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दुनिया मेरे आगे- किताब बनाम रिमोट

मेरे पड़ोसी के आठ और ग्यारह वर्ष के दो बेटे हैं। अकसर उनके पिटने और चीखने-चिल्लाने की आवाजें मेरे घर तक सुनाई देती हैं। बाद में पता चलता है कि हर बार उनके माता-पिता द्वारा उन्हें पीटने का कारण किताबें या रिमोट होता है। किताबें वे छूना नहीं चाहते और रिमोट वे छोड़ना नहीं चाहते।

Author November 13, 2017 4:34 AM
प्रतीकात्मक चित्र

बाल्यावस्था को जीवन का स्वर्णिम समय माना जाता है क्योंकि इस आयु में मन चिंताओं से परे एक स्वप्निल दुनिया में होता है। बचपन की स्मृतियां भी अमिट होती हैं। जो चित्र या घटनाएं बाल-मन पर अंकित होती हैं, उनकी छाप अलग होती है। वे आजीवन धूमिल नहीं होतीं। साहित्य की छाप भी मानस-पटल पर कुछ ऐसी ही पड़ती है। लेकिन पहले की अपेक्षा आज का बचपन साहित्य से बहुत हद तक दूर होता जा रहा है। बच्चों की रुचियां काफी बदली हैं। बाल-साहित्य भी अपने मानकों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। मेरे पड़ोसी के आठ और ग्यारह वर्ष के दो बेटे हैं। अकसर उनके पिटने और चीखने-चिल्लाने की आवाजें मेरे घर तक सुनाई देती हैं। बाद में पता चलता है कि हर बार उनके माता-पिता द्वारा उन्हें पीटने का कारण किताबें या रिमोट होता है। किताबें वे छूना नहीं चाहते और रिमोट वे छोड़ना नहीं चाहते। मुझे लगा कि यह अकेले मेरे पड़ोसी की समस्या नहीं है बल्कि आज यह हर घर की कहानी है। बात ऐसी भी नहीं है कि बच्चे सिर्फ पाठ्य-पुस्तकों से दूर भागते हैं, बल्कि वे किसी भी किताब को हाथ लगाना नहीं चाहते, क्योंकि पढ़ाई को नीरस बना दिया गया है।

पहले टीवी नहीं हुआ करता था। तब बच्चों में पढ़ने के संस्कार अधिक थे। तब वे पुस्तकें पढ़ना ज्यादा पसंद किया करते थे। चंपक, नंदन, बाल भारती जैसी पत्रिकाएं पढ़ने के लिए बच्चे लालायित रहते थे। महीना भर कठिन इंतजार के बाद कॉमिक्स की नई सिरीज आती थी तो उसे पाने के लिए गली-मोहल्लों के बच्चों की कतारें लग जाया करती थीं। मजे की बात यह है कि तब कॉमिक्स किराए पर भी उपलब्ध हो जाया करते थे। पच्चीस या पचास पैसे प्रतिदिन की दर से कॉमिक्स मिल जाते थे। नागराज, सुपर कमांडो, ध्रुव, परमाणु, डोगा की हर नई सिरीज लेने के लिए होड़ रहती थी। चाचा चौधरी और साबू की कहानी दीवानगी की हद तक सिर चढ़ कर बोलती थी। उसमें हर पृष्ठ पर अंकित पंक्ति बरबस ध्यान आकर्षित कर लेती थी कि चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है। बच्चे बात-बेबात इन पंक्तियों को बार-बार दोहराया करते थे। राम-रहीम, मोटू-पतलू, बिल्लू, पिंकी जैसे पात्र मनोरंजन तो करते ही थे, साथ ही परिवार, समाज, मित्र, पड़ोस आदि के साथ सामंजस्य का बोध भी विकसित करते थे। ये पुस्तकें अपने बाह्य कलेवर में भी खूब आकर्षित करती थीं। देखने में तो वे सुदर्शन होती ही थीं, उनके भीतर के नैतिक मूल्य हमारे मन में गहरे पैठ जाते थे। इनके माध्यम से बचपन में पढ़ने का संस्कार विकसित होता था, जो आगे चलकर अध्ययन-मनन में मदद करता था। किसी भी बालक के मानसिक और चारित्रिक विकास में जितना योगदान परिवार, पास-पड़ोस और विद्यालयीय वातावरण का होता है, उससे कहीं अधिक साहित्य का होता है। बचपन में पढ़ी गई पाठ्यक्रम से इतर किताबें बच्चों में मानवीय मूल्यों का संचार तो करती ही हैं, साथ ही सामाजिकता के नए पाठ भी पढ़ाती हैं, जो आजीवन उनका संबल बना रहता है।

आज हम जिस समय में रह रहे हैं वहां सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है। इस भागमभाग और आपाधापी के जीवन में स्थिरता की बात करना भी बेमानी लगता है। बड़े तो बड़े, बच्चे भी इसी भागमभाग का हिस्सा बन चुके हैं। आज उनके जीवन में साहित्य का स्थान कार्टून चैनलों ने ले लिया है। सिनचैन, डोरेमोन, नोबिता, सुजुका जैसे पात्र न केवल उनके मनोरंजन का साधन बल्कि जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं। यह दुखद है कि आज के बच्चे साहित्य से बहुत दूर होते जा रहे हैं। वे दिन का जितना समय टीवी और कार्टूनों के साथ बिताते हैं वह उनके शारीरिकविकास के लिए तो बाधक है ही, मानसिक विकास के भी अनुकूल नहीं है। मानसिक आहार के रूप में उनके सामने कार्टून चैनलों का खुला संसार है। आज बच्चों में कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर आॅनलाइन गेम खेलने की होड़ लगी दिखाई देती है। अभिभावक भी गर्व का अनुभव करते हैं कि उनके बच्चे नई टेक्नोलॉजी के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहे हैं। यह समय की मांग भी है और जरूरी भी। लेकिन अति सर्वत्र वर्जयेत्- यह भी ध्यान रखना होगा।

यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि अच्छे संस्कार के बीज बोने के लिए पुस्तकों की आवश्यकता सतत बनी रहेगी। इसलिए यह आवश्यक है कि अभिभावक कुछ ऐसी पहल करें जिससे बच्चों में स्वाभाविक रूप से पठन-पाठन की रुचि का विकास हो। कितना अच्छा हो कि अभिभावक वर्ष भर में किसी भी विशिष्ट अवसर होली, दीपावली, दशहरा, जन्मदिन आदि पर न केवल अपने बच्चों को पुस्तकें तोहफे में दें बल्कि स्वयं भी उत्साह से पुस्तक पढ़ने में उनका साथ दें और इस कार्य में उपदेशक न बनकर सक्रिय भागीदारी करें। बदलाव संभव है, बशर्ते ईमानदारी से प्रयास किया जाए।

 

 

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