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नाम बेनाम

पहले आमतौर पर लोग अपने बच्चों का नाम देवी-देवताओं के नाम पर रखते थे।

Author December 28, 2016 1:53 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अमरेंद्र कुमार राय

पहले आमतौर पर लोग अपने बच्चों का नाम देवी-देवताओं के नाम पर रखते थे। इसके पीछे उनकी सोच यही होती थी कि अगर उनके थोड़े-बहुत गुण भी उनके बच्चे में आ जाएंगे तो ज्यादा कुछ नहीं हुआ तो भी उसका कल्याण हो जाएगा! बाद में पढ़े-लिखे कुछ माता-पिता महापुरुषों के नाम पर अपने बच्चों के नाम रखने लगे। सोच वही थी कि उनकी संतान भी महापुरुषों की तरह ही अच्छा और बड़ा काम करके नाम कमाए। कुछ लोग चाहते थे कि उनके बेटे या बेटी का नाम ऐसा नहीं हो, जो आमतौर पर पाया जाता हो। इसलिए वे ऐसे नाम ढूंढ़-ढूंढ़ कर रखने लगे, जो नाम पहले कभी सुने न गए हों या उनकी जानकारी में नहीं हो। इसके लिए वे दूसरी भाषाओं की भी मदद लेने लगे।

नाम के बिरलेपन का खयाल रखते हुए वे यह भी भूल जाते थे कि किसी चुने गए खास नाम का मतलब क्या होता है। मेरे एक कवि मित्र ने अपनी बेटी का नाम विदेशी भाषा के शब्द से लिया है। सुनने में नाम बहुत अच्छा लगता है, पर उसका मतलब समझ में नहीं आता। मैंने जब पहली बार उसका नाम सुना तो उन्होंने ही बताया कि यह रूसी भाषा का शब्द है। जब मैंने उनसे उसका मतलब पूछा तो उन्होंने बताया ‘पतझड़’। यह सुन कर मेरा मन दुखी हो गया। मैंने उनसे कहा भी कि कम से कम यह नाम तो नहीं रखना चाहिए था! हम तो अपने बच्चों के जीवन में हर्षोल्लास की कामना करते हैं, पतझड़ के तो खयाल से ही उदासी छा जाती है! आजकल लोग खिलाड़ियों और फिल्मी सितारों के नाम पर भी अपने बच्चों का नामकरण करते हैं। सोच वही कि उनका बच्चा उसी खिलाड़ी या फिल्मी सितारे जैसा नाम कमाए। सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग और शाहरुख, सलमान या अक्षय कुमार की सफलताओं से प्रभावित होकर कई लोगों ने अपने बच्चों के नाम इन्हीं के नाम पर रख दिए हैं। मधुबाला, रेखा, मुमताज और करीना भी लड़कियों के नाम खूब रखे गए हैं।

इसके अलावा, परिस्थितिजन्य नाम भी खूब रखे जाते हैं। मसलन, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की बड़ी बेटी का नाम मीसा है। लालू आपातकाल के दौरान तत्कालीन ‘मीसा’ कानून के तहत जब जेल में बंद थे तभी उन्हें पुत्री होने की सूचना मिली और एक मित्र के सुझाव पर उन्होंने उसका नाम मीसा रख दिया। कुछ लोगों के बच्चे जिंदा नहीं रहते थे। यह अंधविश्वास है कि ऐसे बच्चों को अगर किसी को बेच दिया जाए तो वे जिंदा रहेंगे। ऐसे बच्चों का नाम आमतौर पर ‘बेचन’ या ‘फेंकन’ रख दिया जाता है। गरीबी-अमीरी और रूप-रंग के आधार पर भी बच्चों के नाम रखे जाते हैं। इसके उदाहरण ग्रामीण इलाकों में आज भी मिल जाते हैं। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है, कुछ भी हो। वे तर्क देते हैं कि ‘लक्ष्मी’ नाम की न जाने कितनी महिलाएं भीख मांगती देखी गई हैं और ‘गरीब’ दास को कई कुबेरों से काम लेते देखा गया है।

नाम को लेकर ये विचार आज से नहीं, सदियों से चर्चा का विषय रहे हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में भी नाम के इस विषय पर अपना पक्ष रखा है। उन्होंने किसी व्यक्ति या भगवान से भी बड़ा उसके नाम को बताया है। उन्होंने तो यहां तक कहा कि खुद भगवान राम जितने लोगों का भला कर सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनका नाम लेकर लोगों का भला होता है। आजकल लोगों के बीच और खासतौर पर सोशल मीडिया पर फिल्म कलाकार सैफ और करीना के बेटे का नाम ‘तैमूर’ रखे जाने को लेकर खूब चर्चा हो रही है। मेरे एक मित्र ने तैमूर के क्रूर लुटेरा होने के इतिहास के बारे में लिखा, लेकिन यह भी कहा कि नाम और कर्म में जमीन-आसमान का अंतर होता है। इतना हो-हल्ला मचाने की जरूरत नहीं। तो दूसरे ने बताया है कि तैमूर दरअसल तुर्की शब्द ‘तिमुर’ का अशुद्ध उच्चारण है।

एक नाम के व्यक्ति को अंतिम उदाहरण नहीं बनाया जा सकता। लेकिन कई चीजों के बारे में समाज की जो सोच रूढ़ हो जाती है, उसमें किसी बच्चे या व्यक्ति को अपने नाम का नफा-नुकसान उठाना पड़ सकता है। और कुछ नहीं तो लोगों के तानों के ही रूप में। कई बार तो बच्चे खुद दोस्तों की ओर से अपने नाम की खिल्ली उड़ाने से परेशान होकर अपने माता-पिता से इसकी शिकायत करते हैं और यहां तक की नाम बदलने की जिद करने लगते हैं। मेरा मानना है कि इन सबसे ऊपर हर मां-बाप को अपने बच्चे का नाम रखने का अधिकार है। वह क्या सोच कर अपने बच्चे का क्या नाम रखता है, यह उन दोनों के सोचने-समझने के तरीके पर छोड़ देना चाहिए। एक नाम वाले अलग-अलग व्यक्ति अतीत और वर्तमान में अलग पहचान वाले हो सकते हैं। बल्कि परस्पर विरोधी आचरण वाले भी हो सकते हैं।.

 

 

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