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दुनिया मेरे आगे: भूल से आगे

बीसवीं सदी मनुष्य के मशीनी विकास को रफ्तार देने वाली सदी मानी जाती है। इस सदी में मानव जाति ने अकल्पनीय आविष्कारों की मदद से मनुष्य के जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया है।

Author July 24, 2019 1:05 AM
बीसवीं सदी मनुष्य के मशीनी विकास को रफ्तार देने वाली सदी मानी जाती है।

रजनीश जैन

यह आमतौर पर कहा जाता है कि गलतियां इंसान से ही होती हैं। इस कहावत में गलतियों के लिए माफ कर देने का भाव छिपा हुआ है। एलेक्जेंडर पोप के एक लेख में इस कहावत का पूरा भावार्थ स्पष्ट किया गया है कि गलतियों के बावजूद मनुष्य को क्षमा कर दिया जाना चाहिए। लेकिन कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जो संपूर्ण मानव जाति के लिए जख्म बन जाया करती है। उन्हें चाह कर भी माफ नहीं किया जा सकता।

बीसवीं सदी मनुष्य के मशीनी विकास को रफ्तार देने वाली सदी मानी जाती है। इस सदी में मानव जाति ने अकल्पनीय आविष्कारों की मदद से मनुष्य के जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया है। इस सदी ने मशीनों पर मनुष्य की निर्भरता को बढ़ावा दिया। नतीजतन, मानवीय भूलों की वजह से हुए मशीनी हादसों में किसी प्राकृतिक प्रकोप के बनिस्बत कहीं अधिक लोग हताहत हुए। बीसवीं सदी की शुरुआत में ही ‘टाइटेनिक’ जहाज के डूब जाने की वजह से एक साथ पंद्रह सौ से ज्यादा लोग काल के ग्रास बन गए थे। काफी दिनों बाद जांच से यह निष्कर्ष सामने आया कि जहाज को जिस स्टील की चद्दरों से ढका गया था, उनमें लगे रिबेट निहायत ही हल्के किस्म के थे।

इस दुर्घटना के बाद अमेरिका के प्रकाशन उद्योग में जबर्दस्त उछाल आया। इस हादसे पर सैकड़ों किताबें लिखी गर्इं, जिसमें हरेक लेखक ने इस ढंग से वर्णन किया, मानो वह इस दुर्घटना का प्रत्यक्ष गवाह रहा था। हादसे के पचासी बरस बाद जेम्स कैमरून ने इस दुर्घटना में प्रेम कहानी मिला कर एक प्रभावशाली फिल्म ‘टाइटेनिक’ (1997) का निर्माण किया।

जिम्मेदार लोगों की लापरवाही और शीर्ष पर बैठे प्रभावशाली लोगों की लोलुपता के चलते घटित हुए हादसे में भोपाल गैस त्रासदी ऐसा हादसा है, जिसने दुनिया को औद्योगिक सुरक्षा के प्रति बरती जाने वाली ढिलाई से अवगत कराया था। यह मानवजनित हादसा था, जिसके निशान भोपाल की मौजूदा पीढ़ी पर आज भी दिखाई दे रहे हैं। इस दुर्घटना पर कई डॉक्यूमेंट्री और फिल्में बनी हैं। एक उल्लेखनीय फिल्म ‘ए प्रेयर फॉर रेन’ (2014) है, जिसमें एक रिक्शा चालक के नजरिए से पूरे घटनाक्रम को देखा गया है। ‘भोपाल एक्सप्रेस’(1999) भी प्रभावशाली फिल्म थी, जिसमें एक नवदंपति को केंद्र में रख कर हादसे को दर्शाया गया था। वास्तविकता को एकदम नजदीक से टटोलती बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘वन नाइट इन भोपाल’ (2004) हरेक पीड़ित के हाल बयान करती है।

भोपाल हादसे के महज दो बरस बाद ही दो मानवीय गलतियों से उपजे हादसों ने विश्व की दोनों ही महशक्तियों रूस और अमेरिका को अंदर तक हिला दिया था। 1986 की गरमी में अविभाजित रूस के प्रिप्याट शहर से सटे चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र में हुए विस्फोट ने पूरी मानव जाति को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया था। बाद की जांच में जाहिर हुआ कि संयंत्र के सुपरवाइजर अपने पदोन्नति के लिए किसी को बताए बिना कुछ टेस्ट कर रहे थे।

इस तरह के हादसों से निपटने में सभी देशों की सरकारें एक ही नीति अपनाती हैं- हादसों को छिपाना। सोवियत सरकार ने भी यही किया था। पांच लाख की आबादी वाला प्रिप्याट आज भुतहा शहर हो गया है, लेकिन सरकारी आंकड़े आज भी महज इकतीस मौत पर अटके हुए हैं। हाल ही में इस हादसे के एक हफ्ते के घटनाक्रम को केंद्र में रख कर डॉक्यू-ड्रामा ‘चेर्नोबिल’ का प्रसारण एचबीओ टेलीविजन पर हुआ है। पांच किस्तों में प्रसारित इस टीवी शो ने तत्कालीन सोवियत रूस के आम जीवन, साम्यवादी पार्टी की कार्यशैली और गुप्तचर संस्था केजीबी की जीवन के हर क्षेत्र में घुसपैठ को परत-दर-परत उजागर किया है। इस हादसे पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘द बैटल ऑफ चेर्नोबिल’ सबसे विश्वसनीय मानी जाती है।

1986 की सर्दी के मौसम में अमेरिका का स्पेस शटल चैलेंजर उड़ान के महज तिहत्तर सेकेंड बाद ही आकाश में फट गया। इस घटना में सातों अंतरिक्ष यात्री मारे गए, क्योंकि उनके बच निकलने का कोई रास्ता नहीं सोचा गया था। अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ के लिए यह हादसा एक काला अध्याय है। इस घटना में मानवीय भूल का पक्ष यह था कि ठंडे तापमान के आंकड़े नहीं जुटाए गए थे, लिहाजा शून्य से नीचे तापमान में उड़ान भरने से उत्पन्न समस्याओं पर कंप्यूटर गौर नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप करोड़ों डॉलर और कीमती जिंदगियां पल में खाक हो गई। 1990 और 2013 में इस विषय पर दो काल्पनिक फिल्में बन चुकी हैं। नासा ने इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता को दर्शाने के लिए ‘द चैलेंजर डिजास्टर’ (2019) को तकनीकी और तथ्यात्मक मदद उपलब्ध कराई है।

जब तक मनुष्य है, तब तक उससे गलतियां होती रहेंगी। गलतियों से सीख कर ही मानव जाति अगली पीढ़ी के लिए बेहतर दुनिया बनाने का प्रयास करेगी। लेकिन अफसोस कि कई बार बड़े हादसे के जरूरी ब्योरे और उसमें हुई गलतियां छिपाई जाती हैं और इस तरह अगले हादसे की जमीन तैयार की जाती है।

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