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दुनिया मेरे आगे: आराम की चारपाई

जो लोग जानते थे, उनके कहे बिना ही खटिया निकाल कर उनसे बाहर बैठने को कहते थे। तब यही लगता था कि यह उनके सम्मान में किया जाता था। अमरेंद्र कुमार राय का लेख।

Author September 22, 2016 5:16 AM
राहुल गांधी का खाट चर्चा में एक बार फिर लूट मची (ANI PHOTO)

अमरेंद्र कुमार राय

आजकल ‘खटिया सभा’ सुर्खियों में है। हमारे चार बाबाओं में से एक पुजारी बाबा थे। वे कोई काम नहीं करते थे। रात के अंतिम पहर में ही उठ कर गंगा स्नान के लिए चले जाते थे और दिन चढ़ने पर वहां से लोटे में गंगाजल लेकर आते थे। दरवाजे पर ही खाना खाते थे और वहीं बरामदे में पड़ी चारपाई (खटिया) पर आराम करते थे। जब शाम हो जाती थी तो जो कोई भी आता था उससे खटिया बाहर निकलवाते थे और उस पर बैठ जाते थे। जो लोग जानते थे, उनके कहे बिना ही खटिया निकाल कर उनसे बाहर बैठने को कहते थे। तब यही लगता था कि यह उनके सम्मान में किया जाता था। अब जब अपनी भी उम्र बढ़ गई है तो महसूस होता है कि वह सिर्फ सम्मान की बात नहीं थी। शायद यह बात ताकत से भी जुड़ी थी।

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बहुत सारे घरों में खटिया दरवाजे पर पड़ी रहती है। कोई मिलने आता है और दरवाजे पर कोई नहीं भी है तो वह खटिया पर बैठ या लेट कर आराम करता है। मिलने वाला व्यक्ति आ गया तो अच्छा वरना आराम करने के बाद वह चला जाता है। खटिया हलकी होती है तो उसे बाहर निकालने और भीतर रखने में सुविधा होती है। ऐसी हलकी खटिया को बंसहटा भी कहते हैं। बारिश के महीने में ऐसी खटिया की महत्ता और बढ़ जाती है, क्योंकि गरमी इतनी और ऐसी पड़ती है कि घर में भीतर सोया नहीं जाता और बाहर सोने पर जब बारिश आती है तो बार-बार खटिया को भीतर लेकर भागना पड़ता है। बंसहटा हलकी होने के कारण आसानी से भीतर-बाहर हो जाती है। हिंदी के मशहूर निबंधकार कुबेर नाथ राय हमारे ही गांव उत्तर प्रदेश में गाजीपुर जिले के मतसा के थे। उनके छोटे भाई नागेश्वर प्रसाद राय गरमियों के दिनों में लगभग रोज ही ऐसी बंसहटा सिर पर रखकर अपने बागीचे में जाते थे और दिन भर आम की रखवाली करने के बाद शाम को खटिया साथ लेकर लौटते थे। सिर पर खटिया रखने से गरमी में धूप से भी उनका बचाव हो जाता था। गांव से दूर बने डेरों पर भी यही खटिया रखी जाती है। कोई रहे न रहे, खटिया पड़ी रहती है। उसकी चोरी भी कोई नहीं करता। और जिस चीज की चोरी नहीं होती, उसकी लूट का सवाल ही कहां पैदा होता है! हाल में जनसभा में खटिया को लोग चुरा कर या लूट कर नहीं, दूसरे का माल समझ कर मुफ्त में ले गए हैं। सभा के बाद उनका होता भी क्या…!

छोटे बच्चों के लिए खटोला बनवाया जाता है। यह खटिया से भी हल्का होता है। इसकी ऊंचाई भी कम होती है। अगर बच्चा किसी वजह से खटोले से गिर भी जाए तो उसे ज्यादा चोट नहीं आती। जो लोग बैठ कर ज्यादा देर तक काम करते हैं, डॉक्टर उन्हें ‘हार्ड बेड’ यानी सख्त बिस्तर पर सोने की सलाह देते हैं। इसके उलट गांवों में होता है। गांव में ‘हार्ड बेड’ का मतलब चौकी। चौकी पर कोई सोना पसंद नहीं करता, क्योंकि वह ‘हार्ड बेड’ है और जब उस पर गद्दा नहीं होता तो सोने पर देह अकड़ जाती है। परिवार में जब शादी-ब्याह के दौरान सदस्यों की संख्या बढ़ जाती है तो कभी-कभार दो से ज्यादा लोगों को भी एक ही चौकी पर सोना पड़ता है। अगले दिन वे उसी बात की शिकायत कर रहे होते हैं कि देह अकड़ गई है। जबकि बाध या सुतली से बनी खटिया बहुत आरामदेह होती है। उस पर सोने से न तो देह अकड़ती है और न ही पीठ दर्द की शिकायत होती है। बस एक पतला-सा बिछौना ही उसके लिए पर्याप्त होता है। यों जब मेहमान आते हैं तो इसी खटिया पर तोसक (गद्दा) और चादर बिछा कर तकिया रख दी जाती है। हमारा गांव सड़क के किनारे है। दूसरे गांवों के लोग भी वहां शहर जाने के लिए बस पकड़ने आते हैं। किसी सम्मानित व्यक्ति के आने पर वहीं सड़क के किनारे ही खटिया बिछा दी जाती है, ताकि वह व्यक्ति बस के आने तक वहां इंतजार कर सके। जहां बस रुकती है, वहीं बरगद का एक बड़ा पेड़ है। अच्छी-खासी जगह भी है, जहां गांव की रामलीला का आयोजन होता है।

एक मुहावरा भी है खटिया खड़ी कर देंगे। जब लोग किसी से नाराज होते हैं तो उसे यह धमकी देते हैं। इसका मतलब यह है कि ‘हम तुम्हें तुम्हारी हैसियत बता देंगे।’ खटिया बिछी हुई है तो उस पर आप बैठ सकते हैं और खड़ी कर दी तो आप भी खड़े ही रहेंगे। जब किसी काम को लेकर लोग नेताओं के पास जाते हैं और वह नियम-कानून का बहाना बना कर काम नहीं करता तो लोग कहते हैं- ‘अबकी चुनाव में आना तुम्हारी खटिया खड़ी कर देंगे!’

 

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