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दुनिया मेरे आगे: सृजन के विकल्प

मनुष्य के लिए प्रकृति एक वरदान की तरह है, जिसके अलग-अलग रूप में सौंदर्य झलकता है।

Author September 28, 2016 4:08 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

किसी भी व्यवस्था को बेहतर बनाना राजनीति का काम है और साहित्य का काम है व्यक्ति के अंतर्मन को बदलना। इसीलिए कहा जाता है कि साहित्य अंतर्मन की राजनीति करता है। वह लोगों की भीतरी चेतना को जगाता है। तभी साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने समाज को ऐसा माहौल दे सके, जहां पहले से कहीं बेहतर की आशा हो और उसके लिए प्रयास के साथ चिंतन और संवाद भी निरंतर बने। अपने उद्देश्यों से ही साहित्य हमेशा समाज में बराबरी का पक्षधर रहा है और ऐसे समाज की परिकल्पना करता है जहां अंतिम जन तक की चिंता हो। इसलिए साहित्य में संघर्ष की उपस्थिति उतनी ही आवश्यक है, जितनी परिवार में मुखिया की। जिस तरह घर में किसी बड़े के नहीं होने से निर्णय का भार छोटे कंधों पर पड़ जाता है और घर की व्यवस्थाएं डगमगा जाती हैं, ठीक वैसे ही संघर्ष की अनुपस्थिति में साहित्य भी समाज को मार्ग दिखाने में अक्षम रहेगा।

मनुष्य के लिए प्रकृति एक वरदान की तरह है, जिसके अलग-अलग रूप में सौंदर्य झलकता है। लेकिन साहित्य कर्म में गंभीर दायित्व के चलते इससे भी अधिक सुंदर की कल्पना की जा सकती है, क्योंकि सिर्फ सौंदर्य के जरिए कहां तक पहुंच बन सकती है! इससे पाठकों की चेतना तक नहीं पहुंचा जा सकता। उसके लिए वास्तविक संघर्ष दिखने जरूरी हैं, जिनकी पहचान समाज के बीच रह कर ही हो सकती है। जब ये संघर्ष रचनाकर्म का हिस्सा बनते हैं और साहित्य के जरिए सुधी पाठक के अंतर्मन को झकझोरते हैं, उसके बाद यहीं से चेतना का संचार होता है, जो भावों के जरिए अपने से संभव अच्छा कर पाने के विचार तक ले जाता है। हालांकि रमणीयता भी कुछ समय के लिए मन को लुभाती अवश्य है। लेकिन सच्चा साहित्य सदैव समाज के बीच से होकर आता है। ऐसे में सृजन के लिए किसी रमणीय स्थान की खोज करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सौंदर्य हमारे आसपास ही बिखरा रहता है। जैसे कहीं अच्छे विचारों के रूप में तो कहीं मिट्टी की खुशबू तक में सौंदर्य के दर्शन किए जा सकते हैं। आमतौर पर रात में प्रकाश के बल्ब की ओर झांकने पर चंद लम्हों में संपूर्ण जीवन के दर्शन हो जाते हैं, जहां एक तरफ कोई छिपकली अपनी भूख से संघर्ष कर रही है तो किसी छोटे कीड़े का पूरा जीवन दांव पर लगा है।

किसी भी साहित्य में उसका समाज और उस समाज के लिए चिंता, दोनों परिलक्षित होते हैं। तभी सच्चा साहित्य समाज की बेहतरी के लिए सतत रचनात्मकता को लिए चलता है। आखिरकार संघर्ष की जमीन साहित्य के लिए सबसे उपजाऊ होती है, जहां बेहतर समाज के सपने रचनाकार देख सकता है। हालांकि रचने का भी अपना संघर्ष है। तीव्र अनुभूति के जरिए जिस रचना का सृजन होता है, उसके पात्र रचनाकार को चैन नहीं लेने देते। रचनाकार ‘कल्पना’ और ‘प्रत्यक्ष’ के मिश्रण से रचना में उतार कर उन्हें जीवन देता है वहां सौंदर्य स्वत: आ जाता है, क्योंकि सौंदर्य की उपस्थिति सहजता के अधिक निकट होती है। तभी संभव है कि किसी भी रचना में भरे वास्तविकता के रंगों की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। जैसे किसी मूर्तिकार द्वारा सदियों पहले बनाई गई अत्यंत आकर्षक मूरत के बारे में कहा जाता है कि ‘इसमें जैसे जान डाल दी हो कि आज भी सजीव नजर आ रही है’ अथवा ‘किसी चित्रकार की बनाई खूबसूरत तस्वीर देखकर लगता है जैसे अभी बोल उठेगी !’

वर्तमान में कोई पाठक साहित्य से उसी दशा में जुड़ा रह सकता है, जब उसे साहित्य से जीवन दृष्टि मिले और इसमें उपस्थित संघर्ष अपने पाठक को ताकत दे। आखिर आज बदलते समय के अनुरूप साहित्य का हमेशा की तरह अपनी कसौटी पर खरा उतारना नितांत जरूरी है, क्योंकि अनेक माध्यमों के होते हुए भी समाज में सबसे अधिक विश्वसनीयता अच्छी किताबों की है। दरअसल, सच्चा रचनाकार वैश्विक दृष्टि का धनी होता है। जीवन के बेहद साधारण लगने वाले संदर्भों में भी वह मर्म ढूंढ़ लेता है। बाकी तो रचनाकर्म में अनुकरण की प्रवृत्ति ही अधिक पाई जाती है। इससे वाहवाही तो मिल जाती है, लेकिन मौलिकता हाशिये पर चली जाती है। यही वजह है कि किसी भी युग में बहुत से प्रसिद्ध रचनाकार होते हैं, लेकिन जिनके यहां ‘अनुभव की तीव्रता’ हो और उसके जरिए रचना का जन्म हुआ हो, ऐसे सच्चे रचनाकार कम मिलते हैं।

एक सुगढ़ रचना में साधारण से प्रसंगों को असाधारण ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता होती है तभी जायसी बड़े रचनाकार हैं, क्योंकि उनके यहां सहजता बड़े ही कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त होती है। ‘पद्मावत’ में बारिश रुकने के बाद छप्पर के अंतिम छोर से रिस-रिस कर गिरने वाली पानी की बूंदें जमीन में हलका गड्ढा बना लेती हैं। किसी के प्रेम में बह रहे आंसुओं के लिए इससे बेहतर उपमा और क्या हो सकती है!

 

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