ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे- पर्दे पर बहता मौसम

पिछले कुछ वर्षों में असम में ही बनी कुछ फिल्में देखी हैं जो असम में रहते हुए भी इस नम असमिया रंग को पकड़ने में नाकाम रहीं।

Author Published on: June 22, 2017 6:12 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

निधि सक्सेना

नन्हे-नन्हे पौधे खड़े हैं घर की देहरी पर, रोपे जाने के इंतजार में! भीनी-भीनी हवा उनकी पत्तियों को छू कर कंपा दे रही है! ‘डेज आॅफ आॅटम’ का देखना क्या था, जैसे एक चिट्ठी मिली हो दूर से, जिसमें कुछ आबो-हवा भेजी है, नन्हा-सा एक बादल भेजा है! बरसेगा! इस फिल्म को देखते हुए मैं उस फिजां में घुली जाती हूं, जहां से यह आई है। वह झोंका गया तो खुशबू भी ले गया, लेकिन उसके होने का, उसमें होने का वह कुछ पल का महसूस करना मुझ पर बाकी है। फिल्म के रंग में असम की रोशनी तारी है, हर चीज उस नम रोशनी में भीगी दिखती है। दीवारों पर सीलन चढ़ आई है। उजाले में बादल के साये की मिलावट है, रंग आसमान का हो या जंगल का या इंसान का- जगह के हिसाब से बदल जाता है। खिड़की से दिखता हरा असम का हरा है! तीखा नहीं, सुहाना हरा, ओस से छना। इसका ये जर्द रंग ही है जो इस मौसम को इस कदर असरदार बना पाया। यह रंग इस कदर असमिया न होता तो मिट्टी और बांस की वह दीवार, मच्छरदानी, ऊंचा पलंग, बांस का सोफा या साड़ी की सिकुड़न।

सारा समान जो असम की याद दिलाता है, वह भी इस फिल्म को इस कदर असिमया न बना पाता। पिछले कुछ वर्षों में असम में ही बनी कुछ फिल्में देखी हैं जो असम में रहते हुए भी इस नम असमिया रंग को पकड़ने में नाकाम रहीं। ‘डेज आॅफ आॅटम’ की यह एक बड़ी कामयाबी है कि स्टूडियो में भी वे रंग बना दिए। इस अनुभव के अलावा फिल्म का होना क्या है? कभी सिर पर चढ़ जाने वाली धुन, कभी अतीत की लंबी यात्रा। क्या कोई फिल्म एक पूरा मौसम हो सकती है? ‘डेज आॅफ आॅटम’ देखते हुए मैं शरद की हवाएं सूंघ सकती थी। मेरे जीने में यह फिल्म शामिल नहीं हो रही थी, बल्कि मेरा जीना असम की उस फिजां में जा मिला था। जरूरी नहीं कि नाम में शरद हो तो पतझड़ महसूस भी हो जाए। लेकिन हेमंत का अहसास मैं भूल नहीं सकती, अलसाई- उनींदी दोपहरें।

मैंने दो साल असम में बिताए हैं और मैं कटहल खाते पिता की छवि के पीछे की हलचल तुरंत पहचान गई। दूसरी जगहों में जो आवाजें रात के सन्नाटे में सुनाई देती हैं, वे असम की शांति को कभी चुप्पी में नहीं बदलने देतीं। छोटी-छोटी चिड़िया, परिंदे, झिंगुर, असम के बदनाम मच्छर और भी न जाने कौन-कौन से अनाम दोस्त, जिनकी बातों से असम की हवाएं रात-दिन गूंजती रहती हैं। सब इस फिल्म की आवाजों में गुनगुना रहे थे। जानती नहीं कि क्या सच में असम ही जाकर ध्वनि रिकॉर्ड की होगी या वहां से बस इन आवाजों की याद उठा लाए। बहरहाल, कीड़े-मकोड़ों की ये अनवरत आवाजें असम के माहौल को और गहन कर देती हैं। उन्होंने इस फिल्म को भी वैसे ही घनीभूत कर दिया। कितने ही दृश्यों का ताना-बाना ऐसा है कि शुष्कता है। लेकिन तभी उसमें कोई बूंदें ढूंढ़ लेता है, जैसे स्वेटर न खरीदने पर चाय, जैसे उनींदी कक्षा में हवा। इसमें जो दो मानुष हैं- प्यारी मां और अपने में खोए से पिता, उनमें भी उस मौसम की नमी दिखती है। कोई इतनी सहजता से असहमति में भी ऐसा शालीन कैसे हो जाता है! शायद ये आर्द्रता मौसम से इन दो इंसानों में भी चली आई है और इनके दिल भीग कर कुछ और नरम हो गए हैं।

मैं इस दंपति की तरह वृद्ध होना चाहूंगी। सह-जीवन और बीच का वह अलहदा आसमान ठीक बुना हुआ है, न तनाव न ढील। दुनिया की सारी दुकानदािरयों और झंझटों के जहान के बीच एक सादा-सा दिन, सरल-सी जिंदगी। जिंदगी ने इस दिन के सब पेचोखम निकाल दिए हैं। सपनों और जिंदगी के बीच जैसे किसी सही पायदान पर खड़े, दोनों में से कुछ भी छूटने नहीं देंगे क उदासी भी है, अनुपस्थिति की उदासी, अकेली दोपहर की। घर में दो किरदार दिखते हैं, लेकिन हैं तीन। एक बेटा जो नामौजूद है, उसकी अनुपस्थिति बार-बार दिखती है। उसका न होना सबसे ज्यादा उस फोन कॉल में खल रहा है, जहां मां को उसकी आवाज ठीक से नहीं आ पा रही, वह सफर में है। घर में उसका होना मौजूद है, दूर से आती किसी आवाज की तरह।

जिंदगी की हर रोज की उन बातों का गुच्छा है ये फिल्म जो सर्वसुख हैं। इतने बारीक क्षण जिन्हें शायद हम अपनी स्मृित में दर्ज तक नहीं रखते- पिता की जम्हाई, मां की शुष्क कलाइयां मलना, पीठ की खुजली, टीवी देखती आई एक मुस्कान, पतझड़ में सावन की पहली फुहार, घर की बिल्ली, स्वेटर के रंग। हर बड़ी, जटिल, उलझी बात का जवाब है यह सरलता। और यह विश्वास दिलवाती है कि सुगम-सुखद बातें भी कलात्मक होती हैं। मुकुल होलोई की इस फिल्म की अवधि मात्र तेरह मिनट है। लेकिन अपनी बात और अपना अहसास छोड़ने के लिए ये कुछ मिनट बहुत हैं। फिर कलाकृति की खूबी का अंदाजा कैनवास के आकार से नहीं लगाया जाता। सिनेमा इस वक्त का साहित्य है। ‘डेज आॅफ औटम’ इस साहित्य में कविता की जगह रखती है। यह एक उम्मीद देती है कि जल्दी बोझिल, क्रूर, भद्दी लंबी फिल्मों की अपेक्षा ऐसी कविताओं और उपन्यासों का जमाना आएगा।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे- अधिकार का भ्रम
2 दुनिया मेरे आगे- वृद्धाश्रम में मां
3 दुनिया मेरे आगेः कुंठा का कारोबार