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दुनिया मेरे आगे: निशाने पर निर्बल

आजकल मनुष्य को शर्मिंदा करने के लिए समाज में ऐसे मानक बनाए जा रहे हैं जिनका इंसानियत से दूर-दूर का कोई वास्ता नहीं।

आम बोलचाल में कुछ बातें ऐसी घुली हुई हैं कि हम उन्हें बोल तो जाते हैं, लेकिन उनके संदर्भों के बारे में विचार नहीं करते। इसलिए कई बार बातें अपने महत्त्व की तीव्रता में उतर नहीं पातीं तो कई बातें नाहक ही महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं। मसलन, ‘ऐसी बात करते तुम्हें शर्म नहीं आती!’, ‘हर बात पर झूठ बोलते हो, कुछ तो शर्म करो!’, ‘दूसरे की जमीन, खेत, पैसे पर कब्जा करने में जरा भी बुरा नहीं लगा। कुछ तो लिहाज-शर्म तो होती है? या सब बेच खाई?’अगर इस तरह की बातों पर ध्यान दिया जाए, तो इनमें से सब किसी न किसी सामाजिक जिम्मेदारी को न निभाने या इंसानियत की अवहेलना के रूप में कही गई हैं। हो सकता है कि इन्हें बोलते समय कभी-कभी इसके कारणों पर उतना गौर नहीं किया जाता हो, लेकिन इसके पीछे मंशा आमतौर पर अच्छी होती है। लेकिन आजकल मनुष्य को शर्मिंदा करने के लिए समाज में ऐसे मानक बनाए जा रहे हैं जिनका इंसानियत से दूर-दूर का कोई वास्ता नहीं। उलटे अक्सर वे इंसानियत के खिलाफ नजर आते हैं। यह सब होता है अपने-अपने उत्पाद को बेचने और मुनाफा कमाने के लिए।

इनमें स्पर्धा और ईर्ष्या को बहुत अच्छे मूल्यों की तरह परोसा जाता है। यह नए किस्म का पूर्वग्रह और जातिवाद है जो हमेशा साधन-संपन्न के पक्ष में खड़ा रहता है। यहां किसी मामूली आदमी या शहरी सभ्यता के मानकों पर खरा न उतरने वालों के लिए कोई जगह नहीं है। उदाहरण के तौर पर किसी स्कूल की क्लास के बहुतेरे सजे-धजे चमकते बच्चों के बीच में किसी ऐसे बच्चे का होना, जिसकी सफेद कमीज पीली पड़ी है। उसके चेहरे की चमक गायब है या दूसरों के शैम्पू से लहराते बालों के मुकाबले उसके बालों में तेल लगा है। ऐसे में एक कमीज को न जाने कितने उत्पादों के खाते में डाला जा सकता है। बताया जा सकता है कि इस बच्चे की कमीज अगर फलां डिटर्जेंट या साबुन से धुली होती, तो इतनी पीली नहीं दिखती और उसे अपने दोस्तों के सामने शर्मिंदा नहीं होना पड़ता। इसलिए अब से हमेशा यही साबुन इस्तेमाल किया जाए और शर्मिंदा होने से बचा जाए। यह भी बताया जा सकता है कि इस बच्चे ने जो कमीज पहनी है, उसे अगर अमुक वाशिंग मशीन में धोया जाता, तो इसकी चमक की बात ही कुछ और होती।

तब सब इसकी चमक को मुड़-मुड़ कर देखते और बच्चे से पूछते कि आखिर उसकी कमीज उन सबकी कमीज से इतनी अधिक सफेद कैसे है। बच्चे की कमीज का पीलापन और दाग-धब्बे इसलिए भी हो सकते हैं कि उसे अमुक ब्रांड के नील में नहीं डुबोया गया। यह भी कह दिया जाएगा कि बच्चे ने सिली-सिलाई यूनिफॉर्म के मुकाबले लोकल दर्जी की बनाई कमीज पहनी है, इसलिए सबने उसे चिढ़ाया। अगर वह स्कूल परिधान के लिए मशहूर फलां ब्रांड पहनता तो सार्वजनिक अपमान से बच सकता था।

कुल मिलाकर इन तर्कों के साथ बात करते हुए उन बच्चों को वैधता प्रदान की जा रही है, जिन्होंने बच्चे को उसकी मैली कमीज होने के कारण चिढ़ाया, परेशान किया। एक तरीके से स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बताया जा रहा है कि अगर मैले कपड़े पहने कोई बच्चा दिखे तो उसे चिढ़ाया जा सकता है और उसकी कमजोरी पर हंसा जा सकता है। इसमें कोई बुराई नहीं है! जबकि यह न सिर्फ मानवीयता के लिहाज से, बल्कि अनुशासन के नजरिए से भी प्रतिगामी है। लेकिन अफसोस कि हमारा समाज हमेशा कमजोर पर हंसता रहा है या उस पर आंखें तरेरता रहा है। एक हाथ में आंखों के तेवर हैं और दूसरे हाथ में पूंछ। कमजोर और साधनहीन के सामने अकड़ या देख लेने की धमकी और ताकतवर के सामने हमेशा हिलती पूंछ।

हम सबने शायद ही कभी ऐसा देखा होगा कि कोई अपने से अधिक साधन-संपन्न या ताकतवर पर उसके सामने हंसता है, उसे चिढ़ाता है या फिर उसका मजाक उड़ाता है। बाजार या उद्योग ने अपने माल को बेचने के लिए कमजोर को चिढ़ाने और उसका तिरस्कार करने के शायद भारतीय सामाजिक व्यवस्था के मंत्र को जस का तस अपना लिया है। चिढ़ाने का अर्थ होता है दूसरे को छोटा समझ कर उसे परेशान करना। लेकिन आखिर जान-बूझ कर दूसरे को छोटा बनाने में कौन-सी और कैसी उन्नति का मार्ग छिपा है? कहने को हम ऐसी उन्नत तकनीक से लैस हैं कि जल्दी ही बुलेट ट्रेन पर चढ़ने वाले हैं और स्मार्ट सिटी के देश की तरफ कूच करने वाले हैं। लेकिन उस स्मार्टनेस और तकनीकी ज्ञान का क्या फायदा, जहां मामूली मानवीय मूल्य भी हमें बेकार के लगते हैं। यों भी स्मार्ट दिखने और होने की कोई एक परिभाषा नहीं होती।

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