्ति से अपनी परेशानी क्या बताई, वह उसे घर तक छोड़ आया। ऐसी कितनी ही बातें शहरी लोगों को ग्रामीण इलाके में आने पर महसूस हुई होंगी जो उनके मिट्टी से जुड़े होने का अहसास कराती हैं, शहरी लोगों के मुकाबले ज्यादा मानवीय होने का परिचय देती हैं।

सही है कि गांवों में शहरों जैसी तकनीक नहीं आई है, लेकिन आवश्यकता भर सुविधाएं यहां भी पहुंच गई हैं। लोग गांव में भी अब आमतौर पर गैस-चूल्हे का प्रयोग करते हैं। बहुत सारे घरों में पंखा भी दिख जाता है और बिजली रहने पर टेलीविजन का प्रयोग भी। कुछ जगहों को छोड़ कर अधिकतर जगह सड़क भी बन चुकी है और आवाजाही के साधन भी मिलने लगे हैं। हालांकि आज भी देश में ऐसे इलाके हैं, जहां के लोग इन सब सुविधाओं से वंचित हैं। इसके अलावा, आमतौर पर जड़ समाजों के रूप में देखे जाने वाले गांवों में भी अब कई लोग प्रगतिवादी सोच वाले मिल जाते हैं। मेरे वहां के लोगों से मिलने-जुलने के क्रम में पता चला कि हाल ही में उस गांव के एक चाचा ने रिश्ते में लगने वाली अपनी ही भतीजी के प्यार में पड़ कर आपसी सहमति से विवाह कर लिया। शुरुआत में इस खबर ने गांव भर में खलबली मचा दी थी। बेशक उस परिवार का गांव वालों ने शुरू में बहिष्कार कर दिया था, लेकिन उस प्रेमी जोड़े की जान नहीं ली। धीरे-धीरे सब सहज हो गया। यह सब गांव वालों के बीच बढ़ती प्रगतिशील सोच का प्रतीक है।

इसके बावजूद इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि रोजी-रोटी की तलाश में बड़ी संख्या में लोग आज भी गांव से पलायन कर रहे हैं, क्योंकि शहरों जैसी फैक्ट्रियां या नौकरी करने की जगहें वहां नहीं हैं, जहां लोग कमा सकें और परिवार चला सकें। इसीलिए कुछ बुजुर्गों के चेहरे पर उनके बेटे के प्रवासी होने की पीड़ा और दुख मौजूद था। शहरी कमाऊ बेटा साथ नहीं रह सकता तो न रहे, लेकिन पैसा तो भेजे हर महीने। यह कहना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन आखिर वे क्या करें! गांव के अंचल में रहने वाले पुत्र के सिवा शहरी बेटा-बहू उनको रखने या जिम्मेदारी लेने के लिए ही तैयार नहीं था।

सोचने वाली बात है कि कितनी भूख है शहर में कि वहां इंसान ढेरों कंपनियां, फैक्ट्रियां और कमाई के साधन होने के बावजूद तृप्त ही नहीं हो रहा है। उसे और चाहिए। वह सिर्फ पाना चाहता है, लेकिन अपने मां-बाप के प्रति कर्तव्यच्युत होने से उसे परहेज नहीं। वह बांटना नहीं चाहता। ठीक है कि शहरीकरण ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित होना सिखाया है। इसी बीच प्रगति की रफ्तार बढ़ गई है। लोग अपने मन से जी पा रहे और स्वतंत्र अभिव्यक्ति कर पा रहे हैं। लेकिन जिन्होंने पैदा किया, जिनकी बदौलत खड़े हुए, उन्हें भुला कर जीवन जीना उचित तो नहीं।

मैंने गौर किया है कि इंसान कितना भी स्वार्थी क्यों नहीं हो, लेकिन अंतिम समय में जैसे उसे अहसास हो जाता है कि जीवन का असली मतलब अपनों के संग मिल कर जीना है। शहरी चकाचौंध में खुद को डुबो लेना या किसी चीज को पकड़े रहना क्या खराब नहीं है? जबकि होना यह चाहिए कि गांव की मिट्टी में पले लोग शहर से अच्छी चीज सीख कर गांव में लौटें और प्रयोग करें और गांव को भी उन्नत बनाने में सहयोग करें। यह इसलिए भी जरूरी है कि मनुष्य सांस जमीन पर लेता है तो जीते-जी उसे जन्मदाता को और अपनी मिट्टी को नहीं भूलना चाहिए।

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