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दुनिया मेरे आगे: बातों का अलाव

बचपन के दिन याद आते हैं जब जाड़ों में हम सारे भाई-बहन अलाव के पास बैठे रहते थे और अम्मा हमें देसी घी डाल कर गरमा-गरम दाल-भात या खिचड़ी परोस देती थीं।

Author Published on: January 10, 2020 1:15 AM

सरस्वती रमेश

उतरता पूस और चढ़ता माघ बातों के अलाव का महीना होता है। घर-आंगन में बोरसी में जलती आग के इर्द-गिर्द बैठ कर जो बतकही होती है, वही तो जाड़ों से निचोड़ी गई गरमाहट होती है! गांवों में जलते अलाव के इर्द-गिर्द जमी ‘पब्लिक कैबिनेट’ का नजारा आम रहता है तो घर के बड़े-बुजुर्गों को भी आग की आंच में ही जिंदगी का लब्बोलुआब मिलता है। एक जगह ही बैठ कर पूरे गांव की खबर मिल जाती है। अपने आप बने समूह में एक ओर से संदेश भेजे जाते हैं और दूसरी ओर से लिए जाते हैं। रिश्तों की बातें हो जाती हैं। गांठ जुड़ जाती हैं। दूरदराज में रिश्तेदारियां निकाल ली जाती हैं। खेती, किसानी, पंचायत और देश-दुनिया सबकी बातें, गिले-शिकवे, दोस्ती-दुश्मनी- सब कुछ अलाव के इर्द-गिर्द ही पनपता, उफनता और बनता-बिगड़ता है। बच्चे घर-आंगन में उधम मचाते फिरते हैं, गलियों में दौड़-कूद में मगन रहते हैं। माएं कितना भी उनकी फिक्र करें, मगर बच्चों को ठंड की कुछ चिंता नहीं होती। जाड़े को लेकर बाबा अक्सर एक कहावत कहते थे- ‘बच्चों को छूता नहीं, जवान हैं सगे भाई। बुड्ढों को छोड़ता नहीं, चाहे ओढ़े सौ-सौ रजाई।’

गरमी बेचैनी तो शीत इत्मीनान का मौसम होता है। जैसे बर्फीले पहाड़ों से होती हुई ठंडी हवाएं इत्मीनान से मैदानों में आती हैं। जैसे आसमान में छिपा सूरज हौले से धरती पर उतर कर आता है। वैसे ही इत्मीनान के रेशों से फंदे डाल कर घर की भाभियां, चाचियां आपस की बतकहियों के बीच परिवार के बच्चों, बड़ों के लिए गरमाहट का लिबास तैयार करती हैं। दूसरी ओर, दादियां, ताइयां गाजर, मूली, गोभी, आंवले के मसालेदार, चटपटे स्वाद को बरनियों में भर कर महीनों के लिए संजो कर रख देती हैं। मकर संक्रांति की कड़कड़ाती ठंड में तिल के लड््डुओं, गजक, रेवड़ियों की गर्म तासीर हो या गुनगुनी धूप में बैठ कर सबके साथ मूंगफली खाना..! यह सब जाड़ों का सामान्य अभ्यास है। दरअसल, जाड़ों की तो बात ही निराली है। सच कहें तो खाने का असली मजा जाड़ों में ही मिलता है। और अगर आप गांव में रहते हैं तो बात ही क्या है! सूखी पत्तियों में पकाया हो या धान की भूसी में पकाया शकरकंद। कड़ाहों में खौलते ईख के रस से बनते गुड़ की खुशबू इस मौसम में गांव की बहुत शिद्दत से याद दिला जाती है। भला यह सब शहरों-नगरों में मयस्सर कहां? अगर ग्रामीण इलाकों में जीवन गुजरा है तो शहरों में इन चीजों की याद जरूर सताती है!

बचपन के दिन याद आते हैं जब जाड़ों में हम सारे भाई-बहन अलाव के पास बैठे रहते थे और अम्मा हमें देसी घी डाल कर गरमा-गरम दाल-भात या खिचड़ी परोस देती थीं। क्या स्वाद से खाते थे हम..! महीने दो महीने में अम्मा परांठे सेंकती तो हम सब गोभी-मटर की सब्जी से खाते। शाम को पापा आल-दम बनवाते। कितना स्वाद था आलुओं में भी। अब तो हाई ब्रिड सब्जियों ने सारा मजा ही किरकिरा कर दिया है। कहां मिलता है अब वे देसी स्वाद आज की सब्जियों में।

इन सबके बीच चुपके से पता नहीं कितना कुछ बदलता गया! गांव के वे तमाम अहसास भी धीरे-धीरे गुम होते गए। महानगरों ने हमें पैसा-कॅरियर जरूर दिया, मगर जीवन की बहुत सारी अनमोल चीजों से दूर भी कर दिया। इनमें सबसे ज्यादा खटकने वाली चीज है एक दूसरे से मिलना-जुलना और आपस की बतकही खत्म होना। हालत तो यह है कि बड़े-बड़े अपार्टमेंटों या सोसाइटियों में हजारों लोग एक ही परिसर में रहते हैं और लोगों के घर के पते नंबरों में जानते हैं। सामने वाले घर का नंबर क्या है, यह तो पता होता है, लेकिन उसनें रहने वाले का नाम क्या है, यह पता नहीं!

इसके बावजूद कहीं गाहे-बगाहे अगर वे चीजें महानगरीय जीवन में कभी-कभार मिल जाती हैं तो मन आनंदित हो उठता है। देखिए न, कुछ दिन पहले ही पड़ोस वाली भाभी के घर किसी काम से जाना हुआ। वैसे तो फ्लैट संस्कृति ने चूल्हे में खाना बनाने की संस्कृति का गला घोंट दिया है, मगर भाभी ने छत पर मिट्टी के एक चूल्हे का जुगाड़ कर रखा है। मैं पहुंची तो मक्के, बाजरे की रोटियां सेंकी जा रही थीं। उन रोटियों को देख कर जी ललच उठा। हथबेली रोटियां काफी मोटी होती हैं, लेकिन चूल्हे में सेंके जाने के बाद एकदम करारे अवतार में निकलती हैं। भाभी ने खाने को पूछा भर था और मैं इनकार न कर सकी। कई बरस बाद हथबेली रोटियां खार्इं। फिर तसले में जली आग के इर्द-गिर्द बैठ कर अपने-अपने पीहरों के अनुभव बांटे। कुछ देर के लिए गई थी और घंटा भर लगा के आई। कुछ भी हो रेस्टोरेंट, पार्टियों और समारोहों में होने वाली औपचारिक मुलाकातों में कितनी आत्मीयता, प्रगाढ़ता होती है, यह किसी से छिपा नहीं। लेकिन इन छोटी अनौपचारिक मुलाकातों से बने रिश्तों में आजीवन पहचान की गरमाहट कायम रहती है। बातों का अलाव सुलगता रहता है।

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