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दुनिया मेरे आगे- कोलकाता में एक दिन

नागार्जुन कोलकाता बार-बार आते थे। शोभाकांत कहते हैं कि कोलकाता से ही बाबा रूढ़िग्रस्त परंपरा से दो-दो हाथ करने और अपने नाम ‘यात्री’ को सार्थक बनाने के लिए निकले थे।
Author June 29, 2017 05:29 am
प्रतीकात्मक चित्र।

सुधीर विद्यार्थी

सूरज सवेरे से खिड़की में जड़ा खड़ा था। अभी उसका रंग सुर्ख था अंगारे की मानिंद। धीरे-धीरे उसके गोल घेरे में पीलापन बढ़ने लगा। वह दिन भर के लिए किसी कारखाना मजदूर की तरह काम पर निकलता है और शाम को झुकते हुए समय की साइकिल पर चढ़ कर खरामा-खरामा घर लौट जाता है। सूरज कभी थकता नहीं, सामने बन रही इमारत में लगे कैमरों की तरह। कोलकाता के न्यू टाउन में एक अपार्टमेंट की पांचवीं मंजिल पर से मैं यह सब देख और महसूस कर रहा था। यहां नमक की झील है, जिसके नाम पर इसे साल्टलेक सिटी कहा जाता है। यहां आने पर हर बार गंगा के विशालतम रूप को देखता हूं। पद्मा कभी नहीं देखी। उसका सिर्फ नाम सुना है। वह ज्यादा बड़ी नदी है, गहरी भी। आज मानचित्र में पद्मा का जलमार्ग देखता रहा। कुछ मित्रों से चलने के लिए कहा, लेकिन कोई इतनी लंबी यात्रा पर निकलने को तैयार नहीं। नदियां मुझे खींचती हैं। दो साल पहले रानीगंज आया, तब लौटने से पहले दामोदर नदी के किनारे गया था, जहां ‘कार ऐंड टैगोर कोयलरी कंपनी’ के अवशेष भी देखने को मिले। वहां वह नदी बहुत रुग्ण लगी। उसे देख कर बाबा नागार्जुन की कविता याद आती रही- ‘हां, पानी में आग लगाओ, नदियां बदला ले ही लेंगी।’ जब बर्नपुर पहुंचा तो दामोदर की धारा इस शहर के किनारे बहती सुंदर और स्वस्थ लगी। उसके तट मानो निकट आने का आमंत्रण दे रहे थे। सोच रहा हूं कि पद्मा में नाव चलाने वाले मल्लाहों के लोक गीत पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की धरती पर किसी को याद भी होंगे भला। सुना है, बंगाल की नदियां सागर से मिलने के लिए बहुत बेचैन रहती हैं। यहां तो सड़कों पर कारों का काफिला नदियों की मानिंद बहता है, जिसे पार करना किसके बूते की बात है! फिर भी मुझे कोलकाता से अपनापन महसूस होता है और दिल्ली परदेस सरीखी लगती है। दिल्ली से मेरा जुड़ाव कभी नहीं बन पाया और वह मुझसे हमेशा दूर ही बनी रही।

नागार्जुन कोलकाता बार-बार आते थे। शोभाकांत कहते हैं कि कोलकाता से ही बाबा रूढ़िग्रस्त परंपरा से दो-दो हाथ करने और अपने नाम ‘यात्री’ को सार्थक बनाने के लिए निकले थे। इसके लिए कितना कुछ करना पड़ा, यह उनका साहित्य ही बताता है। नागार्जुन और कोलकाता पर गीतेश शर्मा की किताब में इस शहर से बाबा के रिश्ते की थोड़ी-सी परतें खुलती हैं। विष्णुकांत शास्त्री ने बाबा पर एक अद्भुत संस्मरण लिखा था। फिलहाल भूल रहा हूं कि उसमें कितना उनके कोलकाता प्रवास का जिक्र है। गीतेश जी ने मुझे बताया कि ‘मंत्र’ कविता बाबा ने यहीं उनके आवास पर हनुमान चालीसा के आकार जैसे कागज बना कर लिखी थी, जिसकी मूल प्रति उनके पास सुरक्षित है। यह कविता मुझे बहुत प्रिय है। बाबा एक बार जब धनबाद से दिल्ली लौट गए तब कुसुम जैन को पत्र में लिखा- ‘काली माता ने इधर नहीं बुलाया।’ बचपन से ही सुनने को मिलता रहा- ‘जय काली कलकत्ते वाली, तेरा वचन न जाए खाली’ या ‘ओम जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।’ जब कभी किसी से कोलकाता की चर्र्चा होती तो उसमें सबसे पहले बंगाल का काला जादू आ खड़ा होता और वे बंगाली जादूगरनियां भी अपना रूप धर कर हौले-से उस कथा में उपस्थित हो जातीं जिनके लिए किसी भी परदेसी को अपने वश में कर लेना बहुत आसान हथकंडा होता।

बंगाल का जादू मेरे ऊपर मेरी किशोरावस्था से ही छाता रहा। यानी सत्रह साल का था तभी चटगांव मामले की प्रीतिलता की कीर्ति-गाथा जाने कहां से पढ़ने को मिली कि क्रांति शब्द के मायने तलाश करना मेरी नियति बन गई। मैं उस गिरफ्त से फिर निकल नहीं पाया। अब तो वही मेरा कुरुक्षेत्र है। जिन जगहों पर जाकर क्रांति के सूत्रों की तलाश करने की मेरी चाहत है, उनमें चटगांव प्रमुख है। सुना कि चटगांव की क्रांति पर बनी फिल्म आज के चटगांव (बांग्लादेश) में प्रदर्शित नहीं होने दी गई। यह सचमुच पीड़ादायक है। लेकिन लाहौर ही कहां याद रख सका भगतसिंह को। वहां तो वे निशान भी नेस्तनाबूद कर दिए गए जो उनकी शहादत के मूक साक्षी थे। उनकी फांसी वाली जगह पर अब चौराहा है।लगता है, बांग्लादेश की धरती पर अनोखे क्रांतिकारी शहीद मास्टर दा सूर्यसेन की यादों को तलाश करना अब बेमानी होगा। किसे याद होगा कि उस देश के मुक्ति संग्राम के दिनों में कोलकाता में पुराने क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक में शेख मुजीबुर्रहमान ने कहा था कि मैं उसी काम को पूरा करने की कोशिश कर रहा हूं जिसे मास्टर दा सूर्यसेन अधूरा छोड़ गए थे। सूर्यसेन सिर्फ बंगाल के नहीं, पूरे देश के शीर्ष क्रांतिकारी नेता थे।

 

 

 

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