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दुनिया मेरे आगे: सम्मान का हक

भारत में कभी दुनिया भर के लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे। लेकिन अब हमारे देश में जो नया इंडिया उदित हो रहा है, वह काफी नुकसानदेह साबित हो रहा है। यह ‘इंडिया’ हाईटेक यानी उच्च तकनीकी से लैस तो हो चुका है, लेकिन इसकी मानसिकता में अभी भी लंपटता बरकरार है। यह शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ हम सबकी भी जिम्मेदारी है कि अपने देश के सम्मान को बचाएं।

Author March 8, 2018 4:13 AM
प्रतीकात्म तस्वीर।

गिरीश पंकज

पिछले दिनों दिल्ली के एक विश्वविद्यालय की लड़कियां इसलिए सड़कों पर उतर आर्इं कि कुछ बदमाश छात्रों से वे बुरी तरह त्रस्त हो चुकी हैं; विकृत मानसिकता के शिकार कुछ युवक लड़कियों पर तरह-तरह की गंदी टिप्पणियां करते हैं। एक लड़की ने तो यहां तक बताया कि किसी लड़के ने उस पर वीर्य से भरा गुब्बारा फेंका। यह अपने आप में असाधारण रूप से निर्लज्जतापूर्ण घटना कही जाएगी। समझा जा सकता है कि हमारी युवा पीढ़ी का एक वर्ग कैसी भयंकर विकृति का शिकार होता जा रहा है। ऐसी हरकतें करने वाले युवक क्या आदर्श नागरिक बनेंगे? शायद नहीं। इसके बजाय वे शायद बलात्कारी, गुंडा या डकैत बन जाएं! हैरानी तो यह जान कर होती है कि देश के महत्त्वपूर्ण शिक्षा केंद्रों में आकर कुछ युवक पूरी तरह विफल क्यों हो जाते हैं! शिक्षा ग्रहण करने के अपने मुख्य लक्ष्य से वे भटक क्यों जाते हैं? हमने सुना था कि शिक्षा मनुष्य को सभ्य बनाती है। लेकिन जब गुमराह युवकों की ऐसी हरकतें देखते हैं तो सोचना पड़ता है कि क्या शिक्षा सच में सबको सभ्य बनाती है? या यह अब केवल असली या फर्जी डिग्री देने तक सीमित रह गई है? एक तरफ दिल्ली में कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाता है और हजारों बच्चे आंदोलन करने सड़कों पर उतर जाते हैं, वहीं कुछ युवक इस आंदोलन से दूर लड़कियों पर अपनी कुंठा के गुब्बारे फेंकने पर आमादा हैं। ये केवल पतन के गुब्बारे हैं, जो हमारे चेहरे को और विकृत कर रहे हैं। ऐसी घटनाएं होती हैं, तब सोचना पड़ता है कि हमारे सामने यह कैसी दुनिया बनती जा रही है, जहां युवा पीढ़ी न केवल अपने मां-बाप को धोखा दे रही है, बल्कि अपने पतन का भी घोषणापत्र तैयार कर रही है।

लड़कियों के खिलाफ अश्लील हरकत करने वाले वे युवक अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें अपना भविष्य बनाना है, माता-पिता के सपनों को साकार करना है। लेकिन कस्बों से महानगरों में आकर शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे अगर शिक्षा का रास्ता छोड़ कर ऐसा अराजक रास्ता अपनाएंगे तो वे अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारेंगे। इन्हें समझाने वाले शिक्षकों की भी अब बड़ी कमी होती जा रही है। इसलिए अब शायद यह जरूरी हो गया है कि विश्वविद्यालयों में भी छात्रों को नैतिकता का निरंतर पाठ पढ़ाने की जरूरत है। अगर समय रहते हम नहीं चेते तो पतन के गुब्बारे से लेकर तेजाब फेंकने तक की घटनाएं होती रहेंगी। छेड़खानी, गंदे फिकरे कसना और बलात्कार जैसी घटनाएं तो लगातार हो ही रही हैं। इन सबसे बचने के लिए भले ही शिक्षा परिसर में खुफिया कैमरे लगा कर रखें जाएं, लेकिन अपराध से बच नहीं पाएंगे। असली चीज है युवाओं का मानस या उनके सोचने-समझने का तरीका, जो शायद उन लोगों तक सही तरीके से नहीं पहुंचे। अब सोचने-समझने के सभ्य तरीकों या धारणाओं से उन्हें कैसे लैस किया जाए, इसकी चिंता विश्वविद्यालयों से लेकर हर उस शिक्षा केंद्र को करनी होगी, जहां मासूम बच्चे पढ़ रहे हैं। ऐसी शिक्षा की जरूरत है कि बच्चा बड़ा होकर हर स्त्री के प्रति सम्मान का भाव रखे, उसके व्यक्तित्व की गरिमा का खयाल रखे। उसे बताया जाए कि ऐसा करके वह अपनी मां-बहन या घर की दूसरी महिलाओं का सम्मान बढ़ाने में भूमिका निभाएगा। सच यह है कि स्त्री को भोग का सामान समझने की मानसिकता के कारण ही ऐसी स्थितियां जन्म लेती हैं।

भारत में कभी दुनिया भर के लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे। लेकिन अब हमारे देश में जो नया इंडिया उदित हो रहा है, वह काफी नुकसानदेह साबित हो रहा है। यह ‘इंडिया’ हाईटेक यानी उच्च तकनीकी से लैस तो हो चुका है, लेकिन इसकी मानसिकता में अभी भी लंपटता बरकरार है। यह शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ हम सबकी भी जिम्मेदारी है कि अपने देश के सम्मान को बचाएं। एक ऐसा समाज बनाएं जहां स्त्रियों को देह नहीं मान कर, उन्हें व्यक्ति समझा जाए और उनकी गरिमा की कद्र की जाए। फिलहाल हमारे युवाओं को ऐसा समाज और व्यवहार दिया जाता है, जहां वे महिलाओं को केवल कुंठा की दृष्टि से देखते हैं। उनके खिलाफ आपराधिक बर्ताव की बातों से भरे रहते हैं। अगर केवल मनोरंजन के लिए कोई खास व्यवहार होता तो वह महिलाओं और पुरुषों के साथ समान भाव से होता। पुरुषों पर भी फिकरे कसे जाते। लेकिन कई पुरुषों के भीतर जमी कुंठित सोच का निशाना केवल महिलाएं बनती हैं। आज का दौर ऐसा विचित्र है कि अगर नई पीढ़ी के साथ इस तरह नैतिक मूल्यों से जुड़ी बातें की जाएं तो वह सामने वाले को ही पोंगापंथी या पिछड़ा हुआ बता कर किनारे करने पर आमादा हो जाती है। ऐसी कठिन और विकृत होती जा रही दुनिया से निपटने के तौर-तरीके पता नहीं किसके पास हैं! यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सवाल नैतिक मूल्यों से ज्यादा स्त्री के सम्मान के अधिकार का है।

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