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अंधविश्वास के निशाने

मैंने कई तस्वीरें ऐसी भी देखीं, जिनमें महिलाओं की चोटियों में नींबू-मिर्ची बंधी हुई है। यहां तक कि लोगों ने अपने घरों के दरवाजों पर नीम की डालियां और गोबर की थाप लगाई हुई है।
Author August 8, 2017 05:43 am
प्रतीकात्मक चित्र।

अंशुमाली रस्तोगी 

घर में हेलमेट पहन कर सो रही दो महिलाओं की तस्वीर किसी का भी ध्यान खींचने के लिए काफी है। खबरें सुर्खियों में हैं। जहां भी लोग आपस में बात कर रहे हैं, वहां बातचीत का एक अहम मुद्दा यह भी है। किसी को सोचने और समझने की जरूरत नहीं लग रही, बस चारों तरफ जो शोर है, उसी में बहुत सारे लोग बहे जा रहे हैं। शोर यह कि महिलाओं के लंबे बाल या चोटियां काट ली जा रही हैं। कौन और क्यों काट रहा है जैसे सवालों के जवाब किसी के पास नहीं। पुलिस की ओर से बयान आ रहे हैं कि अफवाहों पर भरोसा न करें। फिर भी, चोटी काटे जाने की खबरें आ रही हैं। समाज में जितने मुंह, उतनी बातें हैं। चोटी काटते हुए किसी ने किसी को नहीं देखा, इसलिए कोई इसे अफवाह करार दे रहा है तो कोई टोने-टोटके का दुष्प्रभाव बता रहा है। मनोवैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह ‘दिमागी फोबिया’ है और पूरी तरह अंधविश्वास है। इसलिए लोगों को मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए। इसके बावजूद पिछले कई दिनों से लगातार खबरों की सुर्खियों में इस तरह की कोई घटना जरूर होती है। हम अपने समाज की दृष्टि में जितना विकास कर सके हैं, उसमें चूंकि यह चोटी काटे जाने की बात ‘मसालेदार’ है तो बहुत सारे लोग सोशल मीडिया पर जम कर चोटी कटने के मामले पर चटखारे ले रहे हैं। मैंने कई तस्वीरें ऐसी भी देखीं, जिनमें महिलाओं की चोटियों में नींबू-मिर्ची बंधी हुई है। यहां तक कि लोगों ने अपने घरों के दरवाजों पर नीम की डालियां और गोबर की थाप लगाई हुई है।

यों हमारे देश में अफवाहों के पसरते और अंधविश्वासों के परवान चढ़ते जरा भी देर नहीं लगती। हर अफवाह और अंधविश्वास हमारे समाज में अफवाह फैलाने वालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होता! बहुत सारे लोगों को वह घटना आज भी याद होगी जब भक्तों ने देश भर में एक साथ गणेश की मूर्तियों को दूध पिलाना शुरू कर दिया था। नमक की किल्लत की एक अफवाह न जाने कहां से शुरू होती है और नमक सौ रुपए किलो बिकने लगता है। कोई हवा उड़ा देता है और लोगों को आलू या भिंडी में देवता नजर आने लगते हैं। दिमाग की परतों में बिठाई बातों की वजह से जब कुछ लोगों को राह चलते भूत दिखने लगता है या मिल जाता है तो चोटियां काटे जाने के पीछे किसी अदृश्य शक्ति का हाथ होने की खबर हैरान नहीं करती। ऐसी स्थिति में यहां कुछ भी हो सकता है। बस अफवाह या अंधविश्वास को जरा-सा हवा देने की जरूरत है।चोटी कटने से जुड़ी खबरें आमतौर पर ग्रामीण इलाकों या झुग्गी बस्तियों से आर्इं। शहरों में या किसी शहरी महिला के साथ ऐसा हुआ हो, ऐसी खबर शायद नहीं है। लेकिन चारों तरफ फैली चर्चा के बीच शहरी महिलाओं के बीच थोड़ी-बहुत दहशत ने धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई है। लगातार घटनाओं की खबरों का आना किसी को भी बेचैन कर सकता है। हालांकि शहरों में अंधविश्वास की कमी नहीं है, लेकिन अफवाह और अंधविश्वास का सबसे आसान निशाना भोले-भाले गांव-देहात के लोग अपेक्षया ज्यादा होते हैं। किसी भी अंधविश्वास के सहारे उन्हें बरगला दिया जाता है।

विडंबना यह है कि देश या समाज ने तरक्की के तमाम दावों के बीच जीना शुरू कर दिया है, लेकिन लोग अंधविश्वासों पर यकीन करना नहीं छोड़ पाते। ऐसा नहीं है कि अंधविश्वास का शिकार केवल अनपढ़ लोग होते हैं। मैंने तमाम ऐसे पढ़े-लिखों को अंधविश्वास की चक्की में पिसते और अपना सब कुछ लुटाते देखा है। टोने-टोटकों, ओझा-तांत्रिकों के सामने घुटने टेकने में लोगों को जरा भी हिचक नहीं होती। हालत यह है कि विज्ञान के अध्यापक भी घोर अवैज्ञानिक बातें करते मिल जाते हैं।यह सही है कि समाज में भौतिक रूप से या फिर ऊपरी तौर पर दिखने वाले बदलाव हो रहे हैं, लेकिन इंसानी दिमागों में गहरे बैठी बातों में बदलाव अभी भी गति नहीं पकड़ पा रहा है। अफवाहें हमें आज भी डरा देती हैं। अंधविश्वास हमें अंधश्रद्धा में बहुत कुछ गंवा देने पर मजबूर किए रहते हैं। प्रगतिशील समाज बनने से हम अभी भी बहुत दूर हैं। हममें से कुछ लोग चोटी काटने वाले को महिला-विरोधी कह कर निशाना बना सकते हैं, मगर महज यह करने से न महिलाओं का चोटी कटना बंद होगा, न अंधविश्वास पर लगाम लग पाएगी। पुलिस, प्रशासन, सरकार की मदद लेने से कहीं ज्यादा जरूरी है कि हम मनोवैज्ञानिक स्तर पर खुद को चुस्त और विकासमान बनाएं। दिमाग के दरवाजों को हमेशा खुला रखें। सच की तह में बिना जाए अफवाहों-अंधविश्वासों पर आंखें मूंद कर विश्वास कर लेने की आदत छोड़नी होगी। खुद पर भरोसे को अगर हम कमजोर करते रहे तो आज कुछ महिलाओं की चोटी काटना सुर्खियों में है, कल कोई और खबर आ जाएगी, जिसका कोई आधार नहीं होगा।

 

 

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