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दुनिया मेरे आगे-नेकी और बदी

कुछ दिन पहले की बात है मेरे शहर का एक युवा रात को भोजन के बाद टहलने निकला। निश्चिंत होकर टहलने के मूड में उसने अपना मोबाइल भी घर पर छोड़ दिया था। अभी वह कुछ दूर ही गया था कि पीछे से आते वाहन ने उसे टक्कर मार दी।
Author October 4, 2017 01:18 am
प्रतिकात्मक चित्र।

गिरीश पंकज

क्या मनुष्य समाज निरंतर निर्मम होता चला जाएगा? अपनी आंखों के सामने जब हम सब मरती हुई मानवता के चित्र देखते हैं तब यही सवाल जेहन में उठता है। कुछ दिन पहले की बात है मेरे शहर का एक युवा रात को भोजन के बाद टहलने निकला। निश्चिंत होकर टहलने के मूड में उसने अपना मोबाइल भी घर पर छोड़ दिया था। अभी वह कुछ दूर ही गया था कि पीछे से आते वाहन ने उसे टक्कर मार दी। युवक गाड़ी से टकरा कर कुछ दूर छिटक गया और नीचे गिरा तो उसी गाड़ी के बड़े चक्के के नीचे उसका एक हाथ आकर बुरी तरह कुचल गया। गाड़ी तो भाग ही गई लेकिन तब तक वहां भीड़ जमा हो गई। युवक अपने जख्मी हाथ को दूसरे हाथ से थाम कर किसी तरह खड़ा हुआ और लोगों से अपील की कि उसे अस्पताल तक पहुंचा दो, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। हां, भीड़ में अनेक लोग अपने-अपने मोबाइल से उसकी तस्वीर जरूर खींचते रहे। युवा पत्रकार कुछ दूर तक चलने के बाद बेहोश हो कर सड़क पर ही गिर गया। इस बीच कुछ निर्मम लोग उसका वीडियो ही बनाते रहे। बाद में उसे किसी ने पहचाना तो घर वालों को सूचित किया गया और उसे अस्पताल में भर्ती किया गया। वहां उसका एक हाथ काटना पड़ा। यह तो केवल एक घटना है, ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। हम देखते-सुनते रहते हैं कि घायल लोग पड़े हैं मगर उनकी मदद के लिए आगे आने की बजाय कुछ लोग वीडियो बनाते रहते हैं। यह एक निर्मम मानसिकता इन दिनों विकसित हो रही है। सामने दुखद घटना घट चुकी है और भीड़ घायल या घायलों का वीडियो बना रही है। कुछ तो सेल्फी भी लेने लगते हैं। मैंने देखा एक बार एक युवक एक अरथी को कंधा देते हुए सेल्फी ले रहा था।

क्या हमारी मानवीय संवेदना बुरी तरह मरती जा रही है? हम किसी घायल की मदद करने के बजाय उसकी तस्वीर खींचने में रुचि आखिर क्यों लेने लगते हैं? क्यों भीड़ के मन में कोई दानव सक्रिय हो जाता है? कहीं किसी गड्ढे में लोग गिर जाते हैं तो हम सबने देखा है कि कुछ लोग वीडियो बनाने में भिड़ जाते हैं और हंसते भी हैं। कोई यह नहीं सोचता कि कुछ मदद की जाए। सोशल मीडिया के माध्यम से वीडियो को वायरल कराने के लिए अब गड्ढा या दुर्घटना जरूरी है। यह मनोवृत्ति हो गई है अब। यह अच्छी बात नहीं। दुर्भाग्य ही है कि हम लोग पाखंडी हो गए हैं। दुर्घटना में घायल पड़े व्यक्ति की मदद करने के बजाय उसका पूरा वीडियो बना कर फेसबुक या वाट्सएप पर डालना हमें परपीड़ा में आनंद लेने वाला निर्मम आदमी (यानी सैडिस्ट) बना देता है। लोग पूरी बेशर्मी के साथ यह भी लिखते हैं, ‘देखिए, क्या हो गया है हमारे समाज को। आज एक दुर्घटना में घायल व्यक्ति कराहता रहा, मदद के लिए सबसे गुहार लगाता रहा, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। देखिए, उस वक्त की दिल दहला देने वाली तस्वीर।’ वीडियो बनानेवाला व्यक्ति चाहता तो मदद कर सकता था, लेकिन अगर मदद में भिड़ जाता तो वीडियो कैसे बनाता? तो, यह हो गई है सामाजिक संस्कृति। लोगों की सोच। दुनिया में ऐसे सेल्फीबाज बढ़ते जा रहे हैं। यह हाइटेक समाज का भयावह चेहरा है।

ऐसी ही एक दुर्घटना का मेरा निजी अनुभव है। घायल व्यक्ति को घेर कर कुछ लोग खड़े थे। वीडियो बना रहे थे। मैंने एक से कहा, ‘चलो, इसको अस्पताल ले चलते हैं। किसी ने कहा, ‘अरे, किस लफड़े में पड़ रहे हो?’ लेकिन मुझे लगा कि मदद करनी चाहिए। बाद में देखेंगे कि क्या होता है। मैंने ऐसा ही किया। दो लोगों की मदद से घायल को अस्पताल पहुंचा दिया। उसके घर वालों को सूचित कर दिया। घर वाले आ गए और उसके बाद मैं लौट गया। मुझे किसी ने परेशान नहीं किया। तो ऐसा भी होता है। हिम्मत की जरूरत है और अगर किसी की मदद के एवज में थोड़ी-बहुत परेशानी उठानी भी पड़े, तो उठा लेनी चाहिए क्योंकि यही घटना बाद में आपके जीवन की यादगार घटना बनती है और आत्मसंतोष भी होता है कि आपने मानवता दिखाई।

नेकी करने का भाव लोगों में निरंतर कम होता जा रहा है। जेब में पैसे होने के बावजूद लोग जरूरतमंद की सहायता नहीं करते। यही सोचते हैं कि वह ठग रहा है। लेकिन हमें कभी-कभी ठगाने का सुख भी ले लेना चाहिए। हमारे एक आदरणीय अक्सर ऐसा करते रहे हैं। उनकी संगत में कभी-कभी हम भी ठगाए जाने का सुख लेते रहते हैं। कोई गरीब व्यक्ति सामने आकर हाथ फैला कर कहता है, ‘भूख लगी है। कुछ पैसे दे दीजिए। मैं अक्सर दस-बीस रुपए दे देता हूं। आसपास खड़े लोग कहते हैं, ‘अरे भाई साहेब, मांगना तो इनका धंधा है। बेकार ही दे दिया आपने।’ यह बात भी सही है कि कुछ लोगों का धंधा ही है भीख मांगना। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सचमुच भूखे होते हैं।

 

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