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दुनिया मेरे आगे: मूल्यों का पाठ

आमतौर पर शिक्षक बच्चों को पाठ पढ़ाना और नैतिक सीख देना ही काफी समझते हैं और विद्यार्थी के व्यवहार में मूल्यगत बदलाव पर कम ध्यान देते हैं। संभव है कि जिस जाति या समाज से शिक्षक संबंध रखता है, उसके मुताबिक उसकी कुछ अपनी मान्यताएं होती होंगी।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

किसी भी इंसान के जीवन में मूल्यों का बहुत अहम योगदान रहता है क्योंकि इन्हीं के आधार पर अच्छा-बुरा या सही-गलत की परख की जाती है। इंसान के जीवन की सबसे पहली पाठशाला उसका अपना परिवार ही होता है और परिवार समाज का एक अंग है। उसके बाद उसका विद्यालय, जहां से उसको शिक्षा हासिल होती है। परिवार, समाज और विद्यालय के अनुरूप ही एक व्यक्ति में सामाजिक गुणों और मानव मूल्यों का विकास होता है। लेकिन वैश्वीकरण के इस युग में मूल्य आधारित शिक्षा की भागीदारी लगातार घटती जा रही है। सांप्रदायिकता, जातिवाद, हिंसा, आपसी भेदभाव और असहिष्णुता आदि की बढ़ती प्रवृत्ति समाज में मूल्यों के विघटन के ही उदाहरण हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद-15 किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर भेदभाव की मुखालफत करता है। लेकिन सच यह है कि संविधान लागू होने के पैंसठ साल बाद भी हमारे विद्यालयों में आज भी इन वजहों से भेदभाव के उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे। विभिन्न स्कूलों में अपने शिक्षण अनुभवों के दौरान मैंने देखा कि विद्यालय में पानी भरने के अलावा सफाई का काम सिर्फ लड़कियों से कराया जाता है। अध्यापक अपने पीने के लिए पानी कुछ खास जाति के बच्चों को छोड़ कर दूसरी जातियों के बच्चों से ही मंगवाते हैं और बच्चे मिड-डे-मील अपनी-अपनी जाति के समूह में ही बैठ कर खाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आसपास के विद्यालयों में देखने को मिल जाएंगे।
हाल ही में राजस्थान के टोंक जिले के एक सरकारी विद्यालय के बच्चों के लिए गांव के ही एक परिवार ने सामूहिक भोज का आयोजन किया। शिक्षक विद्यालय में पढ़ने वाले सभी बच्चों को सामूहिक भोज वाली जगह पर लेकर पहुंचे। शिक्षक ने देखा कि घर के मुख्य दरवाजे पर एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठा है। वह घर के मुख्य द्वार में घुसने से पहले बच्चों की छंटनी कर रहा है। यानी कुछ बच्चों को घर के अंदर जाने दे रहा है और अन्य बच्चों को घर के बाहर बैठने के लिए बोल रहा है। जब बच्चे अंदर चले गए और कुछ बच्चे बाहर बैठ गए, तब बाहर बैठे हुए बच्चों के लिए अलग से खाने का इंतजाम किया गया। जब शिक्षक ने बुजुर्ग व्यक्ति से कुछ बच्चों को अंदर जाने देने और अन्य बच्चों को बाहर बैठाने का कारण पूछा तो उसने बताया जिन बच्चों को बाहर बिठाया गया है वे निचली कही जाने वाली जातियों से हैं।

बुजुर्ग व्यक्ति की बात सुन कर शिक्षक ने सभी बच्चों को खाना छोड़ कर वापस स्कूल चलने का आदेश दिया। शिक्षक ने भोज का आमंत्रण देने वाले परिवार सहित गांव के अन्य लोगों के सामने विरोध जताते हुए कहा- ‘मेरे लिए विद्यालय के सभी बच्चे समान हैं। मैं किसी भी बच्चे से जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता। आप लोगों ने बच्चों का अपमान किया है और यह मेरा अपमान है। इसलिए अब बच्चे यहां खाना नहीं खाएंगे।’ उसके बाद गांव के लोगों ने शिक्षक को बच्चों सहित खाने के लिए मनाया, तब शिक्षक ने कहा कि मेरी एक शर्त है। अगर आपको यह मंजूर हो तभी मैं खाना खाऊंगा। शिक्षक ने कहा- ‘अब कभी भी अगर आप विद्यालय के बच्चों को खाना खाने या किसी अन्य कार्यक्रम में बुलाएंगे तो बच्चों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे।’ गांव वालों ने शिक्षक की बात मान ली और भविष्य में ऐसा न करने का वादा किया।

आमतौर पर शिक्षक बच्चों को पाठ पढ़ाना और नैतिक सीख देना ही काफी समझते हैं और विद्यार्थी के व्यवहार में मूल्यगत बदलाव पर कम ध्यान देते हैं। संभव है कि जिस जाति या समाज से शिक्षक संबंध रखता है, उसके मुताबिक उसकी कुछ अपनी मान्यताएं होती होंगी। उन अतार्किक जड़बद्ध सामाजिक-धार्मिक पूर्वाग्रहों की वजह से शिक्षक तर्कशील होकर नहीं सोच पाता है। उन्हीं रूढ़िबद्ध मान्यताओं के अनुसार वह चलना चाहता है। लेकिन जब तक शिक्षक अपने आपको तर्क की कसौटी पर रख कर नहीं सोचेगा, तब तक वह न तो अपने व्यवहार में परिवर्तन ला सकता है और न ही विद्यार्थी के भीतर मूल्यों के प्रति आस्था विकसित कर सकेगा। एक शिक्षक का फर्ज बनता है कि वह पाठ्यपुस्तकों के साथ ‘मूल्यों’ के महत्त्व को समझे, उन्हें अपने जीवन व्यवहार का हिस्सा बनाए, फिर बच्चों के दैनिक व्यवहार में लाने का प्रयास करे, ताकि मानव-मूल्य आधारित शिक्षा सिर्फ पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा न होकर हर विद्यार्थी के लिए जीवनमूल्य बन पाए। विद्यालय से समाज की अपेक्षा होती है कि वह तर्कशील मनुष्य प्रदान करे। इसलिए विद्यालयों में ही जरूरी मानव मूल्यों की शिक्षा नहीं दी गई तो कहीं न कहीं हम देश के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी से चूक जाएंगे।

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