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कहां है हमारा ठौर

हमें माफ कर दो मेरी नन्हीं बच्ची नैन्सी! हम सब तुम्हें बचा नहीं पाए! तुम्हारे रक्त से भीगे इस जमीन पर हम जिंदगी की बात कैसे करें... जब हत्यारे खुला घूम रहें हों, बच्चियों के शिकार पर निकले हों, तबाही मचा रहे हों।

Author Published on: June 5, 2017 6:08 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

निवेदिता   

हमें माफ कर दो मेरी नन्हीं बच्ची नैन्सी! हम सब तुम्हें बचा नहीं पाए! तुम्हारे रक्त से भीगे इस जमीन पर हम जिंदगी की बात कैसे करें… जब हत्यारे खुला घूम रहें हों, बच्चियों के शिकार पर निकले हों, तबाही मचा रहे हों। धरती पर शोक और रक्तपात के खिलाफ कोई तो आवाज दो! मधुबनी का महादेव मठ गांव अपनी बारह साल की बच्ची नैन्सी की क्षत-विक्षत लाश को देख उबल क्यों नहीं रहा है? खून से भीगा हुआ उसका नन्हा चेहरा, उसके खुले हुए होंठ! शायद उसने अंतिम बार मदद के लिए आवाज दी होगी!
मुझे माफ करना मेरी बच्ची…! हम सब बर्बर और हिंसक समय में हैं। तुम्हारी लड़ाई लड़ने की फुर्सत किसी को नहीं है। मुझे मालूम है थाना के सिपाही आए थे। हत्या पर बारीकी से मुआयना किया। फिर भी हत्यारे घूम रहे हैं निर्भीक। गांव के मुहाने पर नदी के पास तुम पड़ी थी। लोग कहते हैं कि तुम कमाल की तैराक थी। लहरों के साथ इस तरह मचलती थी, जैसे वे तुम्हारे दोस्त हों। उसी नदी के पास तुम लहूलुहान मिली थी। हवा में बासी शराब और मछली की सड़ांध फैली थी। जैसे मेरा शहर बच्चियों के रक्त से डूब गया है। भीतर-भीतर आग सुलग रही है, श्मशान की चिताओं को तेज करती हुई। क्या होगा जहां हर रोज बच्चियां मारी जा रही हों। दहेज के लिए हत्या कर दी जा रही हो… तेजाब से जला दी जाती हों। स्कूल, कॉलेज, घर, बाहर, गली, मोड़, चौराहा- कौन-सी जगह उसके लिए मुफीद है। आंकड़ों का क्या करें? यह हम सब कितना विलाप करेंगे! कौन-सा शहर, गांव, महानगर सुरक्षित है?
किस राजनीति में तुम्हारे रक्त का हिसाब मांगा गया है? किस राज्य के विकास के सपनों में तुम्हारी उपस्थिति है? क्या फर्क पड़ता है कि तुम्हारा नाम निर्भया है या कोई भी वह नाम, जिसे ऐसी बर्बरता का शिकार होना पड़ा! यह समाज कहता है कि हर पल याद रखो कि तुम महज एक शरीर हो। यही है तुम्हारी पहचान। तुम्हारी रक्षा के लिए रोमियो स्क्वाड को तैनात कर दिया गया है। तुम पर पहरा बिठा दिया गया है। यह पहरा उस उत्तर प्रदेश में बिठाया गया जहां हिरासत में बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले हैं। कौन-सी जगह है जहां हमारी बच्चियां बेफिक्र होकर जी सकें। जहां वे कह सकें कि सूरज-सा तपता दिन हमारा… और ये चांद रात हमारी। क्या कोई जगह है जहां हिंसा-मुक्त जिंदगी जी रही हों औरतें? क्या यह देश हमारा भी है? क्या आधी आबादी अपने बारे में निर्णय ले सकती है? क्या हम कह सकते हैं कि हिंसा की आग से हमारी पीढ़ियां अब नहीं जलेंगी?

हमारे दिल के जख्म फट पड़े हैं। कितनी घटनाएं हम सबकी स्मृतियों में जिंदा रहती हैं। मुझे याद है हाजीपुर के आवासीय विद्यालय में पढ़ने वाली गरीब दलित लड़की, जिसकी लाश स्कूल के नाली में मिली थी। बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। वह पढ़ रही थी और अपने वजूद के लिए लड़ रही थी। मारी गई। उस लड़की का क्या हुआ जो पटना के एक कोचिंग संस्थान में पढ़ती थी और जिसने जिंदगी के सपने देखे थे। उसके साथ पढ़ने वाले साथी ही उसे उठा ले गए, बलात्कार किया और वीडियो बना लिया। जिंदगी से लड़ते-लड़ते वह हार गई और उसने आत्महत्या कर ली। कैसे हम भूल जाएं पटना पीएमसीएच के जनरल वार्ड में दस साल की उस बच्ची को, जिसे दरिंदे उस समय उठा ले गए, जब वह खेत गई थी। कितना मुश्किल होगा, जिसे सदा ऐसी दुखद स्मृतियों के साथ जीना पड़े।कितने हादसों को याद किया जाए। चिताओं से उठने वाली लाल रोशनी आपस में जूझती हुई चारों दिशाओं में फैल गई है। क्या ऐसे अपराध रोके नहीं जा सकते? दुखद स्मृतियों की काली छाया को दिल में याद करते हुए हमें मुक्ति के लिए लड़ना ही होगा। दुख इस बात पर है कि इतनी घटनाओं के बावजूद लोगों को कोई आघात नहीं पहुंचता। हत्या के आंकड़े लोगों को डराते नहीं। शायद इसलिए कि उन्हें लगता है कि यह मामला मेरा नहीं है या ऐसे मामले अप्रिय होते हुए भी स्थायी नहीं हैं। इस दुख, हिंसा, पराजय और बर्बरता के बावजूद सपने अभी जिंदा हैं। हम सब एक ऐसे देश की कामना करते हैं जहां प्रकाश की किरणें छिटकी हों, जहां हम अपनी बच्चियों से कह सकें कि ये दुनिया तुम्हारे लिए है, जिंदगी से भरी हुई, तुम्हारी हंसी से गूंजती हुई…! सारा आकाश तुम्हारा है… तुम जिंदा रहो! तुमसे ही ये पूरी कायनात है। तुमसे ही आबाद है हमारी दुनिया!

 

 

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