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दुनिया मेरे आगे: सहेजनी होंगी बेचैनियां

वे स्त्रियां जो हर पुरुष से जुड़ी हैं, मां, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका और दोस्त बन कर। वे स्त्रियां जो जिंदगी से तो जुड़ी हैं, लेकिन मन से नहीं जुड़ पा रहीं, जबकि वे चाहती हैं जुड़ना। तो वे कारण कौन-से हैं जो हमें एक दूसरे के करीब नहीं आने दे रहे? जो एक को कमतर और दूसरे को बेहतर के अहसास से भर कर दूरियां बढ़ा रहे हैं?

Author October 12, 2018 3:14 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतिभा कटियार

हाल ही में बहुत सारा प्यार, दुलार, सम्मान लेकर और अपने कच्चे-पक्के अनुभवों को साझा करके बिट्स पिलानी से लौटी। बात हो जाने के बाद जो अटका रह जाता है, वह अब भी अटका हुआ है। यह कितनी सुंदर बात है कि शिक्षण संस्थान कला और साहित्य की कद्र कर रहे हैं। समझ रहे हैं कि गणित, भौतिकी, जीव-विज्ञान और रसायनशास्त्र पढ़ते हुए कितना जरूरी है इंसानी रिश्तों की अहमियत समझना भी। यह जानना कि किस तरह मुहब्बत के बीज बोए जाते हैं और किस तरह उनकी परवरिश की जाती है। लैंगिक समानता का ख्वाब ही कितना खूबसूरत है और इस ख्वाब को सहेजने के इरादे से मिल बैठना, बात करना और उलझी हुई गांठों को मिल कर सुलझाने की कोशिश करना। ऐसे प्रयास जरूरी हैं और इन प्रयासों के भीतर जिस तरह की संवेदना, नरमी और सचमुच की इच्छा जरूरी है, वही असल में इन प्रयासों की असल आत्मा है। वरना कार्यशाला, भाषण या बातचीत, सेमिनार आमतौर पर किसी रस्म अदायगी से निपट जाते हैं। मैंने तीन हिस्सों में अलग-अलग समूहों से बातचीत करते हुए पाया कि समाज में फैली लैंगिक असमानता को लेकर जो सवाल हैं, वे तो सबके मन में चल रहे हैं, लेकिन रास्ते नजर नहीं आ रहे। आखिर यह कैसे होगा कि दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए उठे कदम कारवां हो जाएं! बिरला बालिका विद्यापीठ की बच्चियों के मासूम सवाल अब तक मेरे साथ हैं। आखिर क्यों यह सब ठीक नहीं होता?

हमने मुद्दों को पहचान लिया है। मुद्दों के इर्द-गिर्द बात करना सीख लिया है। सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखना, कविता, कहानियां लिखना सीख लिया है। भाषण देना भी सीख लिया है। लेकिन इस सीखे हुए का जिंदगी से नाता बनाना अभी सीखना बाकी है। अभी पड़ोसी के दर्द को अपने सीने में देर तक सहेजे रहना सीखना बाकी है। अभी बाकी है यह सीखना कि किस तरह अपना पेट भरे होने के बावजूद हम बहुत सारे लोगों की भूख की तासीर महसूस कर सकें। इस सबका यह अर्थ नहीं कि हर वक्त बिसूरते हुए अपनी जिंदगी को हलकान ही कर लिया जाए, जीना छोड़ दिया जाए। बल्कि मुझे तो लगता है कि हर मुश्किल हमें और मजबूत ही बनाती है, जिंदगी को शिद्दत से जीने की लौ को तेज करती है। साथ ही इस जीने में बहुत सारे लोगों को शामिल करने की इच्छा भी बढ़ाती है।हमें लगातार अपने सवालों की धार को तेज करना होगा, पुराने सवालों को नए सवालों से बदलना होगा। इस धरती को जीने लायक बनाने के लिए तमाम ‘स्टीरियोटाइप’ यानी रूढ़िबद्ध धारणाएं और चलन तोड़ने होंगे। जोखिम उठाने होंगे, बहुत से लोगों की नाराजगी मोल लेनी होगी। इस ‘हम’ में स्त्री और पुरुष के भेद को मिटाना होगा। बेहतर दुनिया का वह सपना जहां सबके हिस्से हो जिंदगी, सबके हिस्से हों मुस्कुराहटें, सबको मिल कर ही तो देखना है न!

इस लिहाज से मुझे शिक्षण संस्थानों का इस तरह की बातचीत के रास्ते खोलना, कला, साहित्य, संस्कृति के बीज बोना, तकनीकी शिक्षण के बीच मानवीयता, संवेदना को सहेज कर रखने का प्रयास अच्छा लगा। सबसे अच्छा लगा इस प्रयास का मुहब्बत भरी मुलाकात में बदल जाना कि सेमिनार, बातचीत, कार्यशाला से कहीं लंबी उम्र होती है मुहब्बत की। हमने बातचीत के दौरान बराबर इस बात का खयाल रखा कि ‘जेंडर इक्वलिटी’ यानी लैंगिक समानता की बात स्त्रियों की बात बन कर न रह जाए, बल्कि स्त्रियों की बाबत बात बन कर उभरे। वे स्त्रियां जो हर पुरुष से जुड़ी हैं, मां, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका और दोस्त बन कर। वे स्त्रियां जो जिंदगी से तो जुड़ी हैं, लेकिन मन से नहीं जुड़ पा रहीं, जबकि वे चाहती हैं जुड़ना। तो वे कारण कौन-से हैं जो हमें एक दूसरे के करीब नहीं आने दे रहे? जो एक को कमतर और दूसरे को बेहतर के अहसास से भर कर दूरियां बढ़ा रहे हैं? और यह कितना जान कर हो रहा है और कितना अनजाने ही? पितृसत्ता के उलट अगर मातृसत्ता हो तो क्या समस्याएं सुलझ जाएंगी, जैसे सवालों को भी हमने समझने की कोशिश की कि सवाल मातृ या पितृ का नहीं, सवाल सत्ता का है। दिक्कत सत्ता से है। स्त्री अधिकारों की बात करना पुरुषों के विरोध में बात करना नहीं है, बल्कि उनके साथ होने की इच्छा की बात है। मुझे नहीं मालूम कि मेरी बात कितने लोगों के साथ कितने दिनों तक रहेगी, लेकिन उन सारे लोगों के सवाल और उनसे मिली मुहब्बत मेरे साथ रहेगी लंबे समय तक। मेरे पास मेरी कुछ बेचैनियों के सिवा कुछ नहीं है। उन्हीं बेचैनियों के कुछ बीज बोकर आई हूं इस उम्मीद से कि वे फलेंगी-फूलेंगी और बहुत सारे लोगों की रातों की नींद गारत कर देंगी, ऐसे समय के इंतजार में जहां आने वाली पीढ़ियां चैन से सुरक्षित, सुकून से सो सकें। हमें यह बेचैनी तो सहेजनी ही होगी।

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