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गांव का पानी

बहुत अरसे बाद गांव में एक माह से अधिक रहना हुआ। यों मेरा गांव से दामन कभी नहीं छूटा। शायद अंतिम सांस ही कभी यह संग-साथ छुड़ाए।

Author May 31, 2017 5:18 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

ओम नागर

बहुत अरसे बाद गांव में एक माह से अधिक रहना हुआ। यों मेरा गांव से दामन कभी नहीं छूटा। शायद अंतिम सांस ही कभी यह संग-साथ छुड़ाए। अप्रैल-मई का महीना तो गांव के लिए बैसाख-जेठ। सूरज यहां भी धुआं-धुआं हुए शहर की तरह ही तपता है। शहर की तरह ही अब यहां भी बूढ़े दरख्त की छितराई छांव नसीब होना मुश्किल है। गांव ने बरसों पहले ही अपने हरे-भरे सघन पेड़ों वाले लिबास उतारने शुरू कर दिए थे। वरना कौन है, जिसकी स्मृति में गुलमोहर की ठंडी छांव नहीं होगी! इसी छांव के नीचे देह को सेंक देने वाली गरमियां कटी हैं। गुलमोहर की छांव में घंटों सौलहसार खेलना बचपन से बिसराओ तो भी नहीं बिसरा जाता। अब न गुलमोहर बचा और न ही बगल में लगा हैंडपंप, जिसके शीतल जल से तप्त दुपहरी का गला तर हुआ रहता। कितना निर्मल और शीतल होता है धरती का जल! कुएं का मीठा पानी तो गुजरे वक्त के किस्से-कहानियों में मिठास लिये आता है कभी-कभार बुजुर्गों से जिक्र करते हुए।

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शहर तो कभी के पानी ने तज दिए। अब गांव का भी पानी धीरे-धीरे उतर रहा है। अचंभा तो यह है कि गांव के बाशिंदों को ही इस उतार का भान नहीं। सभी धरती के पेंदे से अमृत की अंतिम बूंदें भी निचोड़ लेने को उतावले दिख रहे हैं। कभी गांव में जमीन में पानी के मिलने का स्तर सौ-सवा सौ फुट से अधिक नहीं था। भरे बैसाख में भी कुएं की सुंदर मोवणी सीढ़ियां उतर कर राहगीर अपनी प्यास बुझा सकते थे। वे कुएं अब कूड़ेदान हो गए। एक ही खेत के चार कोनों पर आठ ट्यूबवेल हो गए, फिर भी अथाह जलराशि के दर्शन न हुए। हजार फुट तक में संतोष नहीं। पानी का क्या, जब तक आदमी की आंख में बचा रहेगा धरती के पेंदे में भी चिलकता रहेगा। पानी की तो बस इतनी-सी कहानी है। मेरी कविता की कुछ पंक्तियां हैं- ‘चुल्लू भर/ डूबने के लिए/ ओक भर/ प्यास के लिए/ अंजुरी भर/ किसके कमंडल में/ विध्वंस के लिए/ यहां तो/ आंख भर बचा है/ जिसमें डबडबाता है/ काला हीरा।’ऐसा नहीं है कि गांव प्यासा ही मर रहा है। लेकिन ऐसे ही यह अमृत बहता रहा तो सच में मर ही जाना है। पानी की ऐसी बेकद्री कि संवेदनशील आदमी की आंख हो तो झर जाए। मेरा कवि-मन बहुत दुखी हुआ। दरअसल, पानी ने सैकड़ों फुट गहरी समाधि ली तो बड़े हॉर्सपावर के वाटर पंपों ने धरती का पेंदा मथ कर उसे भी तोड़ दिया। अब तो गांव के आसमान में उगे चांद को भी तालाब के पानी में अपना अक्स देखे बरसों हुए। इन दिनों की रगों में पानी कैसे दौड़ता है, आप भी देखते तो अचंभित हुए बिना नहीं रहते। पूरे गांव का आकाश एक इंच प्लास्टिक के पाइपों से आच्छादित है। वाटर पंप चलता है और गांव की एक इंच काली शिराओं से पानी झरने लगता है। बिजली आपूर्ति दुरुस्त हो तो गांव की गलियों की टूटी नालियों का मुंह भरी दुपहरी में भी लबालब भरा देखा जा सकता है। गांव का जो नूर था, पानी से ही। पानी नहीं रहेगा तो गांव खूबसूरत नहीं रहेगा। दुनिया की सारी सुंदरता पानी की ही बदौलत है।

पिछले दो दशक में गांव पूरी तरह बदल गए हैं। अब वे मुंशी प्रेमचंद के गांवों जितने भोले नहीं रहे हैं। सब एक साथ सोने के अंडे देने वाली मुर्गी का पेट काटने को तैयार हैं। भाईचारे का वटवृक्ष तो कब का धराशायी हो गया। अब गांव के पास शराब का ठेका भी खुल गया है। कुछ समझदारों से सुना कि जिन्हें रोकना था, वही सबसे मोटे ग्राहक हैं। कोई भी एक ढूंढ़े से नहीं मिलता, जिसका कहा मान गांव मुट्ठी-सा बंध जाए। गांव तो इन दिनों आंखों पर पट्टी बांध कर चलाए जाने वाले घाणी के बैल की तरह से बेसुध चला जा रहा है। कहां जाना है, चलने वाला भी नहीं जानता।खेती-किसानी पहले आषाढ़ भरोसे, फिर धरती के जल भरोसे। राजस्थान के हड़ौती क्षेत्र में जब से लहसुन जैसी नकदी फसल के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है, धरती के भीतर का जल निरंतर घटता जा रहा है। गेहूं की पैदावार जहां तीन से चार सिंचाई में हो जाती है, वहीं लहसुन की खेती के लिए फसल में आठ से दस बार सिंचाई करनी होती है। लहसुन के भावों ने पिछले कुछ साल किसानों की जेबें भर दीं, लेकिन अब गांव का पानी उतरने लगा है। भाव गिर रहे हैं तो जल-स्तर भी। यह बदले हुए गांव की तस्वीर है जिसके रंग अभी-अभी उड़ने शुरू हुए हैं। फसलों में नवाचार और तकनीक का नारा सब देते हैं, लेकिन पानी को बचाने के नारे दीवारों पर ही शोभायमान हैं। इन दिनों के हालात देख कर यही कहा जा सकता हैं- ‘धूप सूख कर/ कांटा हुई/ हवा सूख कर/ हुई प्यास/ पानी सूख कर/ धरती/ धरती सूख कर/ हो गई आकाश/ बादल पसीज कर/ पानी न हुआ।’

 

 

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