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दुनिया मेरे आगे- बच्चे और हम

हम लोग किसी मसले पर बच्चों की राय लेने को ठीक नहीं मानते। शायद ही कभी उनकी राय लेते हों या उनके विचार पूछते हों।

Author October 24, 2017 12:49 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

कालू राम शर्मा 

हम लोग किसी मसले पर बच्चों की राय लेने को ठीक नहीं मानते। शायद ही कभी उनकी राय लेते हों या उनके विचार पूछते हों। मेरे एक मित्र हैं, जो स्कूल में शिक्षक हैं। उन्होंने बताया कि वे अपनी अपनी आठ बरस की बेटी से उसकी राय लेने को काफी महत्त्व देते हैं। मुझे यह जानकर अच्छा लगा, क्योंकि वैसे तो हम बच्चों से कुछ पूछते ही नहीं। और अगर वे कुछ बताना या कहना भी चाहें तो हम यह कह कर टाल देते हैं कि ‘ये क्या समझते हैं..इनमें बचपना है।’ ऐसा शायद हम इसलिए करते हैं कि बच्चों की अहमियत को समझने में नाकामयाब रहे हैं। उस बच्ची के पिता जैसे कितने होंगे जो अपने बच्चों से किसी मसले पर उनकी राय पूछते होंगे।

बच्चों को सम्मान देने की कोरी बातें हर कहीं खूब होती हैं। समाज में भी सुनने को मिलता है कि बच्चा भगवान का रूप होता है। मगर सम्मान का अर्थ क्या है? क्या कोरे खिलौने उपलब्ध करा देना? सम्मान केवल कहने रहने से तो नहीं होगा। बच्चों को सम्मान देने का मामला जुमलेबाजी में सिमटता हुआ दिखाई देता है। दरअसल, हमारा समाज किस तरह से बच्चों के बारे में सोचता है और किस प्रकार उनके साथ पेश आता है, इसमें बड़ा अंतर है। इतना ही नहीं, कहने को तो हमारा स्कूली शिक्षा तंत्र तमाम नीतियों और शिक्षा के दर्शन और लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित होता है। मगर कथनी और करनी में बड़ा फर्क दिखाई देता है। स्कूलों में बच्चों को बहुत कुछ डांट कर ही समझाया जाता है। उन्हें अपने मन की बात व्यक्त करने के अवसर नहीं के बराबर होते हैं। मामला यहां सत्ता का भी आ टपकता है। देखा जाए तो बच्चों पर वयस्कों की सत्ता चलती है। जहां सत्ता चलती है वहां उनके विचारों को तरजीह नहीं मिलती। फिर वे चाहे बच्चे ही क्यों न हों?

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हमारी नौकरशाही पर जरा नजर डालिए। ऐसे अधिकारी बहुत ही कम होंगे जो अपने यहां लोकतंत्र को फलने-फूलने का अवसर मुहैया कराते हों। वहां अपने ही सहयोगियों के विचारों को व्यक्त करने की गुंजाइश नहीं रहती। ये औपनिवेशिक मानसिकता के लक्षण हैं। ये चीजें हमारी व्यवस्था में गहराई से समाई हुई हैं। इससे बच्चे कैसे बचे रह सकते हैं!  असल में, शिक्षकों को प्रशिक्षण के दौरान ही यांत्रिक ज्ञान परोसा जाता है। किसी मसले पर उनके क्या विचार हैं, इस पर विमर्श करने के अवसर ही नहीं हैं। यही वजह है कि शिक्षक अपने बच्चों के साथ वही प्रक्रिया अपनाते हैं, जो उनके साथ प्रशिक्षण में अपनाई गई थी। शिक्षक-प्रशिक्षणों की नियति कुछ इस प्रकार की बना दी गई है कि शिक्षक भी पका-पकाया ज्ञान चाहते हैं।

कम ही जगहें हैं जहां शिक्षण कार्यक्रमों में शिक्षकों को अपने विचार व्यक्त करने की छूट रहती हो। होशंगाबाद में बाल वैज्ञानिक कार्य पुस्तकों के पन्नों को पलटें तो इसी तर्ज पर प्रश्न मिलेंगे जहां बच्चों के विचारों को व्यक्त करने के समृद्ध अवसर हैं। फलां मामले में तुम्हारा क्या विचार है? क्या तुम इस बात से सहमत हो? अगर सहमत नहीं हो तो कारण बताओ? फलां मामले में अपने विचार व्यक्त करो। अच्छी बात यह है कि एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों में भी इस प्रकार के सवालों के दर्शन होते हैं। एक बार मैंने कुछ बच्चों से जब खुल कर बातचीत की और उनसे पूछा कि उन्हें क्या करना अच्छा लगता है तो बच्चों ने स्पष्ट जवाब दिए। बच्चों के दिमाग में हम वयस्क ही हैं जो कूड़ा-कचरा डालते हैं। बच्चों ने बताया कि उनकी गली-मोहल्ले में जो झगड़े होते हैं वे भी नहीं होना चाहिए। बच्चों को हिंसा कतई पसंद नहीं होती।

प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री फाइनमैन ने लिखा है कि बचपन में उनकी मां रोजाना उनसे पूछतीं थीं, ‘आज तुमने स्कूल में क्या पूछा?’ इस सवाल ने फाइनमैन के जीवन पर गहरा असर डाला। बालक फाइनमैन में सवाल पूछने की ललक पैदा हो गई। इसके मायने व्यापक हैं। आखिर एक बच्चे को हम किस नजरिए से देखते हैं। हम बच्चों को प्यार तो करते हैं मगर वयस्क दिमाग में कहीं न कहीं यह बात गहराई से जड़ें जमा चुकी है कि वे नादान हैं, वे कुछ कर नहीं सकते, वे सोच नहीं सकते इत्यादि। वयस्क समाज इस नजरिए से देखता है कि हम बच्चों की मदद कर दें। दरअसल, यह दया दिखाना बच्चों को सोचने से दूर ले जाना है। बच्चों के साथ ऐसा कुछ हो जहां वे ‘कुछ करें’, वे इस दुनिया पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें। उनके विचारों को हम वयस्क समझें कि वे किस प्रकार से सोचते हैं। बच्चों को जो अच्छा लगता है, वह वयस्कों को नहीं सुहाता। दरअसल, बच्चों पर हम वयस्कों को भरोसा नहीं होता कि वे जो भी करेंगे, बेहतर करेंगे। हमारी यही सोच बच्चों को किसी भी मायने में खुला नहीं छोड़ती। न विचारों की अभिव्यक्ति के मामले में, न कुछ करने के मामले में। फिर भी बच्चे अपने रास्ते खोज ही लेते हैं।

 

 

 

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