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दुनिया मेरे आगे- प्रकृति के लिए

आज हालत यह है कि पर्यावरण का स्वास्थ्य दिनोंदिन हमारी लापरवाही और स्वार्थी सोच के कारण बिगड़ता जा रहा है।

Author October 25, 2017 1:47 AM
पृथ्वी।

देवेंद्रराज सुथार 

मानव जीवन के निर्माण में पंचतत्त्व जल, वायु, आकाश, पृथ्वी और अग्नि की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब तक इन पांच तत्त्वों का समन्वय, संतुलन और संगठन निर्धारित परिमाण में संयोजित रहता है तो हम कहते हैं कि पर्यावरण सही है और जब इनके मध्य तालमेल बिगड़ने लगता है तो हम कहते हैं कि पर्यावरण दूषित हो रहा है। प्रकृति और मानव आदिकाल से ही परस्पर निर्भर रहे हैं। हमारी सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ और हमने प्रकृति प्रदत्त वृक्षों के फलों को आहार और सूखी लकड़ियों का र्इंधन के रूप में उपयोग करके अपना जीवन विकसित किया। आज हालत यह है कि पर्यावरण का स्वास्थ्य दिनोंदिन हमारी लापरवाही और स्वार्थी सोच के कारण बिगड़ता जा रहा है। जिस प्रकृति के तत्त्वों की वैदिक वांग्मय से लेकर तमाम पौराणिक ग्रंथों में स्तुति और उपासना की गई है, वही प्रकृति आज कराह रही है। मेडिकल जर्नल ‘लेंसेट’ की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2015 में प्रदूषण की वजह से दुनिया भर में नब्बे लाख लोगों की मौत हुई। इसमें पच्चीस लाख भारत के थे। दूसरी ओर आतंकवाद की वजह से पूरी दुनिया में साल 2015 में 28,328 लोगों की मौत हो गई। अकेले भारत में आतंकवाद की वजह से 2015 में 722 लोगों की जान चली गई। पर्यावरण प्रदूषण के कारण होने वाली मौतोें का यह आंकड़ा भयावह है। कहने का आशय यह है कि प्रदूषण आज के दौर में कहीं बड़ा हत्यारा साबित हो रहा है। आश्चर्यजनक है कि दुनिया में प्रदूषण से होने वाली मौत के मामले में भारत पहले नंबर पर हैं। प्रदूषण की वजह से दुनिया को हर साल 293 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है, जो विश्व की अर्थव्यवस्था का 6.2 फीसद होता है।
हाल की रिपोर्ट हमारे पर्यावरण और प्रकृति प्रेमी होने के दावे को झूठा साबित कर देती है। प्राणवायु में जहर घुलता जा रहा है। पानी की निर्मलता पर संकट के बादल मंडरा रहे है। गंगा और यमुना जैसी नदियां अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं। वर्षा का क्रम बिगड़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ओजोन परत का क्षय हमारे समक्ष चुनौती बन रहा है। बेशक प्रकृति सर्वोत्तम और शक्तिशाली है। इसके साथ मित्रता का रिश्ता रख कर ही जिया जा सकता है। लेकिन हमारी मिथ्यावादी सोच और हठधर्मिता ने प्रकृति को अपनी दासी बनाने की जब-जब कोशिश की तब-तब क्षति हमारी ही हुई है। प्रकृति के विशालकाय रूप के समक्ष मानव का कद बौना था और बौना है। यह हमें समझना होगा। पर्यावरण के इशारों पर चलने में ही मानव की बुद्धिमत्ता है। आखिर बिगड़ते पर्यावरण का समाधान क्या है? क्या जरूरत इस बात की नहीं है कि हमें पर्यावरण की प्रदूषित होती स्थिति के लिए सर्वप्रथम अपनी दकियानूसी मानसिकता को बदलना होगा। क्या पर्यावरण के प्रति हमें अब सचेत और हद से ज्यादा जागरूक होने की आवश्यकता जान नहीं पड़ती ? निरंतर कटते जंगल पृथ्वी के लिए अमंगलकारी हो रहे हैं। बिना वृक्ष के जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है!

हमें समझना होगा कि पर्यावरण प्रदूषण एक अहम समस्या है। इसे मिटाने के लिए सबको प्रयास करने होंगे। केवल दंड संहिता और कठोर कानून से ही सुधार संभव नहीं। प्रधानमंत्री ने भी ‘मन की बात’ के बीसवें संस्करण में वर्तमान जल समस्या के लिए जन भागीदारी का आह्वान किया था। प्रकृति का प्रत्येक कार्य व्यवस्थित और स्वचालित है। अपने अविवेक के कारण मनुष्य ही अपने आपको प्रकृति का अधिष्ठाता मानने की भूल करने लगा जिससे प्रकृति के कार्यों में बाधाएं उत्पन्न होने लगीं। म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट (नगरीय ठोस अपशिष्ट) कानून में भी कठोर दंड के प्रावधान के बावजूद महानगरों में गंदे कचरों के पहाड़ उग रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रित किया जा सके ,इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं दिखाई पड़ता। प्रदूषणों के लिए हमारी नीति से ज्यादा नीयत जिम्मेदार रही है। नीति की बातें सभी ने की हैं लेकिन व्यवहार में किसी ने नहीं उतारा। रूसो का कथन है कि हमें आदत न डालने की आदत डालनी चाहिए। रूसो ने भी प्रकृति की ओर लौटने का आह्वान आज से तीन सौ साल पहले किया था। पर्यावरण संरक्षण के लिए देश में दो सौ से भी ज्यादा कानून हैं। यह एक कानूनी मुद्दा अवश्य है लेकिन इसे सर्वाधिक रूप से शुद्ध और संरक्षित रखने के लिए समाज के सभी अंगों के मध्य समझ और सामंजस्य स्थापित करना जरूरी है। इसके लिए सामाजिक जागरूकता की जरूरत है ताकि सुंदर परिवार के साथ-साथ सुंदर पर्यावरण बन सके। अगर हमने अब भी प्रकृति के बारे में सकारात्मक ढंग से सोचना नहीं शुरू किया तो एक तो वैसे ही देर हो चुकी है, कहीं और देर न हो जाए।

 

 

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