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दुनिया मेरे आगे: कहां गईं तितलियां

तितली पर बहुत-सी चीजें लिखी गई हैं। कविताएं और गीत भी बहुतेरे हैं। ‘पंछी बनूं उड़ती फिरूं’ गीत की याद बहुतेरे लोगों को होगी। उसी की तर्ज पर ‘तितली बनूं उड़ती फिरूं’ भी कह सकते हैं। बच्चों के लिए लिखने वाले कवियों की भी कविताएं हैं तितली पर। वह रूपक और प्रतीक भी बनती रही है। और एक छवि, एक बिंब के रूप में भी वह अनुपम है।

तितलियां। (फोटो- रंजीत लाल)

आपने हाल में क्या कहीं कोई तितली देखी है? यह सवाल मानो मैं अपने से भी कर रहा हूं। नोएडा में जहां मैं रहता हूं, वहां खूब पेड़-पौधे हो गए हैं। फूलों की क्यारियां और उनके गमले भी हैं। परिसर में घास भी है। पर तितलियां कम दिखती हैं। जब दिखती हैं तो बहुत अच्छा लगता है। कोई तितली थोड़ी देर के लिए कहीं आसपास बैठी हुई मिल जाए तो उसकी ओर ही देखता रहता हूं। एक बार मोबाइल के कैमरे से उसकी तस्वीर खींचने में भी सफल हो गया था। तितली घास पर चुपचाप बैठी हुई थी। मैं यह ‘चुपचाप’ क्यों लिख गया! यह तो अतिरिक्त शब्द माना जाएगा! तितली तो बेआवाज ही उड़ती है, बेआवाज ही बैठती है, पंख खोलती है तो कोई फड़फड़ाहट भी सुनाई नहीं पड़ती। यही तो उसकी खूबी है- कई खूबियों के बीच। वह किसी भी रंग की हो, हमेशा सुंदर ही लगती है।

पर अफसोस, उसकी कुछ प्रजातियां खोती या कम होती जा रही हैं- दुनिया भर में। कई देशों में उसके पोसने के जतन भी किए जा रहे हैं। कुछ बरस पहले जब लंदन में ‘गार्डियन’ जैसे पत्र में एक सचित्र लंबी रिपोर्ट पढ़ने को मिली थी कि किस प्रकार विभिन्न पार्कों या उद्यानों में यह तलाश की जा रही है कि वहां कितने प्रकार की तितलियां अब देखने को मिलती हैं या नहीं मिलती हैं। तितली पर बहुत-सी चीजें लिखी गई हैं। कविताएं और गीत भी बहुतेरे हैं। ‘पंछी बनूं उड़ती फिरूं’ गीत की याद बहुतेरे लोगों को होगी। उसी की तर्ज पर ‘तितली बनूं उड़ती फिरूं’ भी कह सकते हैं। बच्चों के लिए लिखने वाले कवियों की भी कविताएं हैं तितली पर। वह रूपक और प्रतीक भी बनती रही है। और एक छवि, एक बिंब के रूप में भी वह अनुपम है। रूस के प्रवासी लेखक ब्लादिमीर नोबोकोव की तो तितली पर एक किताब ही है। जो भी हो, उसकी लोकप्रियता सबके बीच है।

बीती सर्दियों में मैं अपने रिहायशी परिसर के पार्क में घास पर कुर्सी डाल कर कई बार बैठा धूप सेंकने या लिखने-पढ़ने के लिए। जब भी तितली दिखी है- कभी कभार या एक-दो दिनों के अंतराल पर दिखी। मैंने कुछ चकित-विस्मित होकर ही उसकी ओर देखा। हां, अब स्वाभाविक रूप से वह विस्मित करती है, जब बहुत कम दिखाई पड़ती है। मैं समझता हूं, नोएडा-दिल्ली समेत अब बहुतेरे महानगरों-शहरों का यही हाल हो गया है, तितलियों के मामले में। प्रकृति की, सृष्टि की इतनी सारी चीजें कम हो रही हैं, यह चिंताजनक तो है ही। भौंरे भी कम दिखने लगे हैं।

खैर, सोचिए कि पिछली बार कोई तितली आपने कब और कहां देखी थी! शायद उसके साथ आपको वह जगह भी याद आ जाए, जहां आपने उसे देखा था। इसका कारण भी यही होगा कि वह अब कुछ दुर्लभ हो गई है। कोई दुर्लभ हो चुकी चीज अगर दिख जाए तो उसे दिखने के स्थान-काल सब याद रह जाते हैं। दो-तीन बरस पहले की बात है, मैं और मेरी नातिन कार से कहीं जा रहे थे। चिराग दिल्ली-पंचशील क्रॉसिंग की ट्राफिक लाइट में गाड़ियां रुकीं तो हमें बाहर उड़ती हुई एक तितली नजर आई। हम कुछ देर तक उसे देखते रहे।

लोगों और वाहनों की भीड़ में यही सोचते हुए कि वह यहां कैसे आ गई है भटक कर! वह कहीं भी दिखे भीड़ भरी जगह में, किसी फूल-पौधे पर, किसी रेलिंग-फेंस पर, किसी पार्क में- अपनी ओर ध्यान खींच लेती है। हम उसे देखने लगते हैं। जब वह फूल पर बैठती है तो दोनों की मिली-जुली सुंदरता दोगुना नहीं, कई गुना बढ़ जाती है। तितलियां आमतौर पर हर महाद्वीप में पाई जाती हैं। मुझे वह जमाना याद है, जब तितलियां बाग-बगीचों में उड़ती रहती थीं। और इस तरह के प्रश्न का तो मौका ही नहीं आता था कि आपने पिछली बार तितली कब देखी थी!

तितली की एक बड़ी खासियत यही है कि अगर आप दुख का कोई भार साथ में लिए हुए चल रहे हों और तभी तितली दिख जाए तो क्षण भर के लिए तो वह उस भारी भार को उतार ही देती है आपके मन से। अगर आप किसी सुख, किसी आनंद, को साथ में लिए चल रहे हों, तो वह आपको और अधिक आनंदित कर देती है। वह उड़ती है। मुड़ती है। ओझल हो जाती है। फिर दिखती है।

हवा में उसका संतरण अचूक है। उसकी उड़न-गति प्रभावित करती है। अनायास आपकी आंखों को अपनी ओर बुला लेती है। वह बोलती नहीं है, पर बिना बोले हुए भी बहुत कुछ कहती है। वह भारहीन लगती है। सचमुच भारहीन है भी। उसकी यही भारहीनता मोहती है। अपनी सुंदरता को वह जिस भारहीन ढंग से हमारे भीतर उतारती है, उसे कह कर नहीं बताया जा सकता, वह महसूस किया जा सकता है। फुलवारियां, क्यारियां उन्हें लुभाती हैं। दिखती रहें तितलियां। बहुमंजिली इमारतों और सीमेंट-कंक्रीटी जंगल से भी ओझल न हो जाएं।

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