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मेरा क्या

क्या सच में यह चमकदार और सुनहरे गहनों, कपड़ों और अट्टालिकाओं की चाह भर है या कुछ और, जिसे वह खुद से हासिल करने में असमर्थ होने के कारण खुद से ही समझौते करती है?

Author Published on: April 10, 2019 1:52 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

जीनत

कुछ समय पहले मैं अपने एक पड़ोसी के घर गई। उनके यहां आए रिश्तेदारों में से एक महिला ने सबके सामने मुझसे कहा कि तुमने नाक नहीं छिदवाई है, कितनी बुरी शक्ल वाली लग रही है! एक पल को मैं उन्हें बस देखती रह गई। उनकी प्रतिक्रिया मेरे जेहन में घूमती रही। इसके बाद सबकी नजरें मेरी नाक पर आ टिकीं। मैं समझ नहीं पाई कि ये सब औरतें कौन हैं! क्या ये वही औरते हैं, जिनके अंदर इच्छाओं और उमंगों के अनेक फूल खिलते हैं। या फिर ये पितृसत्ता से बंधी वे औरतें हैं जो बस वही देखती, सोचती और करती हैं, जो पितृसत्ता के सत्ताधीश उनसे करवाना चाहते हैं? क्या फिर पितृसत्ता ने वक्त के मुताबिक नया स्वांग रचा है, जिसे मेरा रहन-सहन, शृंगार, सबसे सख्त नाराजगी है।

पितृसत्ता हर औरत को अपनी गिरफ्त में लेकर उसे वैसा ही बनाना चाहती है, जैसा उसे देखना अच्छा लगता है। इस बात की बारीकी को समझते हुए ही सिमोन कहती हैं कि ‘औरत पैदा नहीं होती, बल्कि बनाई जाती है।’ वह अपने साथ नजाकत, हया, घबराहट लेकर पैदा नहीं होती। अगर ऐसा होता तो फिर लड़के में भी ये गुण होने बहुत जरूरी हैं। पुरुषवादी मानसिकता ने एक नहीं, मानसिकता के कई रूपों से बहुत सारी औरतों को अपनी फौज में शामिल किया है। वे औरतें हर जगह यह देखती फिरती हैं कि लड़की कहीं लड़की होने की लक्ष्मण रेखा तो नहीं लांघ रही है। अगर वह लांघ रही है और अपने हिसाब से जीने की कोशिश कर रही है, तो उसे लज्जित करते देर नहीं करतीं कि तुम अपने रास्ते कैसे बना सकती हो… तुम तो परजीवी हो और तुम्हें वही बने रहना है।
कुछ साल पहले एक किताब आई थी, जिसके मुखपृष्ठ पर गढ़े गए चित्र में एक स्त्री सीढ़ियां चढ़ रही थी, पर वह आखिरी सीढ़ी नहीं चढ़ पाती। कक्षा में सवाल करने पर जवाब मिला कि किसी भी स्त्री का सम्पूर्ण कामयाब होना पुरुष या पुरुष मन को बर्दाश्त नहीं होता। कोई न कोई बाधा पैदा कर उसे सीढ़ियां चढ़ने से रोक ही दिया जाता है। स्त्री के फैसला लेने की शक्ति को ही उसकी कमी बता कर सामूहिक रूप से उसके मनोबल पर चोट की जाती है और कमजोर बनाया जाता है। दरअसल, समस्या केवल बराबरी की नहीं, अस्तित्व की भी है। जब हम अपने अस्तित्व की ही रक्षा नहीं कर पा रहे तो हमारी बराबरी की बात तो कहीं दूर पंक्ति में खड़ी होगी। इस अस्तित्व की रक्षा कैसे करनी है, इसके बारे में मैं कोई ठोस राय नहीं बना पा रही हूं। हालांकि मैं बराबरी को केवल इस रूप में नहीं देखती कि पढ़-लिख कर रोटी नहीं बनाएंगे या कपड़ों में केवल जींस पहनेंगे। जबकि मुझे सलवार-सूट पहनना बहुत पसंद है और शायद पढ़ कर मैं अपने सारे काम और बेहतर कर सकूं… ज्यादा अच्छी रोटी बना सकूं। पर इस तरह की बातें केवल कॉलेज और विश्वविद्यालयों में या मंचों पर अच्छी लगती हैं। इससे इतर हर समाज अपनी संस्कृति के अनुसार उन चीजों से निपटता है।

जाने क्यों मुझे यह बात समझ नहीं आती है कि आखिर स्त्री का अपना होता क्या है। ऐसा क्या होता है, जिसकी वजह से वह मानसिक गुलामी को स्वीकार कर लेती है। क्या सच में यह चमकदार और सुनहरे गहनों, कपड़ों और अट्टालिकाओं की चाह भर है या कुछ और, जिसे वह खुद से हासिल करने में असमर्थ होने के कारण खुद से ही समझौते करती है? दरअसल, पितृसत्ता के मानस में जीती औरतें युवा होती लड़कियों को उनकी नजर में गिरने और कमजोर होने का एहसास कराती रहती हैं कि तुम लाचार हो.. तुम्हारा कुछ भी नहीं है। मसलन, इन दिनों मेरा नया घर बन रहा है। शायद ‘मेरा’ शब्द का प्रयोग उचित न हो, क्योंकि एक लड़की का घर उसके पिता का घर नहीं, पति का घर होता है। जब मैंने यह कहा कि नीचे वाले कमरे में लाइब्रेरी बनाएंगे तो मुझे मोहल्ले की कई औरतों के मुंह से सुनने को मिला कि अरे ‘तुम्हारा क्या है… कहीं भी रह लेना! तुम्हारा क्या, दो-तीन साल में तो शादी करके अपने घर जाना ही है!’ मैं भी खुद से यह सवाल करती हूं कि मेरा क्या है या एक स्त्री का क्या है? सवाल यह है कि जिसने पैदा किया, जिसके साथ जीवन के बाईस-तेईस साल गुजरे, उन अपनों का घर अपना न हो सका तो किसी पराए के घर को कैसे अपना कह दिया जाए! यह भी तो केवल एक झांसा ही है कि आधी जिंदगी अपना घर मिलने की खुशफहमी में बिता दो और आधी अपना घर न मिलने के गम में। यह ‘अपना घर’ किसी कमरे में रहने से संबंधित नहीं, बल्कि परिवारजनों के दिल में रहने से संबंधित है। ‘विस्तृत नभ का कोई कोना/ न मेरा न अपना होना /परिचय इतना इतिहास यही/ उमड़ी कल थी मिट आज चली।’ मैं महादेवी वर्मा की इन पंक्तियों को न जाने क्यों बदल देना चाहती हूं। जैसे स्त्री का स्वतंत्र होना एक यूटोपिया लगता है, ठीक वैसे ही इसकी कल्पना तो की ही जा सकती है।

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