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दुनिया मेरे आगे-सिमटती संवेदनाएं

संकीर्ण धार्मिकता और राजनीति के दो औजार हैं जो सामाजिक रिश्तों के तानेबाने को गुंथा हुआ नहीं रहने देते। वक्त के साथ इन औजारों को और भी धारदार किया जा रहा है। गुजरात के दंगे, बाबरी मस्जिद-विध्वंस और हाशिमपुरा जैसी त्रासदियां, जो इंसानियत को लहूलुहान करती हैं।

प्रतीकात्मक चित्र।

 शोभना विज

आज के माहौल को देखती हूं तो लगभग तेईस बरस पहले का एक प्यारा-सा दृश्य मेरी आंखों के आगे घूमने लगता है। उस सर्द रात का नजारा यों भी गोल-गोल घूमने का था। ढोल की थाप पर एक मस्ती से भरा सीधा-सादा समूह-नृत्य चल रहा था, चार-पांच फुट ऊंची, धधकती हुई अग्नि के इर्दगिर्द। हम दस-बारह, कुछ युवा और कुछ अधेड़ हुए लोग ‘लोहड़ी’ मना रहे थे। आजकल की तरह ‘डीजे’ जैसा तेज आवाज वाला शोर-शराबा उन दिनों नहीं होता था। लोहड़ी पौष-माघ के मिलन-बिंदु का एक पर्व है जो इक्यावन बरस पहले तक पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश वाले वृहत्तर पंजाब में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। आज भी इस पूरे क्षेत्र में लोहड़ी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कई दिन पहले से ताजा गुड़ की गंध के साथ अपने आने की मीठी-मीठी आहट देने वाले इस पर्व के बारे में यों तो बहुत कुछ कहा जा सकता है। पिछले कुछ समय से इसके लोक-सांस्कृतिक पक्ष को लेकर बहुत कुछ लिखा भी जा चुका है। लेकिन यहां मेरी बात के संदर्भ थोड़े अलग हैं। बात उन दिनों की है जब पंजाब में दो दशक से भी लंबा चला धार्मिक आतंकवाद का दौर थमा ही था। मैं एक सिख परिवार के मकान में किराएदार के रूप में रहती थी। वह काफी बड़ा दुमंजिला मकान था। मकान के ऊपरी हिस्से में एक और किराएदार महीना भर पहले ही आए थे। नए किराएदार मुसलिम थे। मकान मालिक के आंगन में लोहड़ी मनाई जा रही थी। हिंदू होने के नाते मैं तो इस खुशी में शामिल थी ही, पर यह देख कर हमारी खुशी की सीमा न रही जब अचानक ऊपर से नए मुसलिम परिवार के सभी सदस्य एक-एक करके नीचे उतर आए और फिर खुल कर उस अग्नि-पर्व में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे।

एक दिलचस्प संयोग यह हुआ कि ढोल की आवाज सुन कर पड़ोस वाले घर के ईसाई किराएदार भी हंसते हुए सबके बीच पहुंच गए और अग्नि के इर्दगिर्द चल रहीं थिरकनों में रंग भरने लगे। इस तरह वह लोहड़ी का त्योहार भाईचारे की एक अनोखी मिसाल बन गया था। सामूहिक गीत-नृत्य वाली लोहड़ी की उस रात को मैं कभी भूल नहीं पाई। उसके बाद वैसी लोहड़ी फिर कभी नहीं आई। हम तीन तो किराएदार परिवार थे। मैंने तो नजदीक ही एक छोटा-सा मकान बनवा लिया था। बाकी दोनों जाने कहां चलते बने और साथ ही वह लोहड़ी भी कहीं गुम हो गई।आज सोचती हूं कि त्योहार की खुशी तो वह थी ही, लेकिन उससे कहीं बड़ा सुख था अलग-अलग मजहब के लोगों में साझेपन का एक अहसास। अब समाज में अक्सर ऐसा नहीं होता। आपस में जुड़ना भी चाहें, तो भी ऐसे प्रयास आमतौर पर सफल नहीं हो पाते। संकीर्ण धार्मिकता और राजनीति के दो औजार हैं जो सामाजिक रिश्तों के तानेबाने को गुंथा हुआ नहीं रहने देते। वक्त के साथ इन औजारों को और भी धारदार किया जा रहा है। इन सबका नतीजा हम देख ही रहे हैं। जब भी ये दोनों अपने मूल लक्ष्य से हट कर परस्पर हाथ मिलाने लगते हैं, तभी घटते हैं गुजरात के दंगे, बाबरी मस्जिद-विध्वंस और हाशिमपुरा जैसी त्रासदियां, जो इंसानियत को लहूलुहान करती हैं।

समाज में धार्मिक वृत्ति के लोग पहले भी होते थे। संख्या में आज शायद पहले से भी ज्यादा हैं। पहले जहां लोग एक सहज भाव से अपने धर्म की सीखी-सिखाई बातों के अनुसार जीवन जीते थे, वहां आज उस सादगी और सहजता का स्थान दिखावे ने ले लिया है। लोगों ने पता नहीं कहां से संचालित होते हुए अपने-अपने दड़बे बना लिए हैं। आज की धार्मिकता को क्या कहा जाए! यह अब एक चकाचौंध है, एक आधुनिकता है, एक प्रतियोगिता है और एक राजनीति। अजीब बात यह कि धार्मिकता का यह रूप अल्पशिक्षित ग्राम्य समाज की अपेक्षा शहरों के शिक्षित-विकसित समाज की सोच में अधिक घुल चुका है। भीड़ जुटा कर, धार्मिक वर्दियां पहन कर, शोर मचा कर, जयकारे लगा कर, और भी न जाने कैसे-कैसे तरीके अपना कर लोग यहां अपनी एक अलग पहचान बनाने में जुटे हैं।ऐसा करके हम एक राष्ट्र के नागरिक आखिर किसे और क्या संदेश देना चाहते हैं? यह कैसी विरासत है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंपने जा रहे हैं! क्या हम नहीं चाहते कि हमारे किशोर और नौजवान एक स्वस्थ और उन्मुक्त वातावरण में जी सकें? अगर इसी संकीर्ण धार्मिकता का फैलाव करते रहेंगे तो सांझे सामाजिक मूल्यों के लिए कोई जगह ही नहीं बचेगी। राह चलते जब भी कभी मेरी आंखें मंदिरों-गुरद्वारों की भव्य संगमरमरी इमारतों को देख कर चौंधियाने लगती है तो छोटे-छोटे सरकारी स्कूलों की बदहाली की कल्पनाओं में डूबने लगती हूं।

 

 

 

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