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दुनिया मेरे आगे: धूप के मायने

धूप ही फूल खिलाती है या कहें कि उनके सौंदर्य को और अधिक दमकाती है।

सूर्य के गुण इसीलिए तो आमतौर पर दुनिया के सभी देशों, संस्कृतियों और कलाओं में गाए गए हैं।

पिछले दिनों जब देश के कई प्रदेशों में जरूरत से ज्यादा ठंड पड़ी, पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी हुई, ठंडी हवाएं चलीं, तो एक बार फिर सबने धूप की आगवानी की जब भी वह निकली, लोगों ने इस तरह के वाक्यों के साथ ‘अरे, धूप आ गई’, ‘आज बड़ी अच्छी धूप निकली है’। जहां और जिस जगह, जिस कोने में जिसको भी धूप मिली, वह वहीं चलता, खिसकता बढ़ लिया। फिर ऐसे दृश्य दिखाई पड़े कि खाने-पकाने, सब्जी काटने-छिलने, नाश्ता या भोजन करने के काम धूप में बैठ कर किए जा रहे हैं। हां, वह विटामिन ‘डी’ है, सूर्य-शक्ति है। उसी के रथ पर सवार होकर घूमती है। सूर्य के गुण इसीलिए तो आमतौर पर दुनिया के सभी देशों, संस्कृतियों और कलाओं में गाए गए हैं। हमारे यहां ‘कोणार्क’ तो इसका अनुपम उदाहरण है। बहुत पुराने जमाने में मिस्र के लोग मानते थे कि सूर्य (जिस वह ‘रा’ कह कर पुकारते थे) को रात की देवी निगल लेती है, पर सुबह फिर उसका पुनर्जन्म हो जाता है। हां, न जाने कितने विश्वास, अंधविश्वास, पुरा-प्रसंग उसके साथ जुड़े रहे हैं। वे सब रुचिकर हैं। सब सूर्य का और उसके प्रसंग से धूप का गुणगान ही तो करते हैं।

हमारे अपने देश में तो सूर्य की, धूप की बड़ी महिमा रही ही है, आज भी न जाने कितने लोग नदी में स्नान कर उसके बीच और उसके किनारे खड़े होकर ‘सूर्य नमस्कार’ करते हैं। नार्वे जैसे देशों में धूप का निकलना तो एक उत्सव से कम नहीं होता है। घर मानो उठ कर बाहर आ जाते हैं, पार्क में, लॉन पर। वहीं होता रहता है खाना-पीना, जब तक धूप रहती है और कई बार तो वह देर रात तक रहती है। पर उसका उत्सवी रूप वहां बनता इसलिए है कि कुछ महीनों में वह वहां छिप जाती है। सृष्टि में वह न हो तो उजाला भी न हो।

हां, धूप एक उजाला है। उजाले का प्रतीक है। वह एक रूपक है। वह सभी जीवों, सभी चीजों, के रंध्रों में प्रवेश करती है। उन्हें तपाती है। जीवन देती है। वह मानों ‘सूरजमुखी’ जिसे वान गॉग ने अपनी चित्रकृति से अमर कर दिया है। धूप ही फूल खिलाती है या कहें कि उनके सौंदर्य को और अधिक दमकाती है। वह जहां कहीं तिरती है, किसी अंधेरे कोने में, पानी पर, वृक्षों की शाखाओं पर, उन्हें एक चमक से भर देती है। उसी की प्रतीक्षा में, उसी दमक की प्रतीक्षा में तो हम रहते हैं। एक भरोसे से भरे हुए कि रात बीतने के बाद वह आएगी, जीवन का वरदान लेकर… स्मृतियां लेकर। यह अकारण नहीं है कि आमतौर पर हर देश में ऐसे स्थल निर्धारित किए जाते हैं, जहां से ‘सूर्योदय’ का ‘अधिक सुंदर’ रूप देखा जा सके। ‘ईस्ट फेसिंग’ इमारतों, बरामदों, बालकनियों की कितनी चर्चा हमारे देश में होती है। हां, धूप पसरी हुई है, दुनिया भर की कविताओं-कहानियों-उपन्यासों में, चित्र कृतियों में। हमारे यहां के लोक चित्रों में सूर्य और उसकी धूप को वैसे भी एक विशेष दर्जा प्राप्त है। देख लीजिए मधुबनी जैसी चित्रशैली को ही। सूर्य वहां आपको बहुतेरी चित्रकृतियों में विराजमान मिलेगा।

वह सबको प्रिय है, बच्चों को, बड़ों को। खिलाड़ियों को तो विशेष रूप से। उससे फल पकते हैं। अचारों का स्वाद बढ़ता है। पशु-पक्षी सभी तो उसकी प्रतीक्षा में रहते हैं। वह मनुष्यों को तो अपनी ओर बुलाती ही है, मनुष्य-आकृति में भी तब्दील हो जाती है- कवि सर्जना में। शमशेर बहादुर सिंह की छोटी-सी, मर्मभरी, अनेकार्थी कविता में वह हंसती है: ‘धूप कोठरी के आईने में खड़ी/ हंस रही है/ पारदर्शी धूप के परदे/ मुस्कराते/ मौन आंगन में/ मोम-सा पीला/ बहुत कोमल नभ/ एक मधुमक्खी हिला कर फूल को/ बहुत नन्हा फूल/ उड़ गई/ आज बचपन का/ उदास मां का मुख/ याद आता है।’ और उन्हीं की ‘सूर्योदय’ और ‘धूप’ शीर्षक अन्य कविताएं वे भी तो एक ‘जादू’ जगाती हैं। ‘सूर्योदय’ कविता की यह पंक्ति ‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे’ पढ़ी थी तो मानो आकाश को, सृष्टि को एक नई तरह से देखने लगा था।

हमारे बहुत-से स्मारक कलाकारों ने ‘खुले’ में बनाए हैं- ऐलोरा का कैलाश मंदिर हो या खजुराहो, सांची, महाबलिपुरम- उनके पत्थरों को धूप सदियों से तपा रही है। पर वे मानो धूप में तप कर और निराले हुए हैं। निराले दिखते हैं। देखा है एक बार खजुराहो के मूर्तिशिल्पों को गरमियों की तपती दोपहरी में भी और एक नया ही अनुभव लेकर लौटा हूं।

आए धूप खरगोश की तरह मुलायम बालों वाली, आए धूप, कांच की तरह चमकती, आए धूप कठिन- कठोर पथरीली सतह जैसी भी आए, पसरी रहे। यही तो मनाते है हम। ठंड में वह जीवनदायिनी है। स्फूर्ति भरने वाली है। वह अलस भी बनाने वाली है। उसमें ज्यादा देर बैठें तो वह नींद लाने वाली भी बन जाती है। पर कुल मिला कर तो जगाने वाली है। और वसंत के आते ही वह ‘पीली धूप’ और पीली सरसों लहराती खेतों में आंखों को किसी अपार सुख से भरती है।

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