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दुनिया मेरे आगेः जिजीविषा की डोर

देश के पूर्वोत्तर से आई दो खबरों ने सोचने के दो सिरे पर संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। एक की जिजीविषा खत्म हो गई तो दूसरे ने इसे अपने भीतर खत्म नहीं होने दिया।

Author August 13, 2016 2:39 AM
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प्रतिभा राय

देश के पूर्वोत्तर से आई दो खबरों ने सोचने के दो सिरे पर संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। एक की जिजीविषा खत्म हो गई तो दूसरे ने इसे अपने भीतर खत्म नहीं होने दिया। कलिखो पुल संघर्ष की स्थिति में पैदा हुए, पले-बढ़े, मरने तक संघर्ष करते रहे और आखिरकार संघर्ष से ही हार गए। वे पल-पल मरते हुए जिंदा रहने की कोशिश में जुटे रहे, एक हद तक सफल भी हुए, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बने। कलिखो की मरने से पहले तक की जीवन यात्रा किसी भी निराश या हताश इंसान के लिए जिंदगी में कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देती है। बचपन में जिनके सिर से मां-बाप का साया उठ गया हो, चाची के साथ पले-बढ़े।

जंगल से लकड़ी काट कर लाते तो एक वक्त का खाना मिलता। फिर बढ़ई का काम सीखा। पढ़ने की ललक थी, इसलिए रात्रि पाठशाला में पहली कक्षा में दाखिला लिया। वह भी बारह साल की उम्र में। लेकिन लगन और इच्छा इस कदर थी कि अपने काम के साथ पढ़ाई भी पूरी की। चौकीदारी करने से लेकर पान तक बेचा। भवन निर्माण करवाने का काम किया। किसी तरह खुद का घर बनाया, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। अर्थशास्त्र से लेकर कानून तक की पढ़ाई कर डाली। कलिखो के मुताबिक युवावस्था में बीमार पड़ने पर रिश्तेदारों से मदद मांगने पर किसी ने दो रुपए तो किसी पांच रुपए दिए। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और हालात से लड़ते रहे। राजनीति में उतरे तो पांच बार विधानसभा चुनाव जीते। जिस प्रदेश में खाने को मोहताज थे वहीं के मुख्यमंत्री तक बने।

यह कहानी बताना इसलिए जरूरी लगा कि छोटी उम्र में ही अनाथ हो गए एक बच्चे का मुख्यमंत्री पद तक का सफर आसान नहीं रहा होगा। सब कुछ हासिल किया अपने हौसले की बदौलत। तो ऐसा क्या था जिसने एक ऊर्जा से भरे इंसान को फांसी लगाने पर मजबूर कर दिया। दूसरी ओर, इरोम शर्मिला हैं जिन्होंने सेना को विशेषाधिकार देने वाले विवादित अफस्पा कानून के विरोध में खाना-पीना भी छोड़ दिया। पिछले सोलह साल के संघर्ष में वे कई बार मौत के मुंह तक गर्इं। किसी तरह उन्हें जिंदा खा गया। उम्र के इस पड़ाव पर जब सब कुछ खत्म होने जैसा लग रहा था, एक बार फिर वे अपना जीवन संघर्ष के नाम कर चुकी थीं। आज इरोम जीना चाहती हैं। शादी करने की इच्छा है और अब वे चुनाव लड़ कर एक नई इबारत लिखना चाहती हैं।

इन दोनों ही मामलों को ध्यान से देखने-परखने की जरूरत है। हालात के मद्देनजर इरोम के जीवन में बहार लाने का काम ‘प्रेम’ ने किया। प्रेम की उत्कंठ चाह ने उन्हें जीने की राह दिखाई। लेकिन कलिखो के पास अगर जीने की कोई वजह ही नहीं बची, तो इसके पीछे क्या रहा होगा! इरोम के पास पहली बार 2009 में डेसमंड नामक अनजान इंसान का पत्र आया। पत्र ने इरोम की लगभग नींद में जा चुकी कोमल भावनाओं को जगाने का काम किया। फिर डेसमंड ने इरोम के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। लंबे संघर्ष और इस प्रेम के साथ इरोम ने समझ लिया कि राजनीति में रह कर ही वे अपनी बात मनवा सकती हैं या बेहतर लड़ाई लड़ सकती हैं। अनशन तोड़ देने से अफस्पा हटवाने की उनकी जिद खत्म नहीं हुई है। वे अब एक नई ताकत के साथ मैदान में हैं।

यानी एक ने जीवन के संघर्ष में हार मान ली तो दूसरे ने जीवन का नया संघर्ष चुन लिया। जबकि दोनों ही संघर्ष के बीच जीने वाले के रूप में जाने जाते हैं। इरोम ने जब खुद अपने जीवन के बारे में फैसला किया तो उनके अपने ही खिलाफ हो गए। तब भी वे जीने के हौसले के साथ लड़ती और डटी रहीं। दूसरी ओर, कलिखो टूट गए। इसके बावजूद, निराशा और तनाव के बीच जूझ रहे हजारों लोगों के लिए दोनों ही लोगों का जीवन प्रेरणा लेने वाला है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सन 2020 तक अवसाद (डिप्रेशन) दुनिया की चौथी सबसे बड़ी बीमारी होगी। इसके पचास फीसद मरीज दिखने में सामान्य लगते हैं, लेकिन शुरुआती दौर में ही आत्महत्या की कोशिश करते हैं। देश-दुनिया में निराश हताश लोगों की संख्या बढ़ रही है। जानी-मानी मनोचिकित्सक डॉक्टर अरुणा ब्रूटा ने एक बार बताया था कि ‘आत्महत्या की कोशिश करने वाले लोग इस कदर निराश होते हैं कि एक सेकेंड के अंदर जान देने का फैसला लेते हैं और कर गुजरते हैं। इसी बेहद नाजुक पल में अगर कोई अपना सम्हाल लेता है या फिर किसी तरह उस पल से बाहर निकाल लेता है तो आत्महत्या के मुहाने से आदमी लौट आता है। किसी का भी साथ और अपनत्व या फिर किसी की प्रेरणादायक कहानी जीवन के संघर्ष से हार चुके किसी व्यक्ति को जीवन दान दे सकती है।

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