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दुनिया मेरे आगे: यादों का वसंत

यादों की पतवार जब जीवन की नाव को किनारे की तरफ खींचती है, तब हृदय में एक ज्वार उठता है। इसी में समा जाता है, सब कुछ। याद स्नेह की वेदी की ओर बढ़ती एक ऐसी आहुति है, जो मन को पूरी तरह प्रेरित कर रही है। मन कहता है कि यह यादों का दरिया सबको डुबा देता है, सब डूब जाने के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता।
Author February 15, 2018 02:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

महेश परिमल

बर्फ-सी पिघलती याद… सर्द रातों में सिहरती याद… रण में झुलसाती रेतीली याद।… रिमझिम फुहारों-सी भिगोती याद… अवनि और अंबर को मिलाने दूर क्षितिज में ले जाती याद… कोयल की कूक और भ्रमर के गुंजन में डूबती याद…। और केवल याद ही याद… यह यादों का वसंत है। इस बार यह एक अनोखा सौंदर्य लेकर आया है। अपने साथ संयोग के पलों का भीगा-भीगा अहसास और वियोग के पलों की तीव्र अगन भी ले आया है। बीते हुए पलों की सुगंध वातावरण को सुवासित करे और मन का मयूर नृत्य करे, उसके पहले जरा थम जाओ ओ स्नेह की पंखुरियो, कि आज यादों का वसंत हर एक डाली को मदमस्त बनाने आ रहा है। अपने यादों के झरोखों को थोड़ा-सा खोल कर देखो…, देखो तो सही… वो देखो… उस ओर से कंधे पर काम का धनुष और गले पर सुगंधी फूलों की माला पहन कर कामदेव आ रहा है और उसे पहचाना? वो उसके नजदीक में ही उसके साथ दौड़ती आती वो परछार्इं? हां, वह थोड़ी-सी शरमाती, सकुचाती, अपनी मदिर मुस्कान से, नयनों की कटार से कामदेव को घायल करती उसकी वामांगी रति ही तो है। क्या वह उससे अलग रह सकती है भला? वे दोनों साथ मिल कर सारे वातावरण को कामरूप बनाते हुए आज इस झरोखे में से होते हुए आ ही पहुंचे आपके हृदयप्रदेश में! क्या कह रही हैं ये यादों की लहरें? काम और रति की वासंती कला में क्रीड़ा करती गतियां? आइए आज इनका यह संदेश हम यादों के साथ इस तरह बांटें और जानें कि जब वे अपनी यादों को भी इनके साथ समेट लेते हैं, तो याद किन-किन रूपों में हमारे सामने आती है।

याद एक श्वास बन कर हृदय को स्पंदित कर रही है। याद एक सुगंध बन कर जीवन को सुवासित कर रही है। याद एक स्वप्न बन कर दिल-दिमाग को आंदोलित कर रही है। याद एक तड़प बन कर आंखों को भिगो रही है। याद एक मुस्कान बन कर होठों पर अधिकार जमा रही है। याद एक लहर बन कर मन को डुबो रही है। याद एक तूफान बन कर सुख-संतोष लूट रही है। याद एक अरमान बन कर अनोखी खुशी दे रही है। यह यादों की बस्ती है। यहां कुछ देर ठहरने को मन व्याकुल हो रहा है, क्योंकि प्रकृति द्वारा प्राप्त यह सबसे रमणीय स्थल है। इन यादों की शुरुआत भी हृदय से होती है और इनकी मंजिल भी हृदय ही है। हृदय यादों की समाधि है। यहां यादें मुनि की तरह तपस्या कर रही हैं। यादों की कश्ती जब तूफान में फंसती है, तो एक नई परिभाषा जन्म लेती है। इन यादों की शहनाई सुनने को कान हमेशा उतावले होते हैं। आंखें यदि यादों में भीगती हैं, तो होंठ यादों में मुस्काते हैं। इन यादों में डूब कर मन का मयूर ऐसे नाचता है मानो मन की वीणा झंकृत हो उठी हो। यादों में सत्य, शिव और सुंदर का समावेश है। यादों में ही छिपा है, जीवन का सारांश। यादों की चुभन भी कांटों की मानिंद तन-मन को घायल करती है। हृदय के तारों को छेड़ कर स्वयं की उपस्थिति बताने में यादें कभी किसी भी तरह का संकोच नहीं करतीं।

यादों की पतवार जब जीवन की नाव को किनारे की तरफ खींचती है, तब हृदय में एक ज्वार उठता है। इसी में समा जाता है, सब कुछ। याद स्नेह की वेदी की ओर बढ़ती एक ऐसी आहुति है, जो मन को पूरी तरह प्रेरित कर रही है। मन कहता है कि यह यादों का दरिया सबको डुबा देता है, सब डूब जाने के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। उसे अधबीच ही रोक कर यादें कह उठती हैं कि नहीं गलत सोच रहे हो तुम। सब कुछ डूब जाने के बाद भी यदि कुछ शेष रहता है, तो वह है केवल यादें। बूंद के रूप में रेत में समाने वाली यादें कभी मरती नहीं। अमृतपान करती यादें जीवन जीने की प्रेरणा बनती हैं। यादों का उपवन कभी सूना नहीं रहता। उसमें कोंपलें फूटती हैं, वासंती हवाएं बहती हैं, और पंछियों का कलरव गूंजता है। इंद्रधनुषी फूलों का साम्राज्य पूरे वातावरण को सौरभमय बनाता है।
हरसिंगार के फूलों की तरह एक-एक पंखुरी से झरती याद कभी जीवन से अलग हो सकती है भला? वसंत का वासंती वातावरण कभी इसे भुला सकता है? नहीं, कभी नहीं। तो आओ स्वागत करें इन वासंती हवाओं का, सत्कार करो इन सुनहरी लहरों का, और खुद के भीतर समा लो इन यादों के वसंत को। यह यादों का वसंत आज आपके हृदय के द्वार पर पूरी उमंग और विश्वास के साथ आ खड़ा हुआ है। तो आओ वसंत, तुम्हारा स्वागत है।

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