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दुनिया मेरे आगे: वह कठपुतली

समय गुजरने के साथ बदलाव हुए और वे पुराने खिलौने हवा होते गए। बच्चों के हाथ में रिमोट कंट्रोल का डिब्बा और वीडियो गेम आ गया।

Author January 17, 2017 1:46 AM
हस्तशिल्प कठपुतली (फाइल फोटो)

हेमंत कुमार पारीक

बच्चों को खिलौने बहुत प्रिय होते हैं। कल थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे। केवल खिलौने का स्वरूप बदलता रहता है। जब कोई सगा-संबंधी सालों बाद लौटता था तो बड़ों के लिए उपहारों के साथ बच्चों के लिए खिलौने भी जरूर लाता था। ये खिलौने मिट्टी या लकड़ी के होते थे। इसके अलावा, अगर मेहमान विदेश से आते थे तो प्लास्टिक के खिलौने लेकर आते थे। वे खिलौने चाभी से चलते थे। उनमें सबसे प्रिय खिलौना बंदर या भालू का होता था, जो चाभी भरते ही दोनों हाथों से करताल बजाता था। उसमें गति के साथ एक आवाज होती थी। इस तरह के जो ‘एक्टिव’ खिलौने थे, वे बच्चों की पहली पसंद हुआ करते थे। उन दिनों लट्टू यानी भौंरा चलाना बच्चों का प्रिय खेल था। सर्वसुलभ और लोकप्रिय! छुट्टी के दिन सड़क या फिर दालान में लट्टू चलाते बच्चे आमतौर पर दिख जाते थे। कहीं-कहीं इस खेल की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती थीं। इस खेल में कौशल की आवश्यकता होती है। धीरे-धीरे लकड़ी के लट्टू की जगह प्लास्टिक के लट्टू आ गए। बंदूक की तरह ट्रिगर दबाया और लट्टू घूमने लगा।

शायद यही वजह थी कि बच्चों के मनोरंजन के लिए दीपावली के बाद खिलौने का एक त्योहार मनाया जाता था, जिसे ‘पोला’ कहते थे। यह त्योहार केवल बच्चों के लिए था। हर मोहल्ले के बच्चे लकड़ी के हाथी, घोड़े, बैल और ऊंट लिये निकल पड़ते थे। इन खिलौने की पीठ पर कपड़े की थैलियां रखी होती थीं। उसमें लड्डू, खुरमे, बतासे और लाई आदि भर दिए जाते थे। एक बड़े-से मैदान में सारे बच्चे सामूहिक रूप से अपनी-अपनी मिठाइयां आपस में साझा करते और आनंद मनाते। यह परंपरा बच्चों में आपसी मेलजोल को बढ़ाती और भेदभाव को मिटाती थी।हर मौसम के अलग-अलग खेल थे। मसलन, गरमी में चरखी और पंतग लेकर बच्चे शाम के समय मैदान में डट जाते थे। किसकी कटी, किसने काटी और किसने लूटी के शोरगुल में आनंद था। इधर-उधर पतंग और चरखी लिये बच्चे भागते दिखते थे। हालांकि यह खेल जोखिम से भरा हुआ होता था। जान जाने तक का खतरा बना रहता था। फिर भी आज एकमात्र यही खेल बचा है। बल्कि अब तो इसने राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर ली है। मुझे तो लगता है कि कहीं कल यह क्रिकेट की तरह न खेला जाने लगे!

समय गुजरने के साथ बदलाव हुए और वे पुराने खिलौने हवा होते गए। बच्चों के हाथ में रिमोट कंट्रोल का डिब्बा और वीडियो गेम आ गया। सामने टीवी स्क्रीन पर आभासी कारों की रेस लगने लगी और बच्चों की अंगुलियां रिमोट पर बेतरतीब दौड़ने लगीं। लेकिन इस खेल के साथ बचपन चुपचाप एकाकी होता चला गया। बाहर दौड़-भाग करने वाले बच्चे घरों में अंदर बंद हो गए और उनकी दुनिया सिमटती चली गई।दरअसल, खिलौने से संबंधित कुछ वर्ष पहले की घटना अब तक मेरे जेहन से नहीं निकल सकी है। जब कभी बाजार में कहीं लटकती ‘डॉल’ यानी गुड़िया देखता हूं तो एक कठपुतली मेरी आंखों के आगे नाचने लगती है। कुछ वर्ष पहले अपने परिवार सहित मैं भोपाल में आयोजित होने वाले लोकरंग उत्सव को देखने निकला। इस मेले ने नदियों के किनारे लगने वाले मेलों की याद ताजा कर दी। उत्सव में हस्तशिल्प के सामानों से स्टॉल सजे थे, जहां विभिन्न प्रांतों के हस्तशिल्पी अपनी कला का मुजाहिरा करने आए थे। तरह-तरह के प्रसाधनों के साधन, कपड़े और खिलौनों से मेला पटा पड़ा था।

घूमते-घूमते अचानक बेटी बोली- ‘पापा कठपुतली!’ हम सबने देखा एक खूबसूरत गुड़िया हवा में हल्के-हल्के थिरक रही थी। बच्ची को भा गई थी। ऐसी कठपुतली मैंने सालों पहले देखी थी। किसी संबंधी के घर धूल से सनी आलमारी पर रखी गर्दन हिला रही थी। हालांकि रंग-रोगन उड़ गया था। बच्ची की ललचाई नजरों को मैंने पढ़ा और दुकानदार से पूछा- ‘कितने दाम हैं इसके?’ वह बोला- ‘साठ रुपए बाबूजी!’ मैंने कहा- ‘ज्यादा हैं! चालीस में दे दो।’ वह बोला- ‘नहीं पड़ेगी। पचपन में भी नहीं…।’ मैं वहां से विदा हो लिया। लेकिन रात भर वही कठपुतली मेरी आंखों के आगे नाचती रही। अगले दिन गया तो पता चला कि दुकान खाली पड़ी है।अगले साल तक इंतजार किया। पहले दिन ही मेले में जा पहुंचा। सारा मेला छान मारा, पर वैसी कठपुतली कहीं नजर नहीं आई। पूछने पर किसी ने बताया कि वह श्योपुरकलां का कलाकार था। पिछले साल घाटा लगा तो इस वर्ष नहीं आया। उसके बाद से हर साल मैं वहां जाता हूं, पर कहीं मटकती हुई वह कठपुतली दिखाई नहीं देती। वक्त निकल गया है। बेटी बड़ी हो गई है और एक उच्च पद पर कार्यरत है। उसका बचपना चला गया, लेकिन मेरे जेहन में अभी तक पछतावा बाकी है। सोचता हूं कि एक बार कहीं दिख भर जाए तो मुंहमांगे दामों पर खरीद लूं। फिर भी उसका गया बचपन तो लौटने वाला नहीं है।

 

 

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