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दुनिया मेरे आगे: एकाकीपन का दंश

पड़ोसियों ने इस घटना की जानकारी फोन कर आंटी जी की पोती को दिया जो मुंबई में रहती थीं।

कई बार घंटी बजाने के बावजूद जब दरवाजा नहीं खुला तो वे लोग आवाज देने लगे।

कुछ साल पहले एक घटना की खबर सुर्खियों में थी जब एक बुजुर्ग महिला काफी समय तक अपने कमरे में मृत पड़ी रहीं और जब लोगों को पता चला, तब उनका सिर्फ कंकाल बचा था। तब लगा था कि कम से कम अब बहुत सारे लोग इस घटना से सबक लेंगे। लेकिन चारों तरफ नजर दौड़ाइए तो निराशा होती है। मुझे दिल्ली में उस पॉश कॉलोनी के एक फ्लैट में आए हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे। वहां मेरी किसी से ठीक से जान-पहचान नहीं हुई थी और न ही किसी से औपचारिक अभिवादन का रिश्ता शुरू हो पाया था। एक दिन मैंने सामने वाले फ्लैट के बाहर तीन-चार महिला-पुरुषों को घर की घंटी बजाते देखा। कई बार घंटी बजाने के बावजूद जब दरवाजा नहीं खुला तो वे लोग आवाज देने लगे। इसके बाद भी जब अंदर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई तो उन लोगों ने जोर-जोर से दरवाजे को धक्का देना शुरू कर दिया।

मुझे यह घटना कुछ असामान्य और असहज करने वाला लग रही थी। ऐसे में मैं नहीं चाहते हुए भी वहां पहुंच गया। वहां रहते हुए कुछ दिन हो गए थे, इसलिए दरवाजे के पास खड़ी महिलाएं और पुरुष मुझे चेहरे से जानने लगे थे और उन्हें पता था कि मैं उनका नया पड़ोसी हूं। मुझे देखते ही वे मुस्कराए और फिर खुद ही बोलने लगे- ‘देखिए न, इस घर में रहने वाली आंटी जी दरवाजा ही नहीं खोल रही हैं। तीन-चार दिन हो गए इन्हें देखे हुए। यों तो घर में ही रहती हैं लेकिन दिन में एक-आध बार तो दिख ही जाती हैं। अब तो कई दिन हो गए।’ जिज्ञासावश मैंने पूछा कि क्या आंटी जी यहां अकेली रहती हैं… क्या उनके साथ कोई और नहीं रहता है?’ जवाब मिला- ‘नहीं।’

मैं सोचने लगा कि एक अकेली बुजुर्ग महिला यहां कैसे अपना जीवन व्यतीत करती होंगी। उनकी घरेलू सहायिका भी पिछले कुछ दिनों से छुट्टी पर थी। क्या बेचारी को अकेलापन काटने के लिए नहीं दौड़ता होगा? एक तो समाज में अकेली महिलाओं के लिए ही वैसे ही जीवन की राहें बहुत मुश्किल होती हैं और अगर वह बुजुर्ग हों तो जिंदगी पहाड़ जैसी लगने लगती है। बुजुर्ग लोगों को उम्र से जुड़ी बीमारियां भी होती रहती हैं। शायद आंटी जी भी इससे अछूती नहीं होंगी और वे भी बीमारियों से पीड़ित रही होंगी।

मैं जब यह सब सोच रहा था तो उस समय दरवाजा खोलने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे थे। जब दरवाजा नहीं खुल पाया तो सब लोगों ने मिल कर दरवाजा तोड़ दिया। फिर जब सब घर के भीतर गए तो मैं भी साथ चला गया। कमरे के अंदर का जो दृश्य था, उसे देख कर सब लोग सन्न रह गए। आंटी जी बिस्तर पर लेटी हुई थीं और उनकी सांसें पता नहीं कब की बंद हो चुकी थीं। सब लोग अफसोस करने लगे। लेकिन यहां एक खास बात यह थी कि यहां रोने-धोने वाला या बुजुर्ग महिला की मौत पर विलाप करने वाला कोई नहीं था। यहां मौजूद लोग बुजुर्ग महिला की पड़ोसी, जान-पहचान के तो जरूर थे, लेकिन इन लोगों में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जो उनका रिश्तेदार या परिवार का सदस्य हो या जिसे अपना कहा जाए।

पड़ोसियों ने इस घटना की जानकारी फोन कर आंटी जी की पोती को दिया जो मुंबई में रहती थीं। शाम तक वे विमान से वहां आ गर्इं। आंटीजी का बेटा-बहू और बेटी-जमाता का परिवार विदेश में रहते थे और वे लोग भी जल्दी ही वहां आ गए। साथ ही परिवार के सदस्य और रिश्तेदारों की एक बड़ी टोली भी। अब दाह संस्कार की तैयारी शुरू हुई। परिवार के सदस्य और रिश्तेदार रोने-धोने और विलाप करने लगे। पता लगा कि आंटी जी अपने परिवार के साथ विदेश नहीं गई थीं। ऐसे में परिवार का कोई सदस्य उनके साथ नहीं रहा और वे यहां अकेली रह गर्इं थीं।

मैं सोचता रहा कि आज की तारीख में कौन अपना है और कौन पराया! ऐसे लोग जो सुख-दुख के समय पर साथ हों या वे जो कहने के लिए तो अपने हैं, लेकिन रहते हैं बहुत दूर। बेटा-बहू और परिवार का कोई सदस्य कभी-कभार फोन कर बुजुर्ग आंटी की खोज-खबर ले लेते होंगे तो क्या इससे उनके कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है? क्या आंटी जी अपने परिवार का सान्निध्य नहीं चाहती होंगी? क्या उनके बच्चों का कोई फर्ज नहीं बनता था। अगर पड़ोसी आंटी जी की खोज-खबर नहीं रखते तो शायद उनके बच्चों को उनकी मौत की सूचना भी कई दिनों के बाद ही मिलती। किसी मुजरिम को समाज से अलग रखने के लिए उसे जेल में रखा जाता है। क्या उस बुजुर्ग महिला की तरह और भी ऐसे बहुत सारे लोग परोक्ष जेल में कैद नहीं हैं? भरा-पूरा परिवार होने के बाद एकाकी जीवन व्यतीत करते बुजुर्ग माता-पिता के प्रति बच्चों की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? आधुनिक जीवन की तलाश में हम लोग संवेदना और अपनी जड़ों से कितने कट गए हैं!

चंदन कुमार चौधरी

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