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दुनिया मेरे आगे- लेखन की परिधि

दिन भर के अनुभवों से जुड़ा जो भी मैं लिखने की सोच रही हूं, वह लिखने लायक है या नहीं! शुरुआती कुछ दिनों में जो भी लिखा, उसे लेकर एक शंका और कच्चापन-सा महसूस करती रही।
Author July 20, 2017 04:53 am
प्रतीकात्मक चित्र।

पायल यादव

डायरी लिखने के शुरुआती दौर में बार-बार मन में यह सवाल उठता रहता था कि दिन भर के अनुभवों से जुड़ा जो भी मैं लिखने की सोच रही हूं, वह लिखने लायक है या नहीं! शुरुआती कुछ दिनों में जो भी लिखा, उसे लेकर एक शंका और कच्चापन-सा महसूस करती रही। डायरी लेखन को एक तरल विधा माना जिसमें लिखने वाले को अवसर मिलता है अपने मन की बात रखने का, खुद से जुड़ने का। लेकिन ऐसी विधा में भी लिखते समय मेरा निरंतर इस दुविधा में रहना कि जो लिख रही हूं वह लिखने लायक है या नहीं, यही दर्शाता है कि हम अक्सर अभिव्यक्ति और लेखन जैसे मसलों को लेकर मानसिक तौर पर कितने लाचार हो जाते हैं। दरअसल, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में हम कई तरह के लेखों के संपर्क में आते हैं। फिर जब कुछ लिखते हैं तो कोशिश रहती है कि इन्हीं लेखों की तर्ज पर कुछ लिख डालें। इस प्रक्रिया में लगातार एक मानसिक तुलना हमारे भीतर चलती रहती है- हमारे लेखन और उन लेखन प्रकारों के बीच, जो अभी तक हमने पढ़े या सुने हैं। हम लगातार कोशिश करते हैं कि बने-बनाए ढांचे के अंदर हमारा लेखन भी फिट हो जाए। अगर ऐसा नहीं कर पाते तो अपने लिखे में एक अधूरापन-सा महसूस करते हैं। अधूरेपन की यह भावना अक्सर हम पर इतनी हावी रहती है कि अपने लेखन को सामान्य-सा समझ कर बीच में ही लिखना छोड़ देते हैं और फिर से जुट जाते हैं कुछ ‘लिखने लायक’ की खोज में। इस बेचैनी से भरी प्रक्रिया में क्या लिखने लायक है और क्या नहीं, इन सवालों के जवाब हम बने-बनाए खांचे में ढूंढ़ते रहते हैं।

यहां दो सवालों के बारे में सोचना जरूरी लगता है। पहला कि लेखन को हम क्या मानते हैं और दूसरा, इसकी विविध शैलियों में खुलेपन को हम किस सीमा तक स्वीकार करते हैं! यह मुख्य तौर पर हमारे विचारों, अनुभूतियों और विभिन्न अनुभवों से जुड़ा मसला है। इसके विविध प्रकारों में आवश्यकतानुसार कुछ मौलिक तत्त्वों का होना जरूरी है, लेकिन इस मौलिकता की नींव पर हम कुछ लीक से हट कर लिख पा रहे हैं तो केवल इस आधार पर नहीं सकुचाएं कि यह लेखन पहले की शैलियों से मेल नहीं खाता। हमारे विचार और अनुभव अभिव्यक्ति के लिए भाषा के मोहताज होते हैं। उन प्रतिमानों और मानकों के नहीं, जो समय-समय पर विकसित हुए हैं और जिनमें विकास की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।
लेखन की विविध शैलियों में खुलेपन की अगर बात करें तो इसका कोई निश्चित आधार नहीं हो सकता। अगर हम हमेशा कुछ बने-बनाए खांचों में ही लिखते रहेंगे तो लेखन में खुलापन, सर्जनात्मकता जैसे विचार ही बेमाने-से लगेंगे। ऐसे में हमारा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि जो भी हमने लिखा है, उसमें एक स्पष्टता हो। जो भी हम कहना चाह रहे हैं, उसमें इतनी सहजता हो कि वह पढ़ने वालों को समझ में आ सके। इसके लिए कई बार अपने ही लिखे हुए में बार-बार सुधार करना या संपादन भी जरूरी होता है। लेकिन तराशने की इस प्रक्रिया में हमारा औजार हमारी भाषा बने न कि बने बनाए खांचे।

स्कूल के दिनों में मैंने चिड़िया के बच्चे की एक कविता पढ़ी थी। इस कविता में चिड़िया का बच्चा जब अंडे के भीतर होता है तो उसे लगता है कि यही पूरा संसार है। फिर जब वह अंडे से बाहर निकल कर घोंसले में आता है तो सोचता है कि उसका घोंसला ही पूरा संसार है। फिर आखिर में जब वह अपने दोनों पंख पसार कर आसमान में उड़ता है तो उसे समझ आता है कि यह संसार तो बहुत बड़ा है। लेखन का संसार भी कुछ ऐसा ही है। इसकी दुनिया भी बहुत बड़ी है। जरूरी है कि हम अपने घोंसले जैसे सीमित दायरों से बाहर निकलें।
लेखन लेखक को खुद से और शेष समाज से जोड़ता है। वह एक जरिया बनता है बातचीत और विमर्श का। लेकिन जबरन डाली गई बातें हमारे विचारों और अभिव्यक्तियों को चोटिल कर देती हैं। एक बंधे-बंधाए ढांचे में लिखने की चाह अक्सर लेखन को नीरस और बोझिल बना देती है। भावों का अभाव हमारे लिखे में खटकता रहता है। ऐसे में न तो हम खुद अपने लेख से जुड़ाव महसूस कर पाते हैं और न ही हमारे लेख को पढ़ने वाले पाठक। इसलिए लेखन की परिधियों को कसने की नहीं, बल्कि खोलने की आवश्यकता है। इसकी संपूर्ण विधा कुछ चुनिंदा कसौटियों के सहारे विकसित नहीं की जा सकती। लीक से हट कर लिखना विभिन्न भावों को आवाज देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो विचारों को मामूली समझ कर अभिव्यक्त नहीं करने जैसे डर हमेशा बने रहेंगे!

 

 

 

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