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दुनिया मेरे आगे- गांव की छांव

गांव से अब गांव ही दूर होते जा रहे हैं। लोग मुआवजे लेकर स्वेच्छा से अपनी जमीन, अपने खेत-खलिहान बेच कर शहरों की मलिन बस्ती में भी रह कर खुश हैं।
Author July 24, 2017 05:02 am
प्रतीकात्मक चित्र

गिरीश पंकज

एक प्यारा शेर है कि ‘मर ही जाता मैं शहर में बच गया, गांव की शीतल हवाएं साथ हैं।’ आज भी अनेक गांवों में जाएं तो वहां शीतल हवाएं, सघन अमराई और तालाब मिलेंगे। वहीं किसी कोने में छोटा-सा मंदिर हो सकता है। यह और बात है कि ऐसे मनोरम दृश्य वाले अनेक गांवों को महानगर निगलता चला जा रहा है। मेरे देखते-देखते छत्तीसगढ़ के अनेक गांव केवल अतीत की मधुर स्मृतियों में ही रह गए हैं अब। रायपुरा नामक गांव में कभी असंख्य कुम्हार हुआ करते थे, जो घड़े आदि बना कर आजीविका चलाते थे। अब तो रायपुरा भी रायपुर शहर की सीमा में आकर गुम हो चुका है। यहां बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बस रही हैं। जमीन की कीमत बढ़ी तो गांव के पुराने लोगों ने भी अपनी जमीन बिल्डरों को बेच दी और अब अपने पुश्तैनी काम से तौबा करके किसी सेठ के यहां कोई मजदूरी कर रहे हैं या कहीं दूर गांव में जमीन खरीद कर फिर से जमने की कोशिश में हैं।

लेकिन ज्यों-ज्यों शहर गांव को निगलने लगा, गांववालों को उजड़ने का मुआवजा मिला। उस पैसे से गांव के कुछ नौजवानों के पास बाइक आई और वे रफ्तार से बातें करने लगे। इस चक्कर में कुछ अकाल मौतें भी हुर्इं। न जाने कितने सपने एक झटके में ही चकनाचूर हो गए। जो युवा पहले साइकिल चला कर बीसियों किलोमीटर तक आना-जाना मजे से कर लेता था, अब उसे साइकिल अछूत-सी लगती है। उसे महंगी बाइक चाहिए। गांव के युवकों को भी लगता है कि हमें शहरी जीवन में ढलना चाहिए। इसलिए लड़कों और लड़कियों का पहनावा भी शहरी हो गया है। गांव का अपना ‘लोक’ और ‘आलोक’ लुप्त होता जा रहा है। हारमोनियम, ढोलक, तबला, मंजीरा, चिकारा, बेंजो आदि अब बीती बातें हैं। अब तो गांवों में ‘डीजे’ का जोर है और उसका ही शोर है। शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रमों में पारंपरिक वाद्ययंत्र अब कम ही दिखते हैं। अब तो डीजे के शोर में नाचती पीढ़ी नजर आती है। इस शोर में अब बुजुर्ग भी थिरकते हैं। वे गांव के परिवर्तन से दुखी नहीं लगते, बल्कि उसमें सहजता के साथ समरस नजर आते हैं।

गांव से अब गांव ही दूर होते जा रहे हैं। लोग मुआवजे लेकर स्वेच्छा से अपनी जमीन, अपने खेत-खलिहान बेच कर शहरों की मलिन बस्ती में भी रह कर खुश हैं। कुछ समझदार लोग किसी कॉलोनी में घर खरीद कर शान से गांव के बाकी साथियों को बताते हैं कि हमने तो फलां कॉलोनी में मकान लिया है, जहां अनेक बड़े-बड़े सेठ रहते हैं। भले ही अब अफसोस करते हैं कि वह आंगन, चौबारा नहीं है जो गांव में था। अब नई दुनिया है उनके सामने। वह लुभाने लगी है। गांव के एक सज्जन से जब मैं मिला तो वे बोले- ‘वहां धरा ही क्या था साहेब? कोई सुविधा तो थी नहीं। बाप-दादा रहते थे, तो हम भी रहने लगे। कच्ची सड़कें, झोपड़ियां, खेत-खार वाला जीवन बहुत हो गया। अब हम भी शहरी जीवन जीना चाहते हैं।’
क्या गांव और क्या शहर, विकास के नाम पर हर तरफ लोगों को उजाड़ा जा रहा है और लोग खुश हैं, क्योंकि उनके पास पैसा आ रहा है, भौतिक सुख-सुविधाएं बढ़ रही हैं। शहरी चमक-दमक को ही अब जीवन-स्तर का पर्याय समझा जा रहा है। शहरों में एक संस्कृति तो पहले से ही रही है कि कैसे हम भी पश्चिमी दुनिया की तरह आधुनिक जीवन के हिस्से बन जाएं, लेकिन अब यह ललक गांवों में भी बढ़ती जा रही है। यह स्वाभाविक है। हम शहर की कुछ सुविधाएं गांव तक नहीं पहुंचा सके, अलबत्ता गांव को उजड़ने की दिशा में अग्रसर कर दिया। तो गांव वही सुविधाएं पाने के लिए शहर तक आ पहुंचा। पहले उसके सामने मजबूरी थी कि उसके पास दौलत नहीं थी। अब गांव शहरी सीमा में आ रहा है। गांव में कोई कारखाना लग रहा है, कॉलोनियां बन रही हैं। सबके लिए जमीन चाहिए। जो जमीन दे रहा है, उसको खासा मुआवजा मिल रहा है।

अब हर हाथ में स्मार्ट मोबाइल है। पूरी ऊर्जा उसी के साथ बिलाती जा रही है। उसी मोबाइल में ज्ञान के अनेक केंद्र हैं, जिनके सहारे जीवन भी संवारा जा सकता है। लेकिन अभी गांव की नई पीढ़ी उस तक पहुंच नहीं रही है। अब गांव के लोग भी शहराती बन कर मगन हैं। उन्हें भी मॉल के बारे में पता है। अब गांव के संतोष, मोहन, गणेश बहुत जल्दी शहर में बसने वाले हैं। वहां कर लेंगे मजदूरी, लेकिन गांव के किसी रोजगार या कुटीर उद्योग से भी तौबा। गांव के धूल-धूसरित जीवन से सब मुक्ति चाहते हैं। वे सब मुक्ति चाहते हैं। लेकिन मैं गांव और उसकी शीतल छांव चाहता हूं। नदी, तालाब, हरियाली, अमराई चाहता हूं। शहरों में यह सब दुर्लभ है। लेकिन मेरे या आपके चाहने से क्या होगा!

 

 

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