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दुनिया मेरे आगेः सड़क पर सिमटी स्त्री

अब छह साल हो गए हैं मुझे इस रास्ते से आते-जाते। रास्ता, जो संकरा है बहुत...! रास्ता, जो उम्मीद है बहुत-से लोगों की, उनके रोजगार तक पहुंचने की...

Author July 14, 2016 1:13 AM
(express Pic)

अब छह साल हो गए हैं मुझे इस रास्ते से आते-जाते। रास्ता, जो संकरा है बहुत…! रास्ता, जो उम्मीद है बहुत-से लोगों की, उनके रोजगार तक पहुंचने की, विद्यार्थियों के स्कूल-कॉलेज तक पहुंचने की… दिन भर की थकान के बाद अपने घर लौटने की। एक रास्ता, जिस पर रोज भारी वाहनों के साथ-साथ न जाने कितने लोगों की उम्मीदें सफर करती हैं। देखा जाए तो रास्ता है क्या! ऐसा लग रहा है, जैसे समाज की अन्य संस्थाओं के साथ इसे भी संस्थाबद्ध कर दिया गया हो। समाजशास्त्रियों का यह मानना है कि समाज में हर व्यक्ति सामाजिक संस्थाओं में रह कर संस्थाबद्ध व्यवहार करता है। यह सड़क भी मुझे इन संस्थाबद्ध व्यवहारों का पुलिंदा क्यों लग रही है?

रात के नौ बजे मैं दिल्ली की एक घनी आबादी वाली जगह पर बने पुल की सड़क को पिछले एक घंटे से देख रही थी। पूर्वी दिल्ली के वजीराबाद में इस पुल की सड़क को भी संस्थाबद्ध कर दिया गया हो जैसे! पिछले छह सालों से हर दूसरे-तीसरे दिन इस सड़क पर मैं यह मंजर देखती हूं, जब वहां सभी छोटे-बड़े वाहनों का हुजूम खचाखच लग जाता है। लगभग दो किलोमीटर का रास्ता वाहनों से पट जाता है। उस शाम घर लौटते वक्त भी यही हुआ। पुल पर घंटों से जाम लगा था। तुरंत जाम के खुलने की उम्मीद नहीं देख कर सैकड़ों लोग बसों और रिक्शा से उतर कर पैदल चल रहे थे। आधे घंटे से रुकी बस में मैं बैठी थी। बगल वाली सीट पर एक बूढ़ी महिला बैठी थीं। पता नहीं वे किससे मिलने कहां जा रहीं थीं। थकान से ऊब कर उन्होंने पूछा कि पता नहीं, यह बस चल क्यों नहीं रही है! मैंने कहा कि ‘अम्मा, बहुत जाम है आगे।’

इतना कह कर मैं शाम को रात में ढलते हुए महसूस करती हुई पैदल ही सफर तय करने का इरादा मन में करती हुई उठने लगी। इस पर अम्मा ने कहा- ‘अरे कहां जाओगी? बहुत लंबा है रास्ता। अभी तो बैठ जाओ।’ मैं यह कहते हुए निकल लेती हूं कि अम्मा, यहां तो रोज का यही काम है… मुझे आदत है। इतना कह कर मैंने पैदल चलना शुरू कर दिया। इस पैदल यात्रा में कई दृश्य मेरे सामने आने लगे। सब तरफ गाड़ियां रुकी हुर्इं। पुल के दोनों ओर पैदल हताश लोग, अधिकतर खाली हो चुकी बसें, बेबस बस के ड्राइवर, ऊंघते बस कंडक्टर, झल्लाहट में कारों के चालक, जल्दबाजी की ताक में बाइक चालक, किसी बीमार मरीज को ले जाती एम्बुलेंस…! सब रुके हुए। इन दृश्यों की एक दर्शक मैं। पुल पार किया, समय देखा। दस बजने को थे। सोचा कि पिछले पांच सालों में सिग्नेचर ब्रिज के नाम पर कितना पैसा सरकारों ने खर्च कर दिया है, कितना समय लग चुका है! फिर भी यह पुल नहीं बन पाया। सोचती हूं कि 2012 में एक नेता ने निर्भया कांड के समय कहा था कि दिल्ली की सड़कें लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं हैं… इसलिए लड़कियां आठ बजे रात के बाद बाहर न रहें!

तो क्या उस दिन मैंने अपनी सुरक्षा उस ट्रैफिक जाम में छोड़ दी थी? अचानक एक बाइक पर सवार पुरुष ने मुझे मदद के लिए कहा कि लिफ्ट चाहिए! मैंने इशारे से उसे ‘नहीं’ कह दिया। मेरे बगल में चल रहे दो युवकों ने यह देख मुझ पर कुछ फब्तियां कस दीं। मैं चुपचाप खुद को सड़क के एक किनारे पर समेटते हुए तेज कदम बढ़ाती चलती गई। लगभग आधे-पौने घंटे की पैदल यात्रा के बाद एक रिक्शा मिला। मैंने उससे आगे जाने के लिए पूछा। पहले उसने मना किया, फिर कहा- ‘मैडम जी, आप कितनी दूर से पैदल आ रही हैं?’ मैंने कहा- ‘पुल के दूसरी ओर से।’ इतना सुन कर वह मुझे ले जाने को तैयार हो गया, बहुत ही वाजिब किराए में। खजूरी के बस स्टैंड पर लाकर एक आॅटो रिक्शा ड्राइवर से उसने कहा, इन्हें अगले स्टैंड पर छोड़ देना। मैंने उसकी इस मानवीयता के लिए उसे धन्यवाद कहा और बस लेकर अपने घर की ओर आ गई।

जब यह लिख रही हूं तो मन में आ रहा है कि कैसा विचित्र है सड़क का यह संस्थाबद्ध व्यवहार! स्त्री उस पर सिमट जाती है, पुरुष उसकी संदिग्ध मदद को आता है, युवक फब्तियां कसते हैं, एक सामान्य पुरुष सुरक्षा का भाव रखता है, जनता प्रशासन की खामियां गिनाती है…! यह सब एक संकरी सड़क पर होता है! खैर! पता नहीं, वह अम्मा कब घर पहुंची होंगी! वह एंबुलेंस जिस बीमार व्यक्ति को ले जा रही थी, वह वक्त रहते अस्पताल पहुंच सकी होगी या नहीं! शायद अब जब भी अगले चुनाव दिल्ली में होंगे तो वजीराबाद पुल के निर्माण का मुद्दा फिर से जनता के सामने राजनीतिक पार्टियां रखेंगी और इस समस्या से त्रस्त जनता को लुभाने की कोशिश करेंगी। मैं अपने चेहरे पर एक मुस्कराहट महसूस कर रही हूं। शायद मैं अपनी किसी निष्क्रियता को पहचान रही हूं।

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