ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे- रिमझिम के तराने

बाहर रिमझिम बरसात के साथ मैं मन में उठती अपनी तमाम उमंगों को बस्ते में लपेट कर बैठने पर मजबूर था।
Author July 28, 2017 05:18 am
प्रतीकात्मक चित्र।

ओम वर्मा

बाहर रिमझिम बरसात के साथ मैं मन में उठती अपनी तमाम उमंगों को बस्ते में लपेट कर बैठने पर मजबूर था। आज से पचास वर्ष पहले मेरी उम्र के शुरुआती बारह वर्ष बिना सड़क और बिजली के देवास जिले के दो गांव- नागदा और आगरोद में बीते। उन दिनों गांवों में अच्छे दिनों का मतलब समय पर पर्याप्त वर्षा हो जाना भर ही था। सही समय पर होने वाली बारिश और गिरने वाले मावठे को किसान तब भी अमृत-वर्षा मानते थे और आज भी मानते हैं। गिरते पानी में बाहर जाकर सिर्फ ज्वार-मक्का की धानी और घोटा लगवा कर चने सिंकवाने का चलन था, जिसे घर के बच्चे-बूढ़े सभी बड़े शौक से खाते थे। तब कहीं भी आते-जाते समय रेनकोट पहनने या छतरी लगाने का रिवाज नहीं था। गांव में सभी किसान थे और खेती सिर्फ वर्षा पर निर्भर करती है, इसलिए वे इस मिथ्या-बोध से ग्रस्त रहते थे कि छतरी से पानी को ‘टोक’ लग जाती है। गांव के टीन शेड के मकान पर जब बूंदों की टपटप शुरू होती थी तो ऐसा लगता था, मानो कोई उस्ताद अपना तबला मिला रहा है। बारिश फिर जब आलाप लेकर विलंबित से होती हुई द्रुत लय में आती थी तो ऐसा लगता था जैसे अल्लारक्खा खां और जाकिर हुसैन में अपने-अपने कायदे-पलटे बजाने की ‘लड़ंत’ हो रही है। घर से बाहर आकर देखने, बल्कि सुनने पर यही द्रुत लय रविशंकर के सितार से अनुनाद करती प्रतीत होती थी। सावन के महीने में तब गांवों में चाहे मूसलाधार बारिश हो या प्रचंड वेग से चलने वाली पवन, दोनों की ध्वनियों में ‘सोर’ की अनुगूंज होती थी, ‘शोर’ की नहीं!

यों उन दिनों गांवों में अधिकतर घरों की छतों पर नलीदार कवेलू होते थे। बारिश के पहले कवेलू ‘फेरने’ का काम करवाना पड़ता था, जिसमें कुछ ‘दाड़कियों’ को महारत हासिल होती थी। जो कवेलू फिरवाने में चूक जाते, उन्हें बारिश के दौरान घर में दो-चार जगह फर्श पर ऊपर से गिरने वाली बूंदों को सहेजने का इंतजाम करना पड़ता था। ‘बूंद बूंद से घट भरे’ वाली कहावत शायद यहीं से जन्मी है। वैसे सत्ता और राज के तंत्र में ‘लीकेज’ होना कोई नई बात नहीं है। प्रजातंत्र में ‘कवेलू फेरने वाले’ पहले आपका विश्वास प्राप्त कर लेते हैं, फिर या तो आपसे आंखें फेर लेते हैं या व्यवस्था में पहले से बड़ी गड़बड़ी छोड़ जाते हैं।
जुलाई में ही स्कूल खुलते थे और इसी महीने में कई बार कभी रिमझिम-रिमझिम तो कभी ‘केट्स एंड डॉग’ उक्ति को सार्थक करती मूसलाधार बारिश हो जाती थी। घर से स्कूल तक के रास्ते में दो-तीन पोखर और एक बरसाती नाला पड़ता था। बहता पानी दिखे और उसमें कोई बच्चा कॉपी का पन्ना फाड़ कर नाव बना कर न तैराए तो उसे ‘बाहर’ मान लिया जाता था। मुझे याद है कि नाव तैराने की ऐसी ही एक प्रतियोगिता में जब मेरी छियानबे पृष्ठों की एक कॉपी अड़तालीस पर सिमट गई तो शिक्षक पिता ने मेरे सारे मानवाधिकारों की भोंगली बना दी थी। फिर उन्होंने हर कॉपी के बीच के पन्नों पर अपने आॅटोग्राफ दे दिए, ताकि मैं पन्ने न फाड़ सकूं। फिर जब बरखा रानी ने अगली दस्तक दी तो नौकायन प्रतियोगिता में बालसखा अनोखीलाल काम आया। उससे ज्ञान मिला कि एक ही कॉपी के बजाय अलग-अलग कॉपी से पन्ने फाड़ने चाहिए। यानी चोरी करो तो सबूत मत छोड़ो। शुक्र है कि इस कला को जीवन में बाद में अपनाने की जरूरत नहीं पड़ी!

पहली बारिश हो और बच्चे उसमें न नहाएं तो फिर वे बच्चे ही क्या! वही शौक मेरा शहर में आकर भी रहा। देवास में छत्तीस साल की नौकरी के दौरान शाम को लौटते समय अगर बारिश मिलती तो कई बार घर भीगता हुआ ही आया हूं। ऐसे में स्वाभाविक है कि घर पर इंतजार कर रही एक जोड़ी आंखें कुछ और बड़ी हो जाती थीं, जिनमें बिना पूछे यह निजी सवाल होता था कि ‘रेनकोट साथ होते हुए गीले होकर क्यों आ रहे हो?’ पिताजी जीवन की अठासी बरसातें काट चुके हैं। आधा-पौन घंटा बारिश हो तो वे कभी बाहर गिरते पानी को और कभी नजर घुमा कर रसोईघर में झांक लेते हैं। उनका यह विश्वास है कि ऐसा पानी गिरे तो बेसन के भजिए जरूर खाए जाएं। मुझे मेरी बिटिया याद आने लगती है जो ऐसी तेज बरसात में आंगन में लगे छत के पाइप के नीचे खड़ी होकर कई बार बरखा रानी को जम के बरसने का आह्वान करने लगती थी।

अब सैम अंकल के देश में उसके बरसते पानी में निकलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। कुछ दिन पहले मैं बरामदे में बैठा था और बारिश को सिर्फ देख रहा था, फुहारों को महसूस कर रहा था। अब उम्र और सेहत इजाजत नहीं देती कि भीगने का जोखिम उठा सकूं। इसलिए हे बरखा रानी! तुम बरसती रहना और मुझे क्षमा कर देना!

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.