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दुनिया मेरे आगे : धुन समंदर

इस धुन में चलते नहीं, तैरते हैं किरदार, जैसे वे सपने में हों या जो कुछ घटता हो, सपना होता हो! इतना धीमे, जैसे गुरुत्वाकर्षण के दायरे में न हो।

Author नई दिल्ली | June 9, 2016 03:18 am
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शिगेरू उमबयशि जापानी न्यू वेव रॉक के संगीतकार हैं। इन्होंने 1991 में फिल्म ‘युमेजी’ के लिए एक धुन रची। लेकिन पहली बार मैंने इसे हांगकांग के निर्देशक वोंग कार-वाई की फिल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ में देखा-सुना। धुन और दृश्य आपस में यों गुंथे हैं, मानो एक अणु के दो परमाणु। धुन बस सुनने और सहने की चीज है। यह कह रही हूं, क्योंकि इस धुन से ऐसे परेशान हूं कि अकेले इसे भीतर बजते सह नहीं पा रही। लगता है, यह मेरे भीतर से जाहिर हो जाए। जैसे हवा, पत्तियां, घास, पानी- सब कहा मानते हैं इसका। सुनते हुए सांस भी लेती हूं तो इस धुन पर ही। मुझे लगता रहा कि यह प्रेम की धुन है! पर दरअसल यह प्रेम के अंत और प्रेम में विडंबना की धुन है। यह धुन है जो दो इंसानों को पास लाती है और वे आलिंगन में हों तो उन्हें आवाज दे जगा देती है। यह प्रेम को स्थापित करती है, उसे सजाती और फिर पूछती है- ‘प्रेम? वह है क्या? और क्यों? दरअसल कुछ है भी!’

इस धुन में मुझे एक इंसान से दूसरे के बीच आकर्षण से ऊपर, उदात्त जिंदगी और ब्रह्मांड से आकर्षण, लगन की झलक मिलती है। जैसे कोई कहता हो कि बस इतना नहीं, आगे और भी है। यह भीतर की बात है। अंदर एक कुआं है, उसमें आंख बंद करके उतर गए तो उसका सिरा मिलता है वहां। वहां, जिसकी बात हो रही है, पर जिसे जानते नहीं हैं। यह रहस्य जादुई है। इस जादू को तुम पहचान लेना चाहते हो! लेकिन पा लिया, पहुंच गए तो जादू का तमाशा चुक जाएगा, हाथ से निकल जाएगा या मन से उतर जाएगा।

वोंग के प्रेम में विडंबना है। सामाजिक नहीं, हमेशा आंतरिक। उनकी फिल्मों में प्रेम, प्रेम-सा नहीं होता। खूूब बेतुका और अमूर्त होता है। प्रेमी हर बार प्रेम का इजहार करने की जगह किसी पेड़ के खोकल या गुफा के सुराख में अपना राज रख आते हैं। काश, कंबोडिया की गुफा के उस सुराख की जगह तुमने वह राज उसके कान में फूंक दिया होता! कान में फूंकने पर वह जान जाती, तब क्या हो जाता? जुगनू जो भटकाता है, मुट्ठी में होता! दिल की जो आग सफर करवाती है, बुझ जाती। उसके बाद की कहानी प्रेम की या दर्द, तड़प, संकोच, उनके एकांत की कहानी नहीं होती। वोंग ने प्रेम को जिंदा रखा। एक स्वीकार की बलि बहुत कम है, उस अहसास की जिंदगी के लिए।

इस धुन में चलते नहीं, तैरते हैं किरदार, जैसे वे सपने में हों या जो कुछ घटता हो, सपना होता हो! इतना धीमे, जैसे गुरुत्वाकर्षण के दायरे में न हो। ये प्यार से, आकर्षण से बच कर चलते हैं। गुरुत्वाकर्षण के विरोध में चलने से इनकी चाल धीमी हो जाती है! इंसान न हुए, दो मैग्नेट हो गए! एक दूसरे के नजदीक हैं और डरते हैं कि और करीब न आ जाएं! दो चुंबकों को दूर करने के लिए जैसे अतिरिक्त बल लगाना पड़ रहा है। मिल जाएंगे तो प्रेम, प्रेम न रहेगा, कोई रिश्ता होगा, जिसके कुछ दस्तूर होंगे, एक नियमावली होगी। इस धुन में दो दुनिया हैं, एक दूसरे से एकदम अलग, लेकिन साथ चलती हुई। अपनी-अपनी विशिष्टता में। साथ होकर दूर, अलग होकर भी साथ। मुझे सिर्फ वोंग की फिल्म प्रेम की याद दिलाती है। शायद इसलिए कि उनमें प्रेम बस प्रेम ही रहता है। किसी रिश्ते में नहीं बदलता।

कितना कुछ दिखा सकते हैं एक दृश्य में! क्या नहीं दिखाना है, उसका ऐसा रचनात्मक चुनाव मैंने अब तक नहीं देखा। ऐसे ही यह धुन है, अंतरालों से बुनी। जैसे पानी की एक नहर हो यह लय और बीच में हमें कदम रखने को आधार दे रही हो। छोटे-छोटे कदम रख पहुंचेंगे कहां! इस तान से खिंचते एक दरवाजे पर पहुंचते हैं, जिसका खुलना अभी बाकी है। न जाने कौन होगा उस तरफ! यह धुन सबको अपने-अपने दरवाजे पर लाकर खड़ा कर देती है कि अब आगे का रास्ता अंतर का है, वह खुद तय करो।रातें बहुत लंबी होती हैं वोंग की फिल्मों में! यह धुन भी लंबी रात-सी है, हर करवट में बेचैन। असल में वोंग हर वक्त गहरा चश्मा पहने रहते हैं, कमरों के भीतर, रात में भी! कभी वोंग की फिल्म में तेज रोशनी दिखी तो समझूंगी कि वोंग ने चश्मा उतार दिया है।

और हां, धुआं! वोंग कैमरा मूवमेंट के लिए अपने सेट पर संगीत बजाते हैं, यह तो मैं जानती हूं, लेकिन जादू है कि धुआं भी संगीत का कहा मानता है। जिनके बारे में बात हो रही है, अक्सर वे लोग कभी दिखते नहीं। मुश्किल से कभी पीठ दिख जाती है, कभी आवाज सुन लेते हैं। पर उनका कोई सामान दिख जाता है। कभी उनके लाए तोहफे। शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं। साथ कुछ सामान खरीदा गया होता है और वे साझा करते हैं।

खैर!

वोंग अच्छे अध्यापक हैं! फिल्म के नहीं, जिंदगी के! क्योंकि जिंदगी भी उनमें नहीं है। जाहिर है, जिंदगी किसी छिपी चिंगारी में है, जिसे खोज रहे हैं, जिसके लिए बेकरार हैं। प्रकट हो जाती तो जिंदगी का राग न होता। वह अप्रकट में, अदृश्य में है। मिल जाएगी तो क्या चुक जाएगी?

(निधि सक्सेना)

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