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दुनिया मेरे आगे: प्रतिभा की जगह

कई तरह की कठिनाइयों और साधनों के अभाव के बावजूद कई सालों तक छात्र-छात्राओं के बीच खेल के प्रति उत्साह बढ़ाने और उनके भीतर रुचि जगाने का यह हासिल था। कविता का लेख।

Author September 20, 2016 11:33 PM
रियो ओलंपिक से लेकर हाल ही में खत्म हुए टैस्ट सिरीज़ तक भारत ने कई खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। देश ने भी अपने राष्ट्रीय हीरो को वो सम्मान दिया जिसके वो हकदार थे। बैंडमिंटन में पीवी सिंधु हों या फिर करुण नायर सभी ने अपने खेल से देश के नाम को गौरवान्वित करने के काम किया। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों के बारे में जो साल 2016 में सितारे बनकर उभरे… (तस्वीर में पीवी सिंधू, साक्षी मलिक और दीपा करमाकर।

कविता

हाल ही में ओलंपिक में भाग लेने वाली भारतीय जिमनास्ट दीपा कर्मकार और धावक ओपी जइशा के शुरुआती अभाव के जीवन से जुड़ी खबरें पढ़ीं तो मुझे अपने बचपन के दिन बरबस याद आ गए। मेरे पिताजी एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। वे न सिर्फ स्कूल के विद्यार्थियों की टीम बना कर खेल प्रतियोगिता करवाते थे, बल्कि गांवों और कस्बों के होनहार और प्रतिभावान बच्चों को ढंूढ़ते थे, उनका दाखिला कराते थे और फिर प्रशिक्षण देकर उन्हें खेल प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करते थे। गांवों के लोगों को शुरू में लगता था कि ये स्कूल टीचर हमारे बच्चों का भविष्य खराब कर रहा है और उन्हें पढ़ाई से ज्यादा खेल के लिए प्रोत्साहित कर रहा है! कुछ लोग तो आसानी से मान जाते थे, लेकिन कुछ लोग इसे अच्छा नहीं समझते थे। खासतौर पर लड़कियों के माता-पिता अपनी बेटियों को खेल प्रतियोगिता से दूर रहने की हिदायत देते थे।

इन टीमों को न तो कोई प्रोत्साहन मिलता था और न कोई आर्थिक मदद। सरकार की योजनाएं तो थीं, लेकिन केवल कागजों पर। लेकिन पिताजी लोगों से चंदा मांग कर और मदद लेकर खेल के ड्रेस से लेकर उपकरण तक हर जरूरी सामान तैयार करवाते थे और छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षित करके उन्हें प्रखंड, तहसील, जिले, मंडल और राज्य स्तर पर होने वाले खेलों के आयोजन में हिस्सा दिलवाते थे। जब प्रतियोगिता मंडल और राज्य स्तर पर होती थी तो टीमों को खेल आयोजन में ले जाने में काफी दिक्कतों का सामना करना होता था। कहीं से कोई सहयोग न मिलने के कारण टीमों को एक या दो गाड़ियों में सामान के साथ लगभग लाद कर ले जाया जाता था। कई छात्र-छात्राओं के माता-पिता, खासकर लड़कियों के माता-पिता इतनी दूर दस-पंद्रह दिनों के लिए बच्चों को भेजने से डरते थे। लेकिन ईमानदारी से भरोसा पैदा होता है। इन खेलों में शामिल होते थे दौड़, कबड्डी, कुश्ती, भाला-फेंक, ऊंची कूद, खो-खो जैसे अनगिनत खेल। भारतीय व्यायाम और विशेष प्रदर्शन में लड़कियों की टीम दो बार उत्तर प्रदेश की चैंपियन बनी। धीरे-धीरे हर खेल में लड़के-लड़कियों की वह टीम पहले और दूसरे स्थान पर आने लगी।

काफी तेजी से एक सकारात्मक बदलाव होने लगा। गांव और आसपास के लोग भी खुश होने लगे। कई तरह की कठिनाइयों और साधनों के अभाव के बावजूद कई सालों तक छात्र-छात्राओं के बीच खेल के प्रति उत्साह बढ़ाने और उनके भीतर रुचि जगाने का यह हासिल था। सरकारी मदद की कमी और अधिकारियों की उदासीनता के बावजूद यह काम चल रहा था। लेकिन बढ़ते आर्थिक बोझ, मदद की कमी और अधिकारियों उपेक्षा का असर पड़ना ही था। रिटायरमेंट के करीब आते-आते पिताजी लगभग निष्क्रिय हो गए। उसके कुछ समय बाद से मैंने अपने आसपास स्कूलों में किसी भी तरह की खेल गतिविधि नहीं देखी और न ही इस तरह की खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने की खबर सुनी।

यह कहानी सिर्फ हमारे गांव की नहीं, बल्कि हमारे देश के उन तमाम गांवों और कस्बों की है, जहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है। बस उन्हें राह देने वाले लोग नहीं हैं। आखिर हर प्राथमिक विद्यालय में खेलों के लिए कोष क्यों नहीं हैं, जिससे गांवों की प्रतिभाओं के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की जमीन तैयार हो। गांवों के बच्चों की पहुंच सरकारी स्कूलों तक ही सीमित रह जाती है। वे किसी प्रशिक्षण केंद्र तक नही पहुंच पाते। अगर हमें अपने देश में खेलों को प्रोत्साहित करना है तो जमीनी स्तर पर शुरुआत करने की जरूरत है। हमें गांवों और कस्बों के स्कूलों से प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान करके उन्हें प्रशिक्षण के लिए भेजने का जिम्मा लेना होगा। हमारे देश में एथलीटों और एथलेटिक्स पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। जब हमारे देश के खिलाड़ी अपने दम पर ओलंपिक जैसे अंतरराष्ट्रीय खेल का हिस्सा बनते हैं तो सबको उनसे उम्मीद होती है कि वे पदक लेकर लौटें। यह उम्मीद होनी भी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्यों हम इन खिलाड़ियों को खेल के लिए माहौल, सुविधा और प्रोत्साहन नहीं देते, जबकि जीतने के बाद रजवाड़ों की तर्ज पर इनाम लुटाते फिरते हैं।

कर्णम मल्लेश्वरी सन 2000 में ओलंपिक पदक लाने वाली पहली महिला बनीं। लेकिन महिलाओं द्वारा अगला पदक लाने में बारह साल लगे, जब 2012 में मैरी कॉम और साइना नेहवाल ने लंदन ओलंपिक में देश को पदक दिलाया। रियो ओलंपिक 2016 में साक्षी मालिक और पीवी सिंधु ने देश को पदक दिला कर यह साबित कर दिया कि भारत की बेटियों में वह क्षमता है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खेल का न सिर्फ हिस्सा बन सकती हैं, बल्कि पदक दिला कर देश को सम्मानित कर सकती हैं। अब अगर हमें ऐसे पदक और सम्मान चाहिए तो अपने देश में खेल और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। मेरे बचपन के दिनों के गांव की तरह खेलों की अलख अगर जगे और उसे सरकार और अधिकारियों से सहयोग या समर्थन मिले तो वह जज्बा, जोश और जुनून कभी कमजोर न पड़े।

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