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दुनिया मेरे आगे: बाजार के पांव

विवाह में दूसरी महत्त्वपूर्ण वस्तु है वस्त्र, जो खूब शौक से ढूंढ़ कर खरीदे जाते हैं, मगर विवाह संपन्न होते ही संभाल कर रख दिए जाते हैं, विशेषकर महंगे कपड़े। दूल्हा-दुल्हन के द्वारा पहने जाने वाले वस्त्रों पर महीनों पहले से ही माथापच्ची शुरू हो जाती है।

Author September 15, 2018 3:03 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारे समाज के मध्यवर्गीय परिवारों में आयोजित हो रहे विवाहों में परंपराएं और नवीनताएं आपस में घुल चुकी हैं। कुछ समझदार युवाओं ने आर्थिक परिस्थितियों के मुताबिक विवाह समारोह करने की पहल की है, लेकिन समाज में आज भी अधिकतर वैवाहिक आयोजन व्यक्तिगत हैसियत से बाहर होते देखे गए हैं। आयोजन के हर हिस्से में विकास के कारण समाज के इस महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान पर अब बाजार का कब्जा हो चुका है। देश के कुछ उत्तरी हिस्सों में तो यह पारिवारिक उत्सव अब ‘लाभ-उत्सव’ में तब्दील हो गया है। किसी जमाने में जमीन पर बैठ कर खिलाए जाने वाले खाने की रिवायत अब विवश ग्रामीण या पहाड़ी क्षेत्रों में ही रह गई है। शहरों में आयोजित हो रहे विवाहों में विभिन्न तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनसे मेहमान अपनी थाली भर लेते हैं, फिर न खा पाने पर फेंक देते हैं।

इसी तरह विवाह में दूसरी महत्त्वपूर्ण वस्तु है वस्त्र, जो खूब शौक से ढूंढ़ कर खरीदे जाते हैं, मगर विवाह संपन्न होते ही संभाल कर रख दिए जाते हैं, विशेषकर महंगे कपड़े। दूल्हा-दुल्हन के द्वारा पहने जाने वाले वस्त्रों पर महीनों पहले से ही माथापच्ची शुरू हो जाती है। दूल्हा अपनी आदत के मुताबिक अगर सूट खरीदता है तो वह निश्चित ही बाद में भी प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन अगर वह विवाह के लिए महंगी शेरवानी या कुछ और डिजाइनर वस्त्र धारण करता है तो बाद में ये वस्त्र कपड़े रखने की आलमारी की स्थायी जीनत ही बनते हैं। इधर कई कंपनियों में सूट के साथ टाई पहनने की विवशता अब नहीं है, इसलिए विवाह में खरीदी गई टाई कहीं परेशान बेचारी-सी लटकी रहती है। जो लोग सूट नियमित नहीं पहनते, वे भी ब्रांडेड सूट खरीदते या सिलवाते हैं और अगली बार कब पहना जाएगा, इसका इंतजार वे और सूट दोनों करते रहते हैं। हालांकि विवाह में ज्यादा झंझट महिलाओं के कपड़ों को लेकर होता है। दुल्हन के लिए आमतौर पर लहंगा लिया जाता है जो हजारों से लाखों रुपए तक की कीमत में उपलब्ध है। एक बार पंजाब में लहंगे बेचने वाले से मैंने पूछा था कि लहंगा कितने तक का है, तो उसका जवाब था, जितना महंगा कोई खरीद सके। कई लहंगे कीमत के साथ वजन में भी भारी होते हैं। जाहिर है, किसी कम वजन की लड़की के लिए भारी लहंगा पहनना भी एक समस्या होती है। लेकिन लहंगे को विवाह में आवश्यक मान लिया गया है। अब तो लहंगे के साथ नकली जेवर भी किराए पर उपलब्ध कराए जाने लगे हैं। एक ही लहंगा या जेवर कितनी बार प्रयोग हो चुके होते हैं।

इन वस्त्रों में सिर्फ सजावट और दिखावे का कृत्रिम भाव ही है। शादी के वस्त्रों की सौम्य, नैसर्गिक अनुभूति अब गायब है। दूल्हे और दुल्हन के वस्त्रों के साथ-साथ मां-बहन और परिवार के बाकी सदस्यों के लिए भी वस्त्र तय करने और उसे खरीदने या सिलवाने का झंझट उठाया जाता है, लेकिन विवाह के बाद उसके उपयोग के बारे में कम ही सोचा जाता है। इतना सब कुछ होने के बावजूद कई बार अंतिम समय में पहने जाने वाले वस्त्रों को लेकर ऊहापोह कायम रहती है और बदलाव भी हो जाता है। यानी एक तरह से वस्त्रों को लेकर पैदा हुई सारी उत्सुकता एक अस्थायी और कुछ देर की हड़बड़ी साबित होती है। शादी के अधिकतर वस्त्रों को दोबारा कहीं पहनने के अवसर कम ही आते हैं। किसी और के विवाह में वे वस्त्र पुराने लगने लगते हैं, क्योंकि तब तक बाजार में नए डिजाइन के कपड़े आ चुके होते हैं। बहुत से परिवारों में आज भी अपने रिश्तेदारों और मित्रों को विवाह में कपड़े उपहार में देने की परंपरा है। इसके लिए बाकायदा सूची बनाई जाती है, ताकि कोई छूटे नहीं। अधिकतर लोग लेने-देने में बजट के अनुसार ही कपड़े खरीदते हैं। लेने-देने वालों को पता होता है कि अब सभी अपनी पसंद के कपड़े पहनना पसंद करते हैं, फिर भी यह रस्म निभाई जाती है।

कपड़ों के लुभावने बाजार में हमने छोटे बच्चों की पसंद को भी इतना खास बना दिया है कि वे अभिभावकों की पसंद के कपड़े मुश्किल से ही पहनते हैं। विवाह या अन्य समारोहों में नए वस्त्रों लेने की भूख के कारण बहुत सारे घरों में ‘अवांछित लघु वस्त्र भंडार’ देखे जा सकते हैं। विवाह के दौरान मेहमानों के ठहरने, आनंददायक माहौल में स्वादिष्ट खाने का अच्छा प्रबंध आवश्यक है। कई अतिरिक्त खर्चे ऐसे हैं, जिनसे बचा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे खर्चे जो कम किए जा सकते हैं, उनके बारे सोचा जाना चाहिए। इनमें से वस्त्रों पर होने वाला खर्च भी है। देश के दक्षिणी क्षेत्रों में, जहां शिक्षा और संपन्नता के साथ सादगी और संस्कृति का दामन छोड़ा नहीं गया है, विवाह की सरलता और पारंपरिक संस्कृति अभी मौजूद है। हालांकि बाजार के नुमाइंदे वहां भी होंगे। क्या कभी ऐसा होगा कि वैवाहिक आयोजन संयमित और उचित रास्तों की तरफ लौटेगा? क्या जिंदगी पर फैलता बाजार कभी ऐसा होने देगा?

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